‘मधुशाला’ बना कप्तानगंज ब्लॉक का सरकारी आवास; सरेआम उड़ रही नियमावली की धज्जियां

अजीत मिश्रा (खोजी)
मधुशाला’ बना कप्तानगंज ब्लॉक का सरकारी आवास, जिम्मेदार अधिकारी मौन
- सरकारी आवास बने मयखाना: कप्तानगंज ब्लॉक की बदनामी का बोझ कब तक ढोएंगे जिम्मेदार?
- सेवा का अंतिम पड़ाव और ब्लॉक की बदहाली; कप्तानगंज ब्लॉक में अनुशासन हुआ ध्वस्त
- जनसेवा की जगह ब्लॉक परिसर में ‘नशे की गूंज’; शासन-प्रशासन मौन, जनता त्रस्त
बस्ती: विकास की योजनाओं को धरातल पर उतारने और आमजन की समस्याओं के समाधान का केंद्र माने जाने वाले कप्तानगंज ब्लॉक कार्यालय की गरिमा अब कलंकित हो रही है। यहाँ का सरकारी आवासीय परिसर अब जनसेवा का केंद्र न रहकर ‘मधुशाला’ में तब्दील हो चुका है। ब्लॉक परिसर में रोज टूटती शराब की बोतलें और शाम ढलते ही शुरू होती ‘महफिलें’ सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली की धज्जियां उड़ा रही हैं।
अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा
सूत्रों के अनुसार, ब्लॉक परिसर में बने कर्मचारी आवास, जिन्हें ग्राम पंचायत और ग्राम विकास अधिकारियों के लिए कार्यस्थल के रूप में आवंटित किया गया था, वे आज अनैतिक गतिविधियों के अड्डे बन गए हैं। सरकारी रोस्टर के अनुसार इन अधिकारियों को अपने संबंधित गांवों में जाकर जनसमस्याओं का निस्तारण करना चाहिए, लेकिन इसके विपरीत ये अधिकारी अपने आवासीय कार्यालयों में बैठकर मयखाने की रौनक बढ़ा रहे हैं।
बीडीओ की भूमिका पर सवाल
अपनी सेवा के अंतिम पड़ाव पर खड़े खंड विकास अधिकारी (BDO) का इस पूरे प्रकरण पर मौन रहना बड़े सवाल खड़े कर रहा है। ब्लॉक परिसर में चल रही इन गतिविधियों से न केवल विभाग की छवि धूमिल हो रही है, बल्कि विकास कार्यों के प्रति भी गंभीर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बदहाली और बदनामी इस ब्लॉक की पहचान बन चुकी है, लेकिन बीडीओ की उदासीनता के कारण किसी पर कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है।
जनप्रतिनिधियों का ‘संरक्षण’ या स्वार्थ?
हैरत की बात यह है कि ब्लॉक परिसर में खुलेआम चल रही इन गतिविधियों को कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधियों का भी मौन समर्थन प्राप्त है। चर्चा है कि अपने स्वार्थ और निजी लाभ के लिए कुछ जनप्रतिनिधि इस पूरी व्यवस्था को संरक्षण दे रहे हैं, जिससे इन बेलगाम कर्मचारियों के हौसले बुलंद हैं।
सुध कौन लेगा?
ब्लॉक की इस बदतर स्थिति से जनपद स्तर के अधिकारी भी पूरी तरह अवगत हैं, लेकिन ‘बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। यदि समय रहते इन ‘आवासीय मयखानों’ पर ताले नहीं जड़े गए, तो सरकारी तंत्र के प्रति आम जनता का बचा-खुचा विश्वास भी पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
क्या शासन-प्रशासन इस मामले को संज्ञान में लेकर दोषियों के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई करेगा या कप्तानगंज ब्लॉक ऐसे ही अपनी साख खोता रहेगा?
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