बस्ती: कागजों पर मनरेगा की ‘खुदाई’, जेब में सरकारी कमाई! पानी में डूबा तालाब, खजाने पर डाका: मनरेगा के नाम पर इटहिया में बड़ा फर्जीवाड़ा
मनरेगा का मज़ाक: पानी से भरे तालाब में 75 मजदूर 'गायब', कागजों पर चल रहा खेल! बस्ती में भ्रष्टाचार की गारंटी: बिना खुदाई, बिना मजदूर, कैसे जारी हुआ मस्टर रोल? क्या मनरेगा 'जेसीबी' का गुलाम? इटहिया के तालाबों ने खोली अधिकारियों की पोल
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती में मनरेगा का ‘अंधेर’: कागजों पर खुदाई, तालाबों में पानी और डकार ली गई सरकारी कमाई!
- बस्ती: मनरेगा में फर्जी मस्टर रोल का खेल, अधिकारियों की चुप्पी पर सवाल
- इटहिया मनरेगा घोटाला: पानी से भरे तालाब और कागजी मजदूरों का सच
- मनरेगा कार्यस्थल पर ‘अंधेर’: मीडिया के सामने TA के मनगढ़ंत जवाब
बस्ती। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का उद्देश्य गरीब मजदूरों को रोजगार देना और ग्रामीण बुनियादी ढांचे को मजबूत करना था, लेकिन बस्ती के गौर विकासखंड में यह योजना ‘भ्रष्टाचार की गारंटी’ बनकर रह गई है। ग्राम पंचायत इटहिया से सामने आई एक चौंकाने वाली खबर ने स्थानीय प्रशासन के दावों की पोल खोल दी है। यहाँ तालाब खुदाई के नाम पर मस्टर रोल में तो सैकड़ों मजदूर दौड़ रहे हैं, लेकिन हकीकत में तालाबों में केवल पानी भरा है और सरकारी खजाना खाली हो रहा है।

खोदने के लिए चाहिए फावड़ा, मिल रही जेसीबी!
आरोप है कि चैनपुरा और राहुल गौतम के घर के सामने स्थित तालाबों के सौंदर्यीकरण के नाम पर 75 मजदूरों का फर्जी मस्टर रोल जारी किया गया है। जब मीडिया की टीम ने मौके की पड़ताल की, तो वहां एक भी मजदूर कार्य करता नहीं मिला। बड़ा सवाल यह है कि यदि तालाब में पानी लबालब भरा है, तो वहां खुदाई किस ‘जादुई तरीके’ से हो रही है? स्थानीय लोगों का आरोप है कि काम मजदूरों से नहीं, बल्कि नियमों को ताक पर रखकर जेसीबी मशीन से कराया गया है, जो मनरेगा की गाइडलाइन का सरासर उल्लंघन है।
जिम्मेदारों की ‘मौन स्वीकृति’ या ‘मिलीभगत’?
इस पूरे प्रकरण में तकनीकी सहायक (TA) दिनेश यादव की भूमिका कटघरे में है। मीडिया द्वारा जब इस फर्जीवाड़े पर सवाल पूछे गए, तो उनके पास न तो कोई ठोस जवाब था और न ही कार्यस्थल पर उपस्थिति का कोई प्रमाण। उनके द्वारा दिए गए ‘मनगढ़ंत’ तर्क प्रशासनिक लापरवाही और मिलीभगत की ओर सीधा इशारा कर रहे हैं।
क्या जांच के नाम पर फिर होगा लीपा-पोती?
मनरेगा के बजट का यह खुला दुरुपयोग सीधे तौर पर जनता के पैसे की लूट है। इटहिया का यह मामला कोई इकलौता नहीं, बल्कि पूरे जिले में चल रहे उस बड़े रैकेट का एक छोटा सा हिस्सा प्रतीत होता है, जहाँ कागजों पर काम दिखाकर सरकारी धन का बंदरबांट किया जा रहा है।
अब गेंद जिला प्रशासन के पाले में है। क्या जिला प्रशासन इस गंभीर मामले की निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करेगा, या फिर तकनीकी सहायक की तरह ही ‘भ्रामक रिपोर्ट’ लगाकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? बस्ती की जनता जवाब मांग रही है—क्या मनरेगा का पैसा मजदूरों की जेब तक पहुंचेगा या भ्रष्ट अधिकारियों की तिजोरियों में ही दफन हो जाएगा?
[संपादकीय टिप्पणी: यह लेख प्राप्त साक्ष्यों और स्थानीय आरोपों पर आधारित है। यदि संबंधित अधिकारी या पक्ष का कोई स्पष्टीकरण प्राप्त होता है, तो उसे निष्पक्षता के साथ प्रकाशित किया जाएगा।]
















