उत्तर प्रदेशबस्ती

गड़ा धन सरकारी, गड़ा गांजा आपका: कानून की दोहरी नीति का कड़वा सच!

मुनाफे पर सरकार का कब्जा, मुसीबत में आम आदमी की जिम्मेदारी: यह कैसा न्याय? सच इशारों में छिपा है: जमीन के नीचे का 'सिद्धांत' हर बार क्यों बदल जाता है?

अजीत मिश्रा (खोजी)

गड़ा धन सरकारी, गड़ा गांजा आपका: कानून की दोहरी चाल का कड़वा सच!

  • कानून की दोहरी नीति: ‘गड़ा धन’ और ‘गड़ा गांजा’ के बीच झूलता आम आदमी
  • न्याय का दोहरा मापदंड: जब खजाना राष्ट्र की धरोहर और गांजा नागरिक का अपराध बन जाए!
  • क्या कानून व्यवस्था आम आदमी के लिए केवल एक चक्रव्यूह है?

​क्या हमारे कानून का तराजू न्याय करने के लिए बना है या केवल आम आदमी की कमर तोड़ने के लिए? यह स्थिति हमारे तंत्र की उस विडंबना को उजागर करती है, जो सुनने में भले ही मजाकिया लगे, लेकिन हकीकत में बेहद डरावनी है।अक्सर कहा जाता है कि कानून अंधा होता है, लेकिन क्या वह कभी-कभी इतना ‘चयनित’ भी हो सकता है कि लाभ और हानि के आधार पर अपनी परिभाषाएं बदल ले? यह विषय केवल एक मजाकिया टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह हमारे न्यायिक और सामाजिक ढांचे की एक गंभीर विडंबना की ओर इशारा करता है।

​मुनाफे पर सरकार का कब्जा, मुसीबत में आम आदमी की जिम्मेदारी

​कल्पना कीजिए, आपने अपनी मेहनत से अपने खेत की खुदाई की और वहां से सोने के सिक्कों से भरा मटका निकल आया। आपकी खुशी का ठिकाना नहीं रहेगा, लेकिन अगले ही पल सरकारी फरमान आता है—यह ‘गड़ा धन’ है और इस पर सरकार का हक है। आपकी जमीन, आपकी मेहनत, फिर भी खजाना सरकारी!

​लेकिन जरा रुकिए, खेल तब और दिलचस्प हो जाता है जब वही खेत गांजे की बोरी उगल दे। अचानक, ‘सरकारी संपत्ति’ वाला नियम हवा में गायब हो जाता है। अब कोई नहीं कहता कि यह जमीन के अंदर मिला है तो सरकार का है। अब सारा शक सीधा जमीन के मालिक पर घूम जाता है और गांजा निकलते ही जिम्मेदारी पूरी तरह आपकी हो जाती है।सामाजिक दृष्टिकोण से देखें तो ‘जमीन का मालिक’ होने का अर्थ है उस भूमि और उसके भीतर की वस्तुओं पर प्राथमिक अधिकार होना। हालांकि, कानून जब ‘गड़े धन’ (सोने-चांदी) की बात करता है, तो वह उसे ‘राष्ट्र की धरोहर’ घोषित कर सरकार के नियंत्रण में ले आता है। यहाँ तक तो तर्क दिया जा सकता है कि यह सार्वजनिक हित में है।

लेकिन, न्यायसंगतता पर सवाल तब उठता है जब वही मापदंड ‘गांजे की बोरी’ या अवैध सामग्री के मामले में पूरी तरह बदल जाता है। अचानक, ‘जमीन के भीतर की वस्तु’ होने का तर्क गायब हो जाता है और सारी जिम्मेदारी जमीन के मालिक पर डाल दी जाती है। यह दोहरा रवैया आम आदमी के मन में एक गहरा अविश्वास पैदा करता है।

​क्या कानून का चश्मा केवल मुनाफा और सजा देखने के लिए है?

​यह विडंबना ही है कि जब खजाना निकलता है तो वह ‘राष्ट्र की धरोहर’ बन जाता है, और जब नशीला पदार्थ निकलता है तो वह ‘नागरिक की जिम्मेदारी’। आम आदमी यह सोचने पर मजबूर है कि आखिर जमीन के नीचे पड़ी चीजों का सिद्धांत एक जैसा क्यों नहीं है? अगर जमीन से निकला सोना मेरा नहीं है, तो जमीन से निकला अपराध बिना किसी जांच के मेरा कैसे हो गया? न्याय का मूल सिद्धांत समानता है। यदि जमीन के नीचे दबी वस्तु पर सरकार का मालिकाना हक है, तो उस जमीन से जुड़ी संदिग्ध गतिविधियों के लिए भी जांच की एक पारदर्शी और न्यायसंगत प्रक्रिया होनी चाहिए, न कि सीधे जमीन के मालिक को दोषी मान लेना।

लेख में उठाए गए बिंदु कुछ प्रमुख सामाजिक और कानूनी विरोधाभास पेश करते हैं:

  • लाभ का बंटवारा: खजाना मिलने पर उसे ‘राष्ट्र की संपत्ति’ मानकर सरकार अपने नियंत्रण में ले लेती है।
  • जवाबदेही का बोझ: नशीला पदार्थ मिलने पर उसे ‘नागरिक की जिम्मेदारी’ मानकर सारा दोष उस व्यक्ति पर मढ़ दिया जाता है, जिसकी जमीन है।
  • कानूनी विरोधाभास: कानून की जटिलताओं के बीच आम समझ यह पूछने पर मजबूर है कि यदि जमीन से निकली वस्तु मेरी नहीं है, तो वह अपराध मेरा कैसे हुआ?

​लोकतंत्र में आईना दिखाती बहस

​भले ही कानूनी प्रावधान अलग-अलग हों, लेकिन यह सवाल व्यवस्था को आईना दिखाने का काम करता है। जब लाभ की बारी आती है तो मालिक सरकार हो जाती है, और जब मुसीबत की बारी आती है तो मालिक आम नागरिक?

सामाजिक प्रभाव: व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह

लोकतंत्र में व्यवस्था का उद्देश्य न्याय करना है, न कि उसे पेचीदा बनाकर आम जनता को परेशान करना। जब आम आदमी देखता है कि सरकार ‘लाभ की बारी आने पर मालिक’ बन जाती है और ‘मुसीबत की बारी आने पर नागरिक को मालिक’ बना देती है, तो व्यवस्था पर से भरोसा उठने लगता है।

यह बहस चाय की दुकानों से लेकर सोशल मीडिया तक फैलती है क्योंकि यह आम आदमी के अस्तित्व और उसकी सुरक्षा से जुड़ी है। एक न्यायसंगत समाज वह है जहाँ नियम स्पष्ट हों, न कि स्थितियों के अनुसार बदलते हुए। लोकतंत्र में कभी-कभी एक तार्किक व्यंग्य, भारी-भरकम भाषणों से कहीं अधिक असरदार और आईना दिखाने वाला साबित होता है।

क्या आपको नहीं लगता कि समय आ गया है कि कानून की इन अस्पष्टताओं को दूर कर एक पारदर्शी और न्यायसंगत व्यवस्था सुनिश्चित की जाए?

​यह लेख केवल एक व्यंग्य नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर एक तंज है जहां आम समझ और कानूनी व्यवहार के बीच एक गहरी खाई है। लोकतंत्र में कभी-कभी एक ऐसा ही कड़वा व्यंग्य, सौ भाषणों से ज्यादा असरदार साबित होता है।

क्या आपको लगता है कि इस तरह के दोहरे मापदंड आम आदमी का व्यवस्था से भरोसा कम कर रहे हैं?

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