उत्तर प्रदेशबस्ती

बस्ती की राजनीति: सपा में ‘पटखनी’ की होड़, तो संजय चौधरी के ‘पद’ का सूर्यास्त

सपा में बढ़ती गुटबाजी और संजय चौधरी की विदाई: बस्ती की राजनीति में बड़ा बदलाव ​आंतरिक कलह से जूझती सपा और विवादों के साये में संजय चौधरी का कार्यकाल खत्म

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती की राजनीति: एक ओर सपा की आंतरिक जंग, तो दूसरी ओर संजय चौधरी के ‘पद’ का सूर्यास्त

  • बस्ती का राजनीतिक गलियारा: सपा की ‘साइकिल’ बेपटरी, तो जिला पंचायत अध्यक्ष होंगे ‘पैदल’

बस्ती। जिले का राजनीतिक परिदृश्य इन दिनों दो प्रमुख बिंदुओं पर सिमटा हुआ है—पहला, समाजवादी पार्टी (सपा) के भीतर पनपती गुटबाजी और दूसरा, जिला पंचायत अध्यक्ष संजय चौधरी के विवादित कार्यकाल का समापन। ये दोनों घटनाएँ भले ही अलग हों, लेकिन बस्ती के राजनीतिक भविष्य पर इनका गहरा असर पड़ने वाला है।

​सपा की ‘साइकिल’ पर सवार, लेकिन दिशाओं में बंटे नेता

​समाजवादी पार्टी के लिए बस्ती में स्थिति काफी विरोधाभासी है। एक ओर पार्टी के पास सांसद और तीन विधायक जैसे बड़े पद हैं, जो संगठन की मजबूती का प्रतीक होने चाहिए थे, लेकिन हकीकत इसके उलट है। पार्टी के भीतर ही ‘दूसरे को पटखनी देने’ की अंधी दौड़ ने कार्यकर्ताओं और आम जनता के बीच एक नकारात्मक संदेश दिया है।

​रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी में केवल दिखावे की एकता है। मंचों पर साथ दिखने वाले नेताओं के बीच वैचारिक एकता का अभाव है। ‘खाटी सपा’ कार्यकर्ताओं, जैसे महेंद्रनाथ यादव, की उपेक्षा और अवसरवादी तत्वों की बढ़ती घुसपैठ ने पार्टी की जड़ों को खोखला कर दिया है। यह गुटबाजी न केवल पार्टी के मनोबल को गिरा रही है, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। यदि पार्टी ने जल्द ही अपनी आंतरिक कलह को नहीं सुलझाया और कार्यकर्ताओं के ‘दिल’ को नहीं जोड़ा, तो इसका खामियाजा उसे आने वाले समय में भुगतना पड़ सकता है।

सपा में आंतरिक कलह और गुटबाजी

​बस्ती जिले में समाजवादी पार्टी (सपा) की स्थिति पर चर्चा की गई है। लेख के मुख्य बिंदु :

  • आंतरिक प्रतिस्पर्धा: जिले में सपा के पास सांसद और तीन विधायक होने के बावजूद, पार्टी में एकता की कमी है। नेताओं के बीच एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ मची है।
  • दलों में एकजुटता का अभाव: लेख में तर्क दिया गया है कि केवल मंच साझा करने या फोटो खिंचवाने से दल मजबूत नहीं होता, बल्कि नेताओं के बीच वैचारिक और भावनात्मक जुड़ाव आवश्यक है।
  • महेंद्रनाथ यादव की स्थिति: लेख में महेंद्रनाथ यादव को एक निष्ठावान ‘खाटी सपा’ कार्यकर्ता के रूप में उल्लेखित किया गया है, लेकिन पार्टी में अन्य गुट उन्हें दरकिनार करने की कोशिश करते हैं।
  • भविष्य पर प्रभाव: पार्टी की यह बंटी हुई स्थिति 2027 के चुनावों में नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है, क्योंकि कुछ लोग पार्टी की विचारधारा के विपरीत काम कर रहे हैं।

​संजय चौधरी का कार्यकाल: एक ‘विवादित अध्याय’ का अंत

​दूसरी ओर, जिले की चर्चा का केंद्र संजय चौधरी का विदाई काल है। 12 जुलाई 2026 की रात 12 बजे जैसे ही उनका पांच साल का कार्यकाल समाप्त होगा, उनके वीआईपी रुतबे और सरकारी सुख-सुविधाओं का दौर भी खत्म हो जाएगा।

​उनका कार्यकाल आरोपों और विवादों से घिरा रहा है। लेख में उन पर जिले के संसाधनों की लूट में सहयोग करने, राजनीतिक धोखाधड़ी और ब्लैकमेलिंग जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। न केवल भ्रष्टाचार, बल्कि जिला पंचायत के भीतर महिला सदस्यों के सम्मान और उनके अधिकारों के हनन को लेकर भी उन पर तीखे सवाल खड़े किए गए हैं। जनता के बीच जो छवि उन्होंने पिछले पाँच वर्षों में बनाई है, वह उनके भविष्य के राजनीतिक सफर के लिए एक बड़ा रोड़ा साबित हो सकती है। अब जब वे ‘पैदल’ होने की कगार पर हैं, तो बस्ती की जनता उनके कार्यकाल का मूल्यांकन पूरी सख्ती से कर रही है।

संजय चौधरी के कार्यकाल की समीक्षा

​बस्ती के जिला पंचायत अध्यक्ष संजय चौधरी के पांच साल के कार्यकाल :

  • कार्यकाल का मूल्यांकन: संजय चौधरी के कार्यकाल को जिले के इतिहास का “सबसे खराब कार्यकाल” बताया है और उन पर जिले को लूटने वालों का साथ देने का आरोप लगाया है।
  • पद से विदाई: रिपोर्ट के अनुसार, 12 जुलाई 2026 को उनका कार्यकाल समाप्त हो रहा है, जिसके बाद उनसे सरकारी आवास और वीआईपी सुविधाएं वापस ले ली जाएंगी।
  • नैतिक और राजनीतिक आलोचना: उन पर धोखेबाजी, ब्लैकमेलिंग और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं, साथ ही महिला सदस्यों के सम्मान को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
  • जनता का नजरिया: लेख का निष्कर्ष है कि जिले की जनता उनके कार्यकाल के दौरान हुए कथित भ्रष्टाचार और उनके व्यवहार को लंबे समय तक याद रखेगी और उन्हें माफ नहीं करेगी।

​निष्कर्ष: सुधार की अपेक्षा

​बस्ती की राजनीति इस समय एक चौराहे पर खड़ी है। सपा को यदि सत्ता में वापसी करनी है, तो उसे अपने भीतर से ‘झंडा बदलने वाले’ और निजी स्वार्थ साधने वाले तत्वों को बाहर कर एक ठोस विचारधारा के साथ आगे बढ़ना होगा। वहीं, जिला पंचायत जैसी संस्थाओं को भ्रष्टाचार और चाटुकारिता से मुक्त कर जनता के प्रति जवाबदेह बनाना समय की मांग है।

​बस्ती की जनता अब जागरूक है। आने वाला समय यह तय करेगा कि क्या पार्टियाँ और नेता अपनी गलतियों से सबक लेते हैं, या फिर आपसी खींचतान और पद के मोह में अपनी साख खोते रहेंगे।

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