जल जीवन मिशन की पोल: भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ा ‘रेत का महल’, करोड़ों का बजट पानी में!
बस्ती में जल जीवन मिशन का दम: घटिया निर्माण से गिरी चहारदीवारी, फाइलों में सिमटा 'हर घर नल' का सपना। 'सफेद बालू' और सरकारी सुस्ती: क्या बस्ती में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा जल जीवन मिशन?
अजीत मिश्रा (खोजी)
जल जीवन मिशन की बदहाली: करोड़ों का बजट, लेकिन निर्माण के नाम पर सिर्फ ‘रेत का महल’
- बस्ती: जल जीवन मिशन के निर्माण कार्यों पर उठे सवाल, मानकों की अनदेखी से ढही चहारदीवारी।
- करोड़ों की परियोजना, अधूरा काम: सुकरौली और हलूआधार में जल जीवन मिशन की बदहाली का सच।
- निर्माण में धांधली: बस्ती में जल जीवन मिशन की टंकियों और चहारदीवारी की गुणवत्ता पर ग्रामीणों का बड़ा आरोप।
बस्ती: हर घर तक नल से जल पहुँचाने का केंद्र सरकार का ‘जल जीवन मिशन’ का सपना बस्ती जनपद में दम तोड़ता नज़र आ रहा है। करोड़ों रुपयों की लागत से चल रही यह परियोजना अब भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण की मिसाल बन गई है। सदर ब्लॉक के सुकरौली गांव में पानी की टंकी के चारों ओर बनाई गई चहारदीवारी एक मामूली आंधी भी नहीं झेल सकी और ढह गई।
गुणवत्ता से खिलवाड़: ‘सफेद बालू’ का खेल
निर्माण कार्यों की गुणवत्ता शुरू से ही सवालों के घेरे में रही है। ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि पानी की टंकी और उसकी चहारदीवारी के निर्माण में मानक सामग्री का उपयोग नहीं किया गया। अधिकांश जगहों पर ईंटों की जुड़ाई में सीमेंट के स्थान पर केवल ‘सफेद बालू’ का उपयोग किया गया है, जिसके कारण निर्माण में रत्ती भर भी मजबूती नहीं बची है। नतीजा यह है कि निर्माण कार्य हुए अभी कुछ ही समय बीता है कि दीवारों और फर्श में दरारें आ गई हैं, और लीपापोती का दौर शुरू हो चुका है।
जिम्मेदार कंपनियों की लापरवाही और सरकारी सुस्ती
सदर ब्लॉक के सुकरौली में मेधा इंजीनियरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड, हैदराबाद को 150.54 लाख रुपये का ठेका दिया गया था, लेकिन काम की स्थिति यह है कि टंकी अभी तैयार भी नहीं हो पाई और चहारदीवारी गिर गई। ठीक ऐसी ही दुर्दशा हलुआपार ग्राम पंचायत में भी देखी जा सकती है, जहाँ निर्माणाधीन पानी की टंकी की हालत जर्जर है। हलूआधार की 149.92 लाख रुपये की परियोजना का काम तो दो साल पहले ही पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन आज भी वहां काम अधूरा पड़ा है।
लीकेज की समस्या: काम अधूरा, समस्याएं पूरी
ग्रामीणों के अनुसार, न केवल दीवारें गिर रही हैं, बल्कि पाइपों और टंकियों में लीकेज की समस्या भी आम हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि गिरी हुई दीवारें खुद अपनी कहानी बयां कर रही हैं कि निर्माण कार्य में कितनी बड़ी धांधली की गई है।
विभाग का रटा-रटाया जवाब
जब इस पूरे मामले पर जल निगम (ग्रामीण) के अधिशासी अभियंता शफीकुर्रहमान से सवाल किया गया, तो उन्होंने बड़े ही सामान्य लहजे में कहा कि “जहाँ खामियां सामने आ रही हैं, उन्हें ठीक कराया जा रहा है”। उन्होंने आगे यह भी सफाई दी कि अगले दस वर्षों तक इसकी देखरेख की जिम्मेदारी संबंधित कार्यकारी संस्था की ही है।
सवाल यह है कि क्या सरकारी खजाने के करोड़ों रुपये की बर्बादी के बाद, महज मरम्मत से काम चल जाएगा? क्या गुणवत्ता की अनदेखी करने वाली कंपनियों पर कोई कठोर दंडात्मक कार्रवाई होगी या फिर यह सारा खेल इसी तरह ‘लीपापोती’ की भेंट चढ़ता रहेगा?
















