मानसून की मार नहीं, सिस्टम की हार: निर्माण कार्यों में जवाबदेही का घोर अभाव।
सड़कें क्यों टूटती हैं? ड्रेनेज से लेकर 'डिजाइन' तक, हर स्तर पर है खेल। बुनियादी ढांचे की बदहाली: जब तक नहीं होगी कड़ी सजा, नहीं रुकेगी यह तबाही।
अजीत मिश्रा (खोजी)
मानसून का ‘कमीशन’ और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती सड़कें: कौन है असली गुनहगार?
- पानी में बहता ‘विकास’: सड़कें हैं या कमीशनखोरी का सरकारी नमूना?
- उद्घाटन के दो महीने, सड़क के ‘दो टुकड़े’: क्या ठेकेदारों के लिए ‘रबड़’ से बनती हैं सड़कें?
- पहली बारिश, पहला गड्ढा: क्या यही है हमारे शहर की ‘स्मार्ट’ सड़कें?
दिनांक: 16 जुलाई 2026
मानसून की पहली फुहारें पड़ते ही देश के तमाम हिस्सों से एक ही ‘ब्रेकिंग न्यूज’ आती है—कहीं सड़क धंस गई, तो कहीं पुल का एक हिस्सा बह गया। जनता के खून-पसीने की कमाई से बना करोड़ों का इंफ्रास्ट्रक्चर मिट्टी में मिल जाता है। सवाल यह नहीं है कि बारिश कितनी तेज थी, सवाल यह है कि हमारी सड़कें इतनी ‘कागज की नाव’ जैसी क्यों हैं कि पहली बारिश भी नहीं झेल पातीं?
’विकास’ की पोल खोलता भ्रष्टाचार का तंत्र
सड़कों का टूटना महज एक तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित भ्रष्टाचार है। जब सड़क निर्माण के टेंडर से लेकर सामग्री की खरीद तक में ‘कमीशन’ का खेल चलता है, तो सड़क पर डामर कम और धूल ज्यादा नजर आती है।
- ठेकेदार और अधिकारी का ‘अपवित्र गठबंधन’: सड़क की उम्र कम होगी, तभी तो ठेकेदार को अगला टेंडर जल्दी मिलेगा। इंजीनियरों की देखरेख में कागजों पर तो ‘विश्वस्तरीय गुणवत्ता’ दिखती है, लेकिन जमीनी हकीकत गड्ढों में कैद रहती है। क्या यह संभव है कि घटिया सामग्री का इस्तेमाल अधिकारियों की जानकारी के बिना हो? बिल्कुल नहीं! यह मिलीभगत का एक ऐसा चक्र है जिसमें इंजीनियर की जेब भरती है और सड़कें दम तोड़ती हैं।
- ड्रेनेज का अकाल: हमारे शहर बनाने वाले इतने दूरदर्शी हैं कि वे सड़क तो बना देते हैं, लेकिन पानी निकलने का रास्ता छोड़ना भूल जाते हैं। जलभराव ही सड़क की नींव का सबसे बड़ा दुश्मन है। यह लापरवाही नहीं, बल्कि अपराध है।
- ओवरलोडिंग पर चुप्पी: सड़कों को झेलने की एक क्षमता होती है, लेकिन ओवरलोड ट्रक बिना किसी रोक-टोक के गुजरते हैं। यह ‘मैनेजमेंट’ के नाम पर वसूली का खेल है, जिसका खामियाजा उस आम नागरिक को भुगतना पड़ता है जिसकी गाड़ी उस गड्ढे में गिरकर टूटती है।
जवाबदेही की कमी, सबसे बड़ी त्रासदी
दोषी कौन? सरकार, अधिकारी या ठेकेदार? सच्चाई यह है कि यह एक ‘सिस्टम’ की विफलता है। जब कोई सड़क उद्घाटन के दो महीने के भीतर टूटती है, तो उस परियोजना के इंजीनियर से लेकर ठेकेदार तक को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड और ब्लैकलिस्ट क्यों नहीं किया जाता? जब तक ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति नहीं अपनाई जाएगी, तब तक यह नाटक हर साल मानसून के साथ दोहराया जाता रहेगा।
सीएजी (CAG) की रिपोर्टें अलमारियों की शोभा बढ़ाती रहती हैं, लेकिन उस पर कार्रवाई करने का साहस कोई नहीं जुटा पाता। क्या हमारा ‘बुनियादी ढांचा’ केवल कमीशनखोरी का जरिया बनकर रह गया है?
अब हमें चाहिए समाधान, बहाने नहीं
बारिश एक प्राकृतिक घटना है, लेकिन सड़कों का ढहना मानव निर्मित आपदा है। अब वक्त आ गया है कि:
- थर्ड पार्टी ऑडिट: निर्माण कार्य की जांच सरकारी विभागों के बजाय स्वतंत्र निकायों द्वारा हो।
- जवाबदेही कानून: निर्माण के बाद 5 साल तक सड़क की मरम्मत का जिम्मा ठेकेदार का हो और विफलता पर भारी जुर्माना वसूला जाए।
- पारदर्शिता: हर सड़क के निर्माण की सामग्री और ठेकेदार का विवरण सार्वजनिक पटल (Public Portal) पर हो।
सड़कें देश की धमनियां होती हैं। अगर धमनियों में ही कचरा और भ्रष्टाचार भरा रहेगा, तो देश का विकास ‘रफ्तार’ नहीं, बल्कि ‘गड्ढे’ ही पकड़ेगा। मानसून तो सिर्फ आईना है, जो हमारे भ्रष्टाचार की बदरंग तस्वीर दिखा जाता है। असली सवाल यह है कि क्या हम इस आईने को देखकर शर्मिंदा होंगे, या अगले साल फिर इसी तमाशे के लिए तैयार रहेंगे?
क्या आपको लगता है कि सड़कों के निर्माण में जवाबदेही तय करने के लिए हमें ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर ऑडिट’ को अनिवार्य और सख्त कानून के दायरे में लाने की आवश्यकता है?













