उत्तर प्रदेशबस्ती

लोकतंत्र पर ‘प्रशासक’ का ग्रहण: पंचायत से ब्लॉक प्रमुख तक, चुनाव से क्यों भाग रही सरकार?

आम जनता के बीच अब यह चर्चा आम है कि यदि पंचायतें इसी तरह प्रशासकों के भरोसे चलेंगी, तो क्या भविष्य में नगर निकायों, और यहां तक कि विधानसभा व संसद के संदर्भ में भी ऐसी कोई 'अपरिहार्य परिस्थितियों' की दलील गढ़ी जा सकती है?

अजीत मिश्रा (खोजी)

लोकतंत्र की ‘प्रशासक’ वाली नई परिभाषा: चुनाव से भागती सरकार

  • यूपी में पंचायती राज का ‘प्रशासक’ युग: जनप्रतिनिधियों की जगह अब सरकार के नुमाइंदों का कब्जा?
  • चुनाव टालने का खेल या मजबूरी? ब्लॉक प्रमुखों के बाद अब प्रशासकों के भरोसे विकास खंड
  • ‘प्रशासक’ मॉडल: क्या उत्तर प्रदेश में धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है स्थानीय स्वशासन?
  • विकास कार्यों का हवाला और चुनाव से किनारा: क्या उप्र में लोकतंत्र के लिए ‘अपरिहार्य’ संकट है?

​उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था अब धीरे-धीरे ‘लोकतांत्रिक’ होने के बजाय ‘प्रशासक’ मॉडल की ओर अग्रसर हो रही है। पहले ग्राम प्रधान और जिला पंचायत अध्यक्षों के कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें प्रशासक की कमान सौंपी गई और अब इस सूची में ब्लॉक प्रमुखों का नाम भी जुड़ गया है। प्रदेश सरकार ने 19 जुलाई 2026 को जारी कार्यालय ज्ञाप के माध्यम से स्पष्ट कर दिया है कि 20 जुलाई 2026 से सभी 826 विकास खंडों में निवर्तमान ब्लॉक प्रमुख ही ‘प्रशासक’ के रूप में कार्य करेंगे।

क्या यह लोकतंत्र का संकुचन नहीं?

सरकार का तर्क है कि विकास कार्य प्रभावित न हों, इसलिए यह व्यवस्था लागू की गई है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या समय पर चुनाव कराना सरकार की जिम्मेदारी नहीं थी? ‘उप्र क्षेत्र पंचायत तथा जिला पंचायत अधिनियम, 1961’ की धारा-8 का सहारा लेकर प्रशासक नियुक्त करना कानूनी रूप से भले ही उचित ठहराया जाए, लेकिन नैतिक और लोकतांत्रिक दृष्टि से यह जनमत की अनदेखी है। जब कार्यकाल समाप्त हो रहा था, तो नई निर्वाचित इकाइयों का गठन अब तक क्यों नहीं हो पाया?

सवाल जो जनता पूछ रही है:

  • चुनाव से परहेज क्यों?: लगातार स्थानीय निकायों में चुनाव के बजाय प्रशासकों की तैनाती से यह संदेश जा रहा है कि सरकार चुनावी प्रक्रिया से बचना चाहती है या उसे टालने के बहाने ढूंढ रही है।
  • अगला नंबर किसका?: आम जनता के बीच अब यह चर्चा आम है कि यदि पंचायतें इसी तरह प्रशासकों के भरोसे चलेंगी, तो क्या भविष्य में नगर निकायों, और यहां तक कि विधानसभा व संसद के संदर्भ में भी ऐसी कोई ‘अपरिहार्य परिस्थितियों’ की दलील गढ़ी जा सकती है?
  • प्रशासक बनाम प्रतिनिधि: एक चुना हुआ प्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह होता है, जबकि प्रशासक केवल सरकार के आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य होता है। क्या यह व्यवस्था जमीनी स्तर पर लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर नहीं कर रही है?

निष्कर्ष

कार्यालय ज्ञाप में कहा गया है कि यह व्यवस्था नए निर्वाचन तक या अधिकतम छह माह के लिए प्रभावी रहेगी। लेकिन राजनीति के जानकार इसे चुनावी प्रक्रिया के विलंब के रूप में देख रहे हैं। विकास कार्यों की आड़ में जनप्रतिनिधियों के अधिकार प्रशासकों को सौंपना लोकतंत्र के स्वस्थ संकेत नहीं हैं। अगर सरकार वाकई विकास के प्रति प्रतिबद्ध है, तो उसे ‘प्रशासक’ नियुक्त करने की ऊर्जा ‘निर्वाचन’ कराने में लगानी चाहिए, ताकि जनता को उनका सही प्रतिनिधि मिल सके।

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