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जर्जर कप्तानगंज विकासखंड कार्यालय: विकास के दावे खोखले, भ्रष्टाचार की छत के नीचे ‘मौत’ का साया!

19 Jun 2026, 01:55 PM • Vande Bharat Live TV News
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अजीत मिश्रा (खोजी)

विशेष रिपोर्ट: कप्तानगंज ब्लॉक कार्यालय या मौत का जाल? मरम्मत के नाम पर कागजी गोलमाल और भ्रष्टाचार की कहानी

  • सवाल: हर साल लाखों की मरम्मत के बाद भी क्यों जर्जर है कप्तानगंज विकासखंड कार्यालय?
  • क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही जागेगा प्रशासन? जर्जर ब्लॉक भवन पर मंडरा रहा खतरा।
  • सरकारी इमारत की खस्ताहाली पर खामोश क्यों जिम्मेदार? ग्रामीणों की सुरक्षा से खिलवाड़।
  • अस्तित्व की जंग लड़ रहा कप्तानगंज का ब्लॉक कार्यालय, भ्रष्टाचार के सुरागों से ढकी जर्जर दीवारें।

कप्तानगंज (बस्ती): बस्ती जनपद का कप्तानगंज विकासखंड कार्यालय, जो पूरे क्षेत्र के विकास की धुरी माना जाता है, आज स्वयं अपनी बदहाली और प्रशासनिक घोर लापरवाही की बलि चढ़ रहा है। दफ्तर की दीवारों पर पड़ी गहरी दरारें और छत से टूटकर गिरता हुआ प्लास्टर इस बात का गवाह है कि यह भवन अब कार्यालय नहीं, बल्कि एक ‘मौत का जाल’ बन चुका है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर प्रतिवर्ष सरकारी फाइलों में मरम्मत के नाम पर खर्च होने वाले लाखों रुपये जा कहाँ रहे हैं?एक तरफ सरकार ‘भविष्य का भारत’ बनाने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं बस्ती जिले के कप्तानगंज विकासखंड का कार्यालय खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। करोड़ों रुपये की विकास योजनाओं की निगरानी करने वाला यह कार्यालय आज खुद अपनी बदहाली और प्रशासनिक संवेदनहीनता का जीता-जागता प्रमाण बन चुका है।

​विकास के नाम पर ‘सफेद हाथी’ और भ्रष्टाचार की नींव

​सरकारी नियमों के अनुसार, हर साल सरकारी भवनों के रखरखाव और मरम्मत के लिए भारी-भरकम बजट आवंटित किया जाता है। कप्तानगंज ब्लॉक के मामले में भी यही स्थिति है। कागजों में मरम्मत के बड़े-बड़े दावों की झड़ी लगी है, लेकिन हकीकत में भवन की स्थिति दयनीय है।सवाल यह है कि आखिर विकासखंड कार्यालय की मरम्मत के लिए हर वर्ष जो लाखों रुपये का बजट जारी होता है, वह किसकी जेब में जा रहा है? भवन की छत का टूटना, दीवारों में गहरी दरारें और प्लास्टर का भरभराकर गिरना यह साबित करने के लिए काफी है कि कागजों पर तो मरम्मत हो रही है, लेकिन धरातल पर केवल भ्रष्टाचार की परतें चढ़ रही हैं।

क्या यह भ्रष्टाचार का चरम नहीं है कि जिस भवन में बैठकर अधिकारी क्षेत्र के विकास की योजनाएं बनाते हैं, वही भवन आज जर्जर होकर खुद विकास के दावों की पोल खोल रहा है? ऐसा प्रतीत होता है कि मरम्मत के नाम पर केवल ‘लिपा-पोती’ की गई है या फिर कागजों पर ही ईंट-सीमेंट खर्च कर सरकारी धन का बंटाधार किया गया है।

​जान हथेली पर रखकर काम कर रहे कर्मचारी

​ब्लॉक कार्यालय में काम करने वाले अधिकारी और कर्मचारी रोजाना इस डर के साये में काम करते हैं कि कब छत का कोई हिस्सा उनके सिर पर आ गिरे। दीवारों में आई दरारें इस बात की चेतावनी दे रही हैं कि ढांचा कभी भी ढह सकता है। बावजूद इसके, जिम्मेदार अधिकारी अपनी कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हैं और न ही विभाग भवन को असुरक्षित घोषित करने की जहमत उठा रहा है। क्या किसी कर्मचारी की जान से बढ़कर यह सरकारी कार्यालय है?कार्यालय में कार्यरत कर्मचारी रोजाना अपनी जान हथेली पर रखकर काम कर रहे हैं। जिस भवन के भरोसे क्षेत्र के विकास की रूपरेखा तैयार की जानी चाहिए, वह खुद किसी भी समय मलबे का ढेर बन सकता है। क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी के इंतजार में है? क्या जब कोई कर्मचारी या कोई ग्रामीण इस जर्जर भवन के मलबे में दबेगा, तब जाकर जिम्मेदार अधिकारियों की नींद खुलेगी?

​ग्रामीणों की सुरक्षा दांव पर

​विकासखंड कार्यालय केवल कर्मचारियों का कार्यस्थल नहीं है, बल्कि यहां रोज सैकड़ों ग्रामीण अपनी सरकारी योजनाओं, पेंशन, आवास और अन्य समस्याओं के समाधान के लिए आते हैं। जर्जर छत के नीचे बैठने को मजबूर इन ग्रामीणों की सुरक्षा के प्रति ब्लॉक प्रशासन पूरी तरह उदासीन बना हुआ है। विशेषकर बरसात के मौसम में, जब छत से पानी रिसता है और प्लास्टर की परतें भरभराकर गिरती हैं, तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है। क्या प्रशासन को तब तक इंतजार करना है जब तक कि यहां कोई बड़ा हादसा न हो जाए?इस कार्यालय में काम से आने वाले सैकड़ों ग्रामीणों की जान को भी हर पल खतरा बना रहता है। बरसात के मौसम में तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है—छत से टपकता पानी और गिरता प्लास्टर किसी भी दिन किसी बड़े हादसे को न्योता दे सकता है। सवाल यह है कि जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाले इस तंत्र में आम आदमी की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?

​जवाबदेही किसकी?

  • तकनीकी जांच का अभाव: क्या पीडब्ल्यूडी (PWD) या अन्य संबंधित विभाग ने कभी इस भवन की संरचनात्मक ऑडिट (Structural Audit) की है? यदि नहीं, तो किसकी अनुमति से इस जर्जर भवन का उपयोग जारी है?
  • बजट का बंदरबांट: पिछले 5 वर्षों में ब्लॉक कार्यालय की मरम्मत के नाम पर कुल कितनी राशि आवंटित की गई और उसका विवरण क्या है? इसकी उच्चस्तरीय जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
  • प्रशासनिक संवेदनशीलता: क्या जिलाधिकारी महोदय को इस जर्जर इमारत की जानकारी नहीं है? या फिर वे किसी बड़े हादसे के बाद ‘जांच समिति’ बनाकर खानापूर्ति करने के इंतजार में हैं?

​चेतावनी: हादसा हुआ तो जिम्मेदारी किसकी होगी?

​अखबार के माध्यम से हम चेतावनी देना चाहते हैं कि यदि कप्तानगंज ब्लॉक कार्यालय की अविलंब तकनीकी जांच नहीं कराई गई और इसे या तो सुरक्षित नहीं किया गया या फिर नए भवन की व्यवस्था नहीं की गई, तो कल होने वाले किसी भी हादसे के लिए सीधे तौर पर यहाँ के जिम्मेदार अधिकारी उत्तरदायी होंगे।

जनता पूछ रही है—क्या भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ा यह भवन विकास का केंद्र बना रहेगा या फिर कोई अनहोनी होने के बाद प्रशासन की नींद खुलेगी?

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