तेरह साल का लंबा इंतजार: स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता शिवबखरी का अधूरा अस्पताल

अजीत मिश्रा (खोजी)
साढ़े चार करोड़ का ‘खंडहर’: सरकारी संवेदनहीनता का जीता-जागता स्मारक
संपादकीय
- शिवबखरी का अधूरा अस्पताल: सरकारी फाइलों में दम तोड़ते चुनावी वादे।
- विकास की ‘ईंटों’ में दबा लोगों का दर्द: स्वास्थ्य केंद्र या खंडहर?
- अस्पताल है पर इलाज नहीं, करोड़ों खर्च के बाद भी जनता भगवान भरोसे।
- प्रशासनिक लापरवाही की मिसाल: 13 वर्षों से अधर में लटका इलाज का सपना।
संतकबीरनगर जिले के पौली ब्लॉक का शिवबखरी गांव स्वास्थ्य सुविधाओं के भारी अभाव से जूझ रहा है। क्षेत्र के लोगों के लिए बेहतर इलाज का सपना 13 साल से अधूरा पड़ा है, क्योंकि यहां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का निर्माण कार्य आज तक पूरा नहीं हो सका है। संतकबीरनगर जिले के पौली ब्लॉक का शिवबखरी गांव आज एक ऐसे ‘स्मारक’ का गवाह है, जिसे हम अस्पताल तो नहीं कह सकते, लेकिन यह सरकारी कुप्रबंधन और बदनीयती का ‘जीवंत स्मारक’ जरूर बन चुका है। तेरह साल, करोड़ों रुपये का खर्च और दो लाख की आबादी—इन आंकड़ों के बीच सिर्फ एक शब्द खड़ा है: विफलता।
वर्ष 2013 में समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान जिस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की आधारशिला रखी गई थी, उसका उद्देश्य क्षेत्र के लोगों को इलाज के लिए मीलों दूर न भटकना पड़े, यह सुनिश्चित करना था। लेकिन आज, तेरह साल बाद, जनता की गाढ़ी कमाई के साढ़े चार करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी हाथ क्या लगा? महज ईंट-पत्थर का एक ढांचा, जो अब धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील हो रहा है।
परियोजना की पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति
- शिलान्यास और उद्देश्य: वर्ष 2013 में समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान इस अस्पताल की आधारशिला रखी गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य स्थानीय लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना था।
- लागत और वित्तीय विफलता: लगभग चार करोड़ रुपये की लागत से निर्माण कार्य शुरू किया गया था। निर्माण कार्य दो साल तक चला, लेकिन बाद में कार्यादायी संस्था ने बजट का अभाव बताकर काम रोक दिया।
- अतिरिक्त बजट का बेअसर होना: कुछ वर्षों बाद प्रशासन ने लगभग 60 लाख रुपये का अतिरिक्त बजट जारी किया, जिससे अस्पताल के जल्द तैयार होने की उम्मीद जगी, लेकिन यह उम्मीद भी टूट गई और निर्माण कार्य फिर से ठप पड़ गया।
- खंडहर में बदलती इमारत: पिछले छह वर्षों से निर्माण कार्य पूरी तरह बंद है और करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद, अस्पताल की इमारत अब धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील हो रही है।
यह कोई छोटी-मोटी देरी नहीं, बल्कि एक आपराधिक लापरवाही है। तर्क दिया गया कि ‘बजट का अभाव’ था, फिर ‘अतिरिक्त बजट’ जारी हुआ, लेकिन वह गया कहाँ? क्या उस पैसे का उपयोग निर्माण पूरा करने के लिए हुआ या फिर फाइलों के रद्दीकरण में?
विडंबना देखिए कि चुनाव के समय यही अस्पताल एक ‘चुनावी मुद्दा’ बनता है। जन प्रतिनिधि बड़े-बड़े वादे करते हैं, आश्वासन देते हैं कि अस्पताल जल्द शुरू होगा, लेकिन चुनाव बीतते ही यह मुद्दा फाइलों की धूल में दब जाता है। स्थानीय विधायक गणेश चौहान का दावा है कि उन्होंने विधानसभा में यह मुद्दा उठाया है और मुख्यमंत्री से आश्वासन मिला है। लेकिन सवाल यह है कि आश्वासनों से इलाज कब होगा?
दो लाख की आबादी आज भी 40 से 50 किलोमीटर दूर जिला अस्पताल या मलोली सीएचसी जाने को मजबूर है। बीच रास्ते में दम तोड़ते मरीजों की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या सत्ता और प्रशासन को इस बात का अहसास है कि इलाज न मिल पाने की त्रासदी क्या होती है?
आम जनता पर असर
- दो लाख की आबादी प्रभावित: इस परियोजना के अधूरे रहने के कारण करीब दो लाख लोगों की आबादी बेहतर इलाज के लिए 40 से 50 किलोमीटर दूर भटकने को मजबूर है।
- मजबूरी का सफर: ग्रामीण क्षेत्र के सैकड़ों गांवों के लोगों को इलाज के लिए मलोली सीएचसी (CHC) या जिला अस्पताल खलीलाबाद की दौड़ लगानी पड़ती है।
- गंभीर मरीजों की स्थिति: समय पर उपचार न मिलने के कारण कई बार गंभीर मरीजों की परेशानी और बढ़ जाती है।
13 वर्षों से अधर में लटकी यह परियोजना केवल एक इमारत का निर्माण नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का कत्ल है। अगर पैसा जारी हुआ था तो काम बंद क्यों हुआ? और अगर काम बंद था, तो संबंधित अधिकारियों पर अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल
चुनावी वादे: ग्रामीणों का आरोप है कि चुनाव के समय जन प्रतिनिधि अस्पताल शुरू कराने के बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही यह मुद्दा फाइलों में दब जाता है।
- विधायक का पक्ष: क्षेत्रीय विधायक गणेश चौहान का कहना है कि उन्होंने इस मुद्दे को विधानसभा में उठाया है और मुख्यमंत्री से अस्पताल का निर्माण कार्य पूरा करने की मांग की है, जिस पर मुख्यमंत्री ने जल्द कार्य पूरा करने का आश्वासन दिया है।
- प्रशासनिक जवाबदेही: जनता अब यह सवाल पूछ रही है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी परियोजना क्यों पूरी नहीं हुई और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?
अब समय आ गया है कि सरकार केवल आश्वासन न दे, बल्कि जवाबदेही तय करे। इस खंडहर हो चुकी इमारत का निर्माण तुरंत पूरा हो, और इस प्रशासनिक अक्षमता के लिए जिम्मेदार लोगों पर कठोर कार्रवाई हो। क्षेत्र की जनता अब केवल ‘उम्मीद’ नहीं, बल्कि ‘परिणाम’ चाहती है।यह मामला शासन और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है, क्योंकि इतने लंबे समय से लंबित यह परियोजना सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत को उजागर करती है।
क्या सरकार के पास इस ‘साढ़े चार करोड़ के गड्ढे’ का कोई जवाब है? या फिर इसे भी जनता के करों की बलि चढ़ाकर भुला दिया जाएगा?
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