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शिक्षा की बदहाली: जब ‘अठन्नी-चवन्नी’ के बजट में चलें स्कूल, तो भविष्य का क्या होगा?

23 Jun 2026, 10:15 AM • Vande Bharat Live TV News
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अजीत मिश्रा (खोजी)

शिक्षा का ‘अकाल’: 16 साल पुरानी फीस और दम तोड़ती सरकारी व्यवस्था

  • परीक्षा फीस 10 गुना बढ़ी, पर स्कूलों का बजट 16 साल से स्थिर: शिक्षा विभाग की दोहरी मार
  • सुविधाओं का टोटा, गिरता नामांकन: सहायता प्राप्त स्कूलों के सामने अस्तित्व का संकट
  • सरकारी उपेक्षा की भेंट चढ़े एडेड स्कूल: महंगाई की मार और खस्ताहाल बुनियादी ढांचा

संपादकीय

​यह विडंबना ही है कि जिस दौर में महँगाई का ग्राफ आसमान छू रहा है, हमारी सहायता प्राप्त (एडेड) स्कूल शिक्षा व्यवस्था 16 साल पुरानी फीस संरचना के बोझ तले दम तोड़ रही है। रिपोर्ट यह दर्शाती है कि कैसे सरकारी उपेक्षा और नीतिगत शिथिलता ने इन विद्यालयों को बदहाली के कगार पर खड़ा कर दिया है।शिक्षा को किसी भी समाज की रीढ़ माना जाता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के सहायता प्राप्त (एडेड) माध्यमिक विद्यालयों की वर्तमान स्थिति एक ऐसी कड़वी सच्चाई को उजागर कर रही है, जिसे अनदेखा करना आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। पिछले 16 वर्षों से फीस में एक पैसे की भी वृद्धि न होना न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि यह एक सुनियोजित उपेक्षा जैसा प्रतीत होता है।

हास्यास्पद है यह शुल्क ढांचा

आंकड़े किसी मजाक से कम नहीं लगते। आज जब महँगाई हर क्षेत्र में दस गुना बढ़ चुकी है, इन स्कूलों में अभी भी 1.20 रुपये और 1.50 रुपये जैसे शुल्क लिए जा रहे हैं। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि इतने मामूली शुल्क से किसी विद्यालय का बिजली बिल भरना, बुनियादी सुविधाओं का रखरखाव करना या छात्रों को बेहतर वातावरण देना संभव है?इस व्यवस्था की विडंबना देखिए कि आज की महँगाई के दौर में, जब हर चीज की कीमत कई गुना बढ़ चुकी है, इन स्कूलों में छात्र आज भी 1.20 रुपये, 1.50 रुपये और 3.00 रुपये जैसे शुल्क देने को मजबूर हैं।

  • कक्षा 6 से 8 तक के छात्र महज 1.20 रुपये का ‘निर्धन शुल्क’ और 1.50 रुपये का ‘वार्षिक शुल्क’ दे रहे हैं।
  • कक्षा 11 और 12 के स्तर पर भी बिजली, पानी और अन्य बुनियादी सेवाओं के लिए शुल्क नाममात्र ही है।

प्रबंधकों का स्पष्ट कहना है कि इतने कम बजट में स्कूलों का संचालन करना असंभव है। एक तरफ बिजली के भारी-भरकम बिल हैं, दूसरी तरफ स्कूल की जर्जर इमारतों का रखरखाव और तीसरी तरफ छात्रों को उपलब्ध करानी पड़ने वाली बुनियादी सुविधाएं।

बहाने और हकीकत

जहाँ एक ओर माध्यमिक शिक्षा विभाग यह कह रहा है कि शुल्क बढ़ाने का प्रस्ताव “पाइपलाइन में है”, वहीं दूसरी ओर हकीकत यह है कि इन स्कूलों में शौचालय और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। यह दोहरा रवैया चिंताजनक है। एक तरफ माध्यमिक शिक्षा परिषद ने खुद अपनी परीक्षा फीस 60 रुपये से बढ़ाकर 600 रुपये कर दी है, लेकिन स्कूलों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए वे दशकों से संवेदनहीन बने हुए हैं।सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या शासन की नीतियां विरोधाभासी हैं? एक तरफ माध्यमिक शिक्षा परिषद ने अपनी परीक्षा फीस को 60 रुपये से बढ़ाकर सीधे 600 रुपये कर दिया है—यानी दस गुना की भारी बढ़ोतरी। लेकिन जब बात स्कूलों के अस्तित्व को बचाने या बुनियादी सुविधाओं के लिए शुल्क बढ़ाने की आती है, तो प्रशासन ने पिछले 16 सालों से अपनी आंखें मूंद रखी हैं।

अशासकीय सहायता प्राप्त विद्यालय प्रबंधक महासभा के अरविंद कुमार ने इस बाबत तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि सरकार के पास 25 प्रतिशत बजट भी उपलब्ध नहीं है और वे शुल्क बढ़ाने की अनुमति भी नहीं दे रहे हैं।

गिरता नामांकन और गहराता संकट

  • संसाधनों के इस भीषण अभाव का सीधा असर नामांकन (Enrollment) पर पड़ रहा है।
  • स्कूलों में न शौचालय हैं, न पेयजल की व्यवस्था।
  • इन सुविधाओं के अभाव में अभिभावक अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने को प्राथमिकता दे रहे हैं।

परिणाम यह है कि एडेड स्कूलों में छात्रों की संख्या लगातार कम हो रही है, जिससे शिक्षा का लोकतांत्रीकरण खतरे में है।

नुकसान किसे हो रहा है?

इस आर्थिक संकट का सीधा परिणाम छात्रों और अभिभावकों पर पड़ रहा है। सुविधाओं के अभाव में लगातार गिरता नामांकन इसका प्रमाण है। जब सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का दावा करती है, तो क्या वह यह नहीं देख पा रही कि फंड के अभाव में स्कूल कैसे चल रहे हैं?माध्यमिक शिक्षा विभाग के पूर्व निदेशक डॉ. महेंद्र देव का कहना है कि शुल्क वृद्धि का प्रस्ताव “पाइपलाइन में है”। लेकिन 16 साल की यह “पाइपलाइन” कब पूरी होगी? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब आज हर वह व्यक्ति चाहता है जो सरकारी शिक्षा प्रणाली में विश्वास रखता है।

अगर शिक्षा व्यवस्था को वाकई बचाना है, तो केवल ‘प्रस्तावों’ से काम नहीं चलेगा। स्कूलों को संसाधन विहीन छोड़कर बेहतर शिक्षा की उम्मीद करना दिवास्वप्न के समान है। सरकार को जल्द से जल्द शुल्क संरचना की समीक्षा करनी होगी और इसे यथार्थवादी बनाना होगा, अन्यथा ये स्कूल मात्र नाम के विद्यालय रह जाएंगे और शिक्षा की गुणवत्ता मलबे में दब जाएगी।

निष्कर्ष

अगर शिक्षा को वास्तव में प्राथमिकता दी जानी है, तो शासन को अपनी इस “अंधेरी कोठरी” वाली नीति से बाहर निकलना होगा। 16 साल पुरानी फीस को ढोना विकास नहीं, बल्कि शिक्षा का अपमान है। यदि समय रहते शुल्क संरचना में यथोचित बदलाव नहीं किया गया, तो एडेड स्कूलों का अस्तित्व मात्र एक कागजी अवशेष बनकर रह जाएगा।

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