कमीशन का ‘गेट’ और मौत का खेल: बस्ती में विकास की खुली पोल

अजीत मिश्रा (खोजी)
विकास की भेंट: कमीशन के ‘गेट’ और जवाबदेही का अकाल
- क्या ‘सिडको’ और माननीयों की मिलीभगत से सुरक्षित है बस्ती का भविष्य?
- प्रशासन की ‘भीगी बिल्ली’ वाली चुप्पी और कमीशन के लिफाफे: सवालों के घेरे में निर्माण कार्य
- जीएसटी की चोरी और घटिया सामग्री: विकास के नाम पर जनता की जान से खिलवाड़
बस्ती। विकास के नाम पर सरकारी धन का दुरुपयोग कैसे किया जाता है, इसका जीता-जागता और शर्मनाक उदाहरण बस्ती में देखने को मिल रहा है।तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि किस तरह 50 फीसदी कमीशन का ‘खेल’ जनता की सुरक्षा और सरकारी खजाने की धज्जियाँ उड़ा रहा है।बस्ती में विकास कार्यों की गुणवत्ता और भ्रष्टाचार की एक भयावह तस्वीर सामने आई है, जहाँ सरकारी धन का दुरुपयोग और कमीशनखोरी ने न केवल सरकारी संपत्ति को नष्ट किया है, बल्कि आम नागरिकों के जीवन को भी खतरे में डाल दिया है।
दो महीने में ही धराशायी ‘विकास’
कंपनीबाग के पास पीडब्ल्यूडी और तथाकथित ‘माननीयों’ की चहेती कार्यदायी संस्था ‘सिडको’ द्वारा विधायक दुधराम की निधि से बनाया गया गेट महज दो महीने में ही जमींदोज हो गया। जिस पीडब्ल्यूडी के मानकों की दुहाई देकर निर्माण कार्य किए जाते हैं, उसी विभाग के मानक जब दो महीने में हवा के झोंके से गिर जाएं, तो इसे महज लापरवाही नहीं, बल्कि कमीशन का खुला खेल ही माना जाएगा।कंपनीबाग के समीप, जहाँ पीडब्ल्यूडी के मानकों का पालन करने का दावा किया जाता है, वहाँ विधायक दुधराम की विधायक निधि से निर्मित एक गेट मात्र दो महीने के भीतर ही धराशायी हो गया। यह घटना कार्यदायी संस्था ‘सिडको’ और निर्माण कार्यों में व्याप्त भ्रष्टाचार की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है।
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ‘सिडको’ नाम की इस संस्था को लेकर प्रशासन इतना ‘असंवेदनशील’ क्यों है?इस मामले में कई गंभीर बिंदु उठाए गए हैं जो कार्यदायी संस्था और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बीच के कथित गठजोड़ को उजागर करते हैं:
- दोहरा मापदंड और संरक्षण: सिडको नामक यह संस्था प्रशासनिक लापरवाही का फायदा उठा रही है। पूर्व में भानपुर में हुए हादसे, जिसमें एक मजदूर की जान चली गई थी, के बावजूद इस संस्था पर कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई, जो इनके रसूख को दर्शाता है।
- ‘कमीशन’ का तंत्र: आरोप है कि इस संस्था और जनप्रतिनिधियों के बीच गुप्त समझौता है। सिडको के अधिकारी कथित तौर पर माननीयों के आवासों पर जाकर उन्हें ‘कमीशन का लिफाफा’ देते हैं, जिसके कारण कोई भी माननीय इस संस्था की जांच कराने के लिए आगे नहीं आता।
- जीएसटी की चोरी: कमीशन का खेल इतना गहरा है कि ठेकेदारों को सिडको को कमीशन देने के लिए जीएसटी की चोरी तक करनी पड़ती है, जिससे सरकारी राजस्व को दोहरा नुकसान हो रहा है।
- अपराध पर मौन: भानपुर में सिडको द्वारा कराए गए निर्माण के दौरान हुए हादसे में एक मजदूर की जान चली गई, लेकिन तब भी एफआईआर दर्ज नहीं की गई।
- माननीयों की मिलीभगत: ऐसा लगता है कि जनप्रतिनिधियों और सिडको के बीच कोई गुप्त समझौता है। आज तक किसी भी माननीय ने इस संस्था के खिलाफ जांच की मांग नहीं की।
- कमीशन का ‘लिफाफा’: आरोप है कि सिडको के अधिकारी माननीयों के आवास पर ही चाय पीते हैं और वहीं उन्हें कमीशन का ‘लिफाफा’ थमाते हैं।
सरकारी खजाने की लूट, जीएसटी की चोरी
स्थिति इतनी भयावह है कि कमीशन का यह खेल जीएसटी तक पहुँच गया है। जब ठेकेदार को ‘सिडको’ को कमीशन देना पड़ता है, तो वह इसकी भरपाई जीएसटी की चोरी करके करता है। प्रशासन के बड़े अधिकारी—चाहे कमिश्नर हों, डीएम हों या सीडीओ—इनके पास चयन का अधिकार होते हुए भी वे अपनी शक्तियों का प्रयोग करने में ‘भीगी बिल्ली’ बने हुए हैं।प्रशासनिक अधिकारियों, विशेषकर कमिश्नर, डीएम और सीडीओ की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। यद्यपि कार्यदायी संस्था के चयन का अधिकार प्रशासन के पास है, लेकिन वे अपनी शक्तियों का उपयोग करने के बजाय इस तरह व्यवहार करते हैं मानो वे इन संस्थाओं के सामने लाचार हों।
यह स्थिति केवल भ्रष्टाचार का मुद्दा नहीं है, बल्कि सुरक्षा का भी गंभीर मामला है, क्योंकि ये घटिया निर्माण किसी भी समय राहगीरों के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए इस सिंडिकेट के खिलाफ कठोर कार्रवाई करेगा, या फिर यह ‘कमीशन’ का खेल बदस्तूर जारी रहेगा?
निष्कर्ष: जब तक माननीयों और सिडको का यह घातक गठजोड़ कायम रहेगा, तब तक न तो विकास की निधि सुरक्षित रहेगी और न ही आम जनता की जान। क्या प्रशासन अब भी कुंभकर्णी नींद में सोता रहेगा, या इस जानलेवा लापरवाही के लिए जिम्मेदार संस्था और उसके संरक्षणदाताओं पर कार्रवाई होगी?
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