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विकास की भूख, विरोध की जिद: आखिर चाहते क्या हैं हम?

14 Jul 2026, 10:23 AM • Vande Bharat Live TV News
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अजीत मिश्रा (खोजी)

विकास का दोहरा मापदंड: मांगें सुविधाओं की, विरोध प्रगति का?

  • भाषणों में विकास, जमीन पर विरोध: हमारी कैसी विडंबना!
  • सुविधाओं की लंबी फेहरिस्त, और विकास को घर से बाहर का रास्ता!
  • क्या हम वाकई विकास चाहते हैं, या सिर्फ विरोध का बहाना?
  • विकास को रोककर, युवाओं का भविष्य अंधेरे में न धकेलें।
  • फैक्ट्री का विरोध: क्या हम अपने हाथों से अपनी तरक्की रोक रहे हैं?
  • चेत जाओ! आज का यह विरोध कल की बर्बादी की नींव बनेगा।

​आज हमारा क्षेत्र एक अजीब मानसिक द्वंद्व से गुजर रहा है। एक तरफ लंबी-चौड़ी ‘विकास सूची’ है, जिसे लेकर हम हर चुनाव और हर मंच पर चीखते-चिल्लाते हैं। हमारी सूची में पक्की सड़कें, स्वच्छ पेयजल, स्ट्रीट लाइट, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर, बेहतर शिक्षा, युवाओं के लिए रोजगार और महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता जैसे बुनियादी अधिकार शामिल हैं। ये मांगें बिल्कुल जायज हैं, और इनके लिए आवाज उठाना हर नागरिक का कर्तव्य है।

​लेकिन, क्या हम खुद जानते हैं कि हम क्या चाहते हैं?

​एक तरफ हम विकास के लिए गिड़गिड़ाते हैं, तो दूसरी तरफ जब विकास का ‘इंजन’ हमारे दरवाजे पर दस्तक देता है, तो हम पत्थर लेकर खड़े हो जाते हैं। दासिया में लगने वाली फैक्ट्री इसका सबसे ताजा और शर्मनाक उदाहरण है।

विकास की परिभाषा क्या है?

क्या विकास केवल कागजों पर सरकारी योजनाओं का नाम है? क्या विकास केवल बिजली के खंभों पर लगी लाइटों का नाम है? नहीं! विकास का असली अर्थ है—आर्थिक आत्मनिर्भरता। जब किसी क्षेत्र में फैक्ट्री लगती है, तो वह केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं होता। वह रोजगार के सैकड़ों अवसर लेकर आता है, स्थानीय अर्थव्यवस्था में पैसा दौड़ता है, और युवाओं को पलायन करने से रोकता है।

  • दोहरे मापदंड: नागरिकों द्वारा एक ओर बुनियादी सुविधाओं (सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य) की मांग करना और दूसरी ओर विकास परियोजनाओं (जैसे दासिया की फैक्ट्री) का विरोध करना विरोधाभासी है।
  • विकास की कीमत: औद्योगिक विकास के बिना राजस्व (Revenue) उत्पन्न करना असंभव है, और राजस्व के अभाव में सरकारी सुविधाओं का निर्माण और रखरखाव संभव नहीं है।
  • रोजगार का अवसर: फैक्ट्री का विरोध करना प्रत्यक्ष रूप से स्थानीय युवाओं के रोजगार के अवसर और आर्थिक आत्मनिर्भरता को खत्म करना है।
  • पलायन की समस्या: यदि स्थानीय स्तर पर विकास नहीं होगा, तो युवाओं का पलायन (Migration) जारी रहेगा। विरोध करने वाले लोग भविष्य में इसी बेरोजगारी के लिए जिम्मेदार होंगे।
  • विकास बनाम संकीर्ण मानसिकता: विकास के लिए बदलाव को स्वीकार करना आवश्यक है। किसी भी औद्योगिक परियोजना का बिना ठोस कारण के विरोध करना क्षेत्र को पिछड़ा बनाए रखने वाला कदम है।
  • जिम्मेदारी का बोध: सुविधाओं की सूची थामने वाले नागरिकों को यह समझना होगा कि विकास की ‘सुविधाएं’ और विकास की ‘प्रक्रियाएं’ (फैक्ट्री, निर्माण आदि) एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं; इन्हें अलग नहीं किया जा सकता।
  • निष्कर्ष: क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए विरोध की राजनीति छोड़कर प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है।

हमारा विरोधाभासी चरित्र

हैरानी इस बात पर होती है कि जो लोग आज फैक्ट्री का विरोध कर रहे हैं, वही कल ये कहते हुए पाए जाएंगे कि “क्षेत्र में रोजगार नहीं है” और “युवा भटक रहे हैं।” जो लोग आज प्रदूषण या अन्य बहाने बनाकर विकास को रोक रहे हैं, वही कल स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में रोते हुए दिखेंगे। याद रखिए, बिना औद्योगिक विकास के आने वाला राजस्व (Revenue) सरकारी खजाने में नहीं जाएगा, तो फिर वे सड़कें, वे पुस्तकालय और वे सामुदायिक भवन कहां से बनेंगे, जिनकी आप सूची थामे घूम रहे हैं?

दोहरे मापदंड बंद करें

सुविधाएं हमें ‘फ्री’ में चाहिए, पर विकास की ‘कीमत’ चुकाने को हम तैयार नहीं। अगर हमें एक आधुनिक गांव चाहिए, तो हमें औद्योगिकीकरण की धूल फांकने का साहस भी दिखाना होगा। यदि हम हर छोटे-बड़े प्रोजेक्ट का विरोध करेंगे, तो कल कोई भी निवेशक हमारे क्षेत्र की ओर रुख नहीं करेगा। फिर हम रोएंगे कि हमारा क्षेत्र पिछड़ा रह गया।

अंतिम चेतावनी

यह समय आत्ममंथन का है। या तो हम अपनी संकीर्ण मानसिकता से बाहर निकलकर प्रगति का स्वागत करें, या फिर अपनी विकास की उन सूचियों को फाड़कर फेंक दें। विकास और विरोध—ये दोनों नाव एक साथ नहीं चल सकतीं। अगर फैक्ट्री का विरोध जारी रहा, तो याद रखिए, कल जब क्षेत्र के युवा रोजगार के लिए शहर की सड़कों पर भटकेंगे, तो उस जिम्मेदारी का एक बड़ा हिस्सा उन लोगों पर भी होगा, जिन्होंने आज विकास को अपने स्वार्थ की भेंट चढ़ा दिया है।

विकास चाहिए, तो बदलाव को अपनाना सीखिए!

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