आजादी के सच्चे सिपाही थे हबीबुल्लाह..

सिद्धार्थनगर जंग-ए-आजादी में डुमरियागंज कस्बा निवासी एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. हबीबुल्लाह का योगदान हमेशा याद किया जाएगा। मातृभूमि की आजादी के लिए हर पल संघर्ष को तैयार रहने वाले हबीबुल्लाह ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ डटकर आवाज बुलंद की। फिरंगियों ने उन पर कई बार जुल्म ढाए। उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया और कोड़ों से निर्ममता से पीटा गया, लेकिन उनके हौसले कभी नहीं डगमगाए।

जब देश पर गुलामी की जंजीरें कस चुकी थीं और स्वतंत्रता सेनानी आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे, तब हबीबुल्लाह भी बिना किसी भय के इस संघर्ष का हिस्सा बन गए। उनके परिजन तुफैल अहमद के मुताबिक, वह सरदार वल्लभभाई पटेल से प्रेरित थे और जगह-जगह जनसभाएं कर लोगों में आजादी की अलख जगाते थे। अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज बुलंद करने में वह हमेशा आगे रहते थे।
सन 1941 के सत्याग्रह आंदोलन के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। जेल में उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं। कोर्ट में पेशी के दौरान जज ने 50 रुपये जमा करने पर उन्हें रिहा करने का प्रस्ताव दिया, लेकिन हबीबुल्लाह ने इसे ठुकरा दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह अपने रुपये देकर अंग्रेजों को देश में राज करने में मदद नहीं करेंगे। इसके बाद उन्होंने बिना किसी झिझक के जेल जाना स्वीकार किया।
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनका संघर्ष और तेज हो गया। अंग्रेजी हुकूमत ने 20 अगस्त 1942 को उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद 11 नवंबर 1943 तक, करीब डेढ़ वर्ष तक वह जेल में बंद रहे। इस दौरान उनके परिवार को भी अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचार झेलने पड़े। बताया जाता है कि अंग्रेजों ने उनके घर का बर्तन और खाद्य सामग्री तक उठा ली थी, जिससे परिवार को भारी
कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
स्व. हबीबुल्लाह की पत्नी कनीज जोहरा भी अपने जीवनकाल में अक्सर उनके संघर्ष की बातें बताया करती थीं। वह कहती थीं कि हबीबुल्लाह न केवल स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे, बल्कि लोगों के भीतर राष्ट्रप्रेम की भावना जगाने के लिए भी हमेशा तत्पर रहते थे।
उनके अदम्य साहस, त्याग और बलिदान ने डुमरियागंज के इतिहास में उनका नाम अमर कर दिया। उनके योगदान को सम्मान देते हुए शासन ने वर्ष 2008 में डुमरियागंज को नगर पंचायत का दर्जा दिए जाने के समय वार्ड संख्या तीन, जहां उनका घर स्थित है, का नाम आधिकारिक रूप से ‘हबीबुल्लाह नगर वार्ड’ रखा। यह सम्मान न केवल उनके संघर्ष की याद दिलाता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का प्रतीक है।
आज भी लोग स्व. हबीबुल्लाह को श्रद्धा और सम्मान के साथ नमन करते हैं। उनकी संघर्षगाथा सुनकर नई पीढ़ी को देश की आजादी के लिए किए गए बलिदानों की याद आती है। हबीबुल्लाह न केवल डुमरियागंज, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा और गौरव के प्रतीक हैं।
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