सुप्रीम कोर्ट का कड़ा फरमान: पत्रकारों पर फर्जी केस लादने वाले अफसरों की अब खैर नहीं

अजीत मिश्रा (खोजी)
वर्दी और कुर्सी के अहंकार पर सुप्रीम कोर्ट की चाबुक: पत्रकारों पर फर्जी केस लादने वाले अफसरों की अब खैर नहीं
- ‘ललिता कुमारी’ और ‘अभिषेक उपाध्याय’ जजमेंट: बिना 7-14 दिन की प्राथमिक जांच एफआईआर गैर-कानूनी,
आलोचनात्मक रिपोर्टिंग मौलिक अधिकार - फर्जी मुकदमे लिखने वाले अफसरों के वेतन से कटेगा मुआवजा: मानहानि और कठोर धाराओं के शिकंजे में फंसेगा प्रशासनिक अहंकार
- कैमरा छीना तो सीधे ‘झपटमारी’ और ‘साक्ष्य नष्ट’ करने का मुकदमा: कमरों के भीतर ऑफ-कैमरा सौदेबाजी का खेल खत्म
- दफ्तर छोड़कर धरने पर बैठने वाले बाबुओं से भी हो सवाल: जनता का काम ठप करने वालों पर क्यों न दर्ज हो ‘बाधा’ का केस?
- संविधान का अनुच्छेद 14 याद दिला रहा है कानून की ताकत: कुर्सी के नशे में चूर अधिकारियों के गिरेबान तक पहुंचता शिकंजा
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कुचलने और अपनी तानाशाही से व्यवस्था को बंधक बनाने वाले भ्रष्ट और रसूखदार अधिकारियों के दिन अब लदने वाले हैं। कानून की नजर में कोई भी कुर्सी या पद संविधान से ऊपर नहीं है—चाहे वह पुलिस हो, प्रशासन हो, नगर निगम हो या शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग। सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख ने साफ कर दिया है कि सत्ता के नशे में चूर अधिकारियों द्वारा पत्रकारों और आम नागरिकों पर फर्जी मुकदमे थोपने का पुराना खेल अब और नहीं चलेगा।
‘ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ का ऐतिहासिक फैसला यह स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है कि बिना 7 से 14 दिनों की प्राथमिक जांच के किसी भी मामले में सीधे एफआईआर दर्ज करना गैर-कानूनी है। वहीं, ‘अभिषेक उपाध्याय बनाम यूपी राज्य’ मामले में सर्वोच्च अदालत ने मुहर लगा दी है कि प्रशासन की कमियों और कुव्यवस्था पर सवाल उठाना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत पत्रकार का मौलिक अधिकार है। केवल तीखी या आलोचनात्मक रिपोर्टिंग करने मात्र से किसी कलमकार पर आपराधिक मुकदमा नहीं ठोका जा सकता।
सरकारी दफ्तरों के बाहर आम जनता का शोषण, रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार उजागर करना पत्रकारों का कर्तव्य है। अब अधिकारी कमरों के भीतर मोबाइल और माइक बाहर रखवाकर ‘ऑफ-कैमरा’ सौदेबाजी करने का षड्यंत्र नहीं रच सकते। जनता की गाढ़ी कमाई के टैक्स से वेतन पाने वाले बाबू और अफसर यह कान खोलकर सुन लें कि कवरेज के दौरान बातचीत अब ऑन-कैमरा ही होगी और वही वीडियो साक्ष्य अदालत में सच्चाई बयां करेगा। ‘सरकारी काम में बाधा’ का मनगढ़ंत और फर्जी आरोप लगाकर मीडिया और जनता की आवाज दबाने वाले अफसरों को अब अपनी हर मनमानी का ठोस वीडियो और लिखित प्रमाण देना होगा।
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब आम नागरिक या पत्रकार अपने वाजिब अधिकारों के लिए सवाल पूछता है, तो सिस्टम उसे तुरंत काम में बाधा का आरोपी बना देता है। लेकिन जब टैक्स के पैसों से पलने वाले यही कर्मचारी दफ्तरों को वीरान छोड़कर धरने पर बैठ जाते हैं और जनता के जरूरी काम ठप कर देते हैं, तो क्या उन पर जनता के कार्यों में बाधा डालने का मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए? क्या उन्होंने अपनी नौकरी और जनता के प्रति जवाबदेही का त्याग कर दिया है?
यदि कोई अधिकारी अपनी हनक में आकर कवरेज के दौरान पत्रकार का मोबाइल या कैमरा छीलता है, तो वह सीधा अपराध है जो झपटमारी (धारा 303) और साक्ष्य नष्ट करने (धारा 238) के साथ-साथ आईटी एक्ट के दायरे में आता है। दुर्भावना से प्रेरित होकर फर्जी केस दर्ज कराने वाले अफसरों पर धारा 217 और 248 के तहत सीधी कानूनी कार्रवाई तय है। यदि उच्च न्यायालय (High Court) से ऐसा कोई फर्जी मुकदमा निरस्त होता है, तो पीड़ित को मिलने वाला मुआवजा दोषी अधिकारी के व्यक्तिगत वेतन से काटा जाएगा। इसके अलावा, अदालत से बरी होने के बाद पत्रकार के पास धारा 356 के तहत मानहानि का मुकदमा ठोकने का पूरा कानूनी अधिकार सुरक्षित है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत कानून सबके लिए समान है। एसी कमरों की ठंडी हवा में बैठकर तानाशाही चलाने वाले भूल जाएं कि कानून उनकी जेब में है; संविधान की किताब अब ऐसे हर भ्रष्ट और अहंकारी अफसर के गिरेबान तक पहुंचने लगी है।
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