लोक कला बचाने पर शाहपुर में हुआ बड़ा मंथन | कविता, रंगमंच और संस्कृति से सजा शाहपुर

शाहपुर में शुरू हुआ तीन दिवसीय मधुबनी नाट्य महोत्सव
उद्घाटन समारोह में मिथिला की लोक कला और संस्कृति के संरक्षण पर दिया जोर, पहले दिन कवि सम्मेलन व सेमिनार का आयोजन
सकरी, 21 सितंबर। पंडौल प्रखंड के शाहपुर में सोमवार को तीन दिवसीय मधुबनी नाट्य महोत्सव का शुभारंभ हुआ।
दीप प्रज्वलित कर स्थानीय नगर विधायक माधव आनंद, संतोष झा, स्थानीय प्रतिनिधि गोपाल झा, फिल्म अभिनेता अर्जुन राय और संस्था के अध्यक्ष रवि रंजन कुमार ने संयुक्त रूप से महोत्सव का उद्घाटन किया। कार्यक्रम के बाद आयोजन समिति की ओर से अतिथियों और कवियों को मिथिला की पारंपरिक पाग, दुपट्टा और स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया।
महोत्सव का आयोजन आदर्श महिला मंडल, लडूगामा के तत्वावधान में किया जा रहा है। इसे सांस्कृतिक कार्य निदेशालय, कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार सरकार की ओर से प्रायोजित किया गया है।
आयोजन का उद्देश्य मिथिला की लोक कला, लोकगीत, लोकनृत्य, नाट्य परंपरा और साहित्यिक विरासत के संरक्षण के साथ इन्हें आम लोगों तक पहुंचाना है। उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए विधायक माधव आनंद ने कहा कि मिथिला की पहचान उसकी समृद्ध कला और संस्कृति से है।
लोकगीत, लोकनृत्य और नाट्य परंपरा को बचाए रखने के लिए इस तरह के आयोजन जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि महोत्सव के माध्यम से क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
कवि सम्मेलन में खूब बजी तालियां
महोत्सव के पहले दिन फिल्म अभिनेता अर्जुन राय के निर्देशन में कवि सम्मेलन और सेमिनार का आयोजन किया गया। कवि सम्मेलन में हास्य-व्यंग्य सहित विभिन्न विषयों पर कवियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं।
प्रस्तुतियों के दौरान दर्शकों ने जमकर तालियां बजाईं। कई रचनाओं पर श्रोता हंसी से लोटपोट होते नजर आए।
कवि सम्मेलन में कमलेश प्रमेंद्र, दीपक सर, बंशीधर मिश्रा, आनंद मोहन झा, शारदा झा, मालती मिश्रा, सुनाम जस्टि, डॉ. अवधेश नारायण झा और शक्ति ठाकुर ने कविता, गजल और काव्य पाठ किया।
लोक नाट्य के संरक्षण पर हुई चर्चा
सेमिनार का विषय ‘लोक कला एवं लोक नाट्य का संरक्षण’ रखा गया था। मुख्य वक्ता डॉ.
अवधेश झा ने कहा कि नाट्य कला भारतीय संस्कृति की प्राचीन परंपराओं में शामिल है। नाटक केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि इसके जरिए समाज की समस्याओं, परंपराओं, भावनाओं और सामाजिक परिस्थितियों को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया जाता है।
उन्होंने कहा कि रंगमंच के माध्यम से सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों को लोगों तक आसानी से पहुंचाया जा सकता है। शैलेश कुमार ने कहा कि लोक नाट्य का सीधा संबंध समाज और आम लोगों के जीवन से है।
इसमें ग्रामीण जीवन, रीति-रिवाज, लोकविश्वास, धार्मिक आस्था और सामाजिक संबंधों की झलक मिलती है। गीत, संगीत, संवाद और नृत्य लोक नाट्य की प्रस्तुति को प्रभावी बनाते हैं।
उन्होंने लोक नाट्य की सहजता और स्थानीयता को इसकी प्रमुख विशेषता बताया। सेमिनार में इंद्रा भूषण रमन बमबम, जटाधार पासवान और रानी झा ने भी अपने विचार रखे।
कार्यक्रम में निशात कुमार और सुमन सहित अन्य कलाकारों ने सहभागिता की। मंच संचालन और उद्घोषणा शारदा झा एवं आनंद मोहन झा ने की।
तीन दिवसीय महोत्सव के अगले दो दिनों में भी विभिन्न सांस्कृतिक और नाट्य कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। आयोजन को लेकर स्थानीय कलाकारों और कला प्रेमियों में उत्साह है।
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