*पूजा, गीत और करमा नृत्य के बीच पीढ़ियों से जीवित है जनजातीय समाज की समृद्ध परंपरा*

कोरिया – रात का सन्नाटा गहराता है और गांव के आंगन में करम की हरी डाली के आसपास उत्सव का रंग चढ़ने लगता है। मिट्टी के दीपक की रोशनी, मांदर की थाप और लोकगीतों की लय के बीच महिलाएं गोल घेरा बनाकर करमा नृत्य करती हैं। पुरुष पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन साधते हैं। कहीं अच्छी फसल की कामना है तो कहीं परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना। बच्चों के लिए उत्सव कौतूहल और उमंग से भरा है, जबकि बुजुर्गों की स्मृतियों में इस पर्व से जुड़ी पीढ़ियों पुरानी कथाएं जीवित हैं।
यही कर्मा पर्व है—प्रकृति, कृषि, आस्था और सामुदायिक जीवन को एक सूत्र में जोड़ने वाला लोकपर्व। अंचल के जनजातीय समाज में यह पर्व केवल पूजा का अवसर नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है।
*करम की डाली बनी प्रकृति और समृद्धि का प्रतीक*
कर्मा पर्व की प्रमुख परंपरा करम वृक्ष की डाली से जुड़ी है। पर्व के अवसर पर करम की डाली लाकर गांव के पटेल अथवा प्रमुख व्यक्ति के आंगन में स्थापित की जाती है। इसे करम देवता का प्रतीक मानकर विधि-विधान से पूजा की जाती है।
लोकमान्यता के अनुसार करम देवता के समक्ष अच्छी फसल, समय पर वर्षा, परिवार की खुशहाली और गांव के कल्याण की कामना की जाती है। इस परंपरा में प्रकृति के प्रति सम्मान और कृषि पर निर्भर जीवन की उम्मीद दोनों दिखाई देती हैं।
*जाईं की हरियाली में छिपी है अच्छी फसल की आस*
कर्मा पर्व की तैयारी भी अपने आप में एक खास परंपरा है। तीजा पर्व के अवसर पर महिलाएं टोकरी में जौ, गेहूं, मक्का, धान सहित विभिन्न फसलों के बीज बोती हैं। कुछ दिनों में इन बीजों से हरे-हरे अंकुर निकलते हैं, जिन्हें स्थानीय परंपरा में ‘जाईं’ कहा जाता है।
पर्व तक जाईं हरियाली से भर जाती है। इसे फूलों से सजाकर दीपक जलाया जाता है और पूजा में अर्पित किया जाता है। खेतों में लहलहाती फसल की उम्मीद और जीवन में समृद्धि की कामना इस परंपरा से जुड़ी हुई है।
*कर्म और करम का संदेश*
लोकमान्यता में कर्मा को कर्म और करम से जोड़कर देखा जाता है। कर्म यानी मेहनत और करम यानी शुभफल। इसी सोच के साथ यह पर्व मेहनत, प्रकृति और अच्छे परिणाम की कामना का संदेश देता है।
कृषि प्रधान समाज के लिए इसका महत्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि खेती और मौसम की अनिश्चितताओं के बीच अच्छी फसल की उम्मीद जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। कई क्षेत्रों में इस अवसर पर बहनें भाइयों की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए व्रत भी रखती हैं।
*इस तरह कर्मा पर्व प्रकृति और कृषि के साथ पारिवारिक रिश्तों को भी जोड़ता है।*
*बैगा की कथा से जुड़ी लोकस्मृतियां*
पूजा के दौरान गांव के बैगा की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। बैगा द्वारा करम राजा की कथा सुनाई जाती है और ग्रामीण श्रद्धापूर्वक उसका श्रवण करते हैं।
इन कथाओं का महत्व केवल धार्मिक मान्यता तक सीमित नहीं है। इनके माध्यम से लोकज्ञान, परंपराएं और सांस्कृतिक स्मृतियां एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती हैं। यही मौखिक परंपरा जनजातीय संस्कृति की निरंतरता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
*मांदर की थाप पर शुरू होता है करमा नृत्य*
पूजा पूरी होने के बाद रात का उत्सव अपने चरम पर पहुंचता है। मांदर की थाप तेज होती है और करमा नृत्य शुरू हो जाता है। महिलाएं एक-दूसरे का हाथ थामकर या श्रृंखला बनाकर गोल घेरे में नृत्य करती हैं। पुरुष गायक और वादक गीतों की लय साधते हैं।
मांदर, झांझ और मोहरी की धुन के बीच पूरा वातावरण जीवंत हो उठता है। करमा नृत्य की खासियत यह है कि इसमें सामूहिकता प्रमुख होती है। गीतों में खेत, जंगल, रिश्ते, प्रेम, प्रकृति और रोजमर्रा के जीवन की झलक मिलती है।
*पर्व बन जाता है सामाजिक मेल-मिलाप का अवसर*
कर्मा पर्व परिवार और समाज को करीब लाने का अवसर भी है। रिश्तेदार और समुदाय के लोग एक साथ जुटते हैं, पूजा में शामिल होते हैं, गीत गाते हैं और नृत्य करते हैं।
नई पीढ़ी इस आयोजन के माध्यम से अपनी पारंपरिक संस्कृति से जुड़ती है। बुजुर्गों से सीखी गई लोककथाएं, गीत और नृत्य आगे बच्चों तक पहुंचते हैं। इस तरह उत्सव के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासत का हस्तांतरण भी लगातार चलता रहता है।
*अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रंग, लेकिन भावना एक*
कर्मा पर्व छत्तीसगढ़ के साथ झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के कई क्षेत्रों में भी स्थानीय परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है। गोंड, संथाल, मुंडा और हो सहित विभिन्न समुदायों में इसके आयोजन के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं।
कहीं पूजा प्रमुख होती है, कहीं लोकगीत और नृत्य उत्सव का केंद्र बनते हैं, तो कहीं सामूहिक भोज और स्थानीय परंपराओं का विशेष महत्व होता है। रीति-रिवाजों में विविधता के बावजूद प्रकृति के प्रति सम्मान, अच्छी फसल की कामना और सामूहिक खुशियों की भावना इन परंपराओं को एक-दूसरे से जोड़ती है।
*लोकसंस्कृति की धड़कन है कर्मा*
कर्मा पर्व में करम की डाली आस्था का प्रतीक है, जाईं आने वाली फसल की उम्मीद जगाती है और मांदर की थाप समाज की सामूहिक ऊर्जा को स्वर देती है। पूजा से लेकर गीत और नृत्य तक हर परंपरा जनजातीय जीवन की अपनी एक कहानी कहती है।
यही वजह है कि कर्मा केवल कैलेंडर में आने वाला एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, मेहनत, रिश्तों और सामुदायिक जीवन से जुड़ी जीवंत लोकपरंपरा है। जब तक नई पीढ़ी मांदर की थाप पर कदम मिलाती रहेगी और बुजुर्गों की लोककथाएं अगली पीढ़ी तक पहुंचती रहेंगी, तब तक कर्मा पर्व की यह सांस्कृतिक विरासत भी जीवित रहेगी।
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