गोरखनाथ मंदिर गोरखपुर में आज श्रीमद्भागवत कथा कथा के पांचवें दिन भक्तों की भारी भीड़


गोरखनाथ/गोरखपुर
रिपोर्ट बुद्धेश मणि पाण्डेय जिला प्रभारी।
युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं एवं राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि के अवसर पर श्री गोरखनाथ मंदिर, गोरखपुर में आयोजित ‘सप्त दिवसीय पुण्यतिथि समारोह’ के अंतर्गत आज ‘श्रीमद्भागवत महापुराण कथा ज्ञान-यज्ञ’ के चतुर्थ दिवस पर कथा व्यास श्रीमज्जगद्गुरु द्वाराचार्य, अग्रपीठाधीश्वर एवं मलूकपीठाधीश्वर स्वामी श्री राजेंद्र दास देवाचार्य जी महाराज ने सीता वन गमन, लव-कुश जन्म सहित श्रीरामचरितमानस और श्रीमद्भागवत के विभिन्न प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया।
कथा व्यास श्रीमज्जगद्गुरु द्वाराचार्य, अग्रपीठाधीश्वर एवं मलूकपीठाधीश्वर स्वामी श्री राजेंद्र दास देवाचार्य जी महाराज ने कहा कि जानकी जी उसी समय महर्षि वाल्मीकि जी के आश्रम पहुंचती हैं, जब वाल्मीकि जी श्रीरामायण की रचना करने का निश्चय करते हैं। उन्होंने जानकी जी को आश्रम में स्थान दिया और उनकी कृपा से ही इतना महान काव्य लिखा गया।
शिक्षा वहां से प्रारंभ होती है, जहां धर्म और संस्कारों से युक्त व्यक्तित्व सामने होता है। बच्चा वही सीखता है, जो वह प्रत्यक्ष रूप से देखता है। इसलिए माता-पिता को अपने घर में बच्चों के सामने अपना उत्तम चरित्र और आदर्श आचरण प्रस्तुत करना चाहिए।
किसी व्यक्ति को हमारे बोलने से उतनी प्रेरणा नहीं मिलती, जितनी हमारे व्यवहार से मिलती है। संपूर्ण धर्म के मूल परमात्मा हैं। जिस कर्म को करने से आत्मग्लानि के स्थान पर आत्मसुख की अनुभूति होती है, वह धर्म का मूल है। वहीं, जिस कर्म को करने के बाद हृदय में पश्चाताप उत्पन्न हो और दूसरे को भी दुःख पहुंचे, वह अधर्म का मूल है। धर्म और सदाचार में धर्मनिष्ठ व्यक्ति के अंतःकरण की प्रवृत्तियां ही प्रमाण होती हैं। धर्मनिष्ठ व्यक्ति स्वप्न में भी गलत आचरण नहीं कर सकता।
अपराधी को अपराध का दंड न दिया जाए तो दूसरे लोगों की भी अपराध में प्रवृत्ति बढ़ती है। उत्तर प्रदेश में गोरक्षपीठाधीश्वर, महंत श्री योगी आदित्यनाथ जी महाराज बिना भेदभाव और बिना पक्षपात के अपराधियों को कठोर दंड देने की नीति पर कार्य कर रहे हैं, जिससे व्यवस्था सुचारु रूप से चल रही है।
जो व्यक्ति प्राणि मात्र के प्रति दया, क्षमा और करुणा का व्रत ले लेता है, उससे भगवान प्रसन्न होते हैं। भगवान के प्रसन्न होने से संसार के सभी लोग भी उससे प्रसन्न होते हैं। यही समता का व्यवहार है, जिसमें सभी के प्रति समान भाव से प्रेम किया जाता है। यही संतों का व्यवहार है। संत स्वयं कष्ट सहकर भी कभी किसी को कष्ट नहीं देते।
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