बस्ती: DPRO घनश्याम सागर के नोटिस का खेल या अवैध वसूली का नया जरिया? जांच के घेरे में परसरामपुर का मामला

अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती में DPRO घनश्याम सागर का कारनामा: नोटिस का डर दिखा कर अवैध वसूली का खेल या प्रशासनिक मिलीभगत?
- “ऐसा पानी पीता हूं…” वाली कहावत चरितार्थ कर रहे DPRO घनश्याम सागर! नोटिस का डर दिखा कर मलाई काटने की चर्चा
- नोटिस में करोड़ों का फर्जी भुगतान, पोर्टल पर सब साफ! सीएम पोर्टल को मजाक बना रहे जिम्मेदार अधिकारी
- जब बिना अनुमति के भुगतान हुआ ही नहीं, तो DPRO ने बीडीओ को नोटिस क्यों भेजा? सवालों के घेरे में प्रशासनिक कार्यप्रणाली
- सेवानिवृत्ति के नजदीक आते ही DPRO के ‘कारनामे’ तेज: परसरामपुर ब्लॉक के खेल पर गरमाई जिले की सियासत
बस्ती: “ऐसा पानी पीता हूं कि खुदा भी नहीं जानता है”—पुरानी कहावत को बस्ती के जिला पंचायत राज अधिकारी (DPRO) घनश्याम सागर इन दिनों चरितार्थ करते नजर आ रहे हैं। जैसे-जैसे DPRO की सेवानिवृत्ति की तिथि नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे उनके कार्यकाल में भ्रष्टाचार के नए अध्याय जुड़ने की चर्चाएं जोरों पर हैं। ताजा मामला ब्लॉक परसरामपुर से जुड़ा है, जहां नोटिस जारी करने से लेकर आईजीआरएस (IGRS) पोर्टल पर मनगढ़ंत रिपोर्ट लगाने तक का पूरा खेल प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
मुख्य बिंदु: क्या है पूरा मामला?
- नोटिस और गंभीर आरोप: DPRO घनश्याम सागर ने 13 अगस्त 2026 को बीडीओ (BDO) परसरामपुर को एक नोटिस जारी किया था। इसमें आरोप लगाया गया था कि विकास खंड की ग्राम पंचायतों में बिना जिलाधिकारी (DM) की अनुमति के राज्य और केंद्रीय वित्त आयोग के करोड़ों रुपये का मनमाने ढंग से भुगतान किया गया है। DPRO ने 7 दिन के भीतर इस पर स्पष्टीकरण तलब किया था।
- आईजीआरएस पोर्टल पर यू टर्न: एक तरफ जहां नोटिस में करोड़ों के अवैध भुगतान और वित्तीय नियमों की अनदेखी का दावा किया गया, वहीं सीएम पोर्टल/आईजीआरएस पर अपलोड की गई रिपोर्ट में इसके विपरीत दावा किया गया कि बिना डीएम की अनुमति के कोई भुगतान नहीं हुआ है और सभी प्रक्रियाएं पूर्ण हैं।
- अवैध वसूली की आशंका: सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि ब्लॉक परसरामपुर में सब कुछ नियमानुसार था और बिना डीएम की अनुमति के भुगतान नहीं हुआ था, तो DPRO ने बीडीओ को नोटिस क्यों जारी किया था? क्या यह नोटिस केवल कागजी घोड़े दौड़ाकर अपनी जेब भरने और अवैध वसूली का एक जरिया मात्र था?
सीएम पोर्टल बनता जा रहा है ‘हंसी-मजाक’?
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जनता की शिकायतों के निस्तारण के लिए बनाए गए सीएम पोर्टल और आईजीआरएस जैसी पारदर्शी व्यवस्थाओं पर जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा फर्जी और विरोधाभासी रिपोर्ट लगाना व्यवस्था का मखौल उड़ाना है। जब ऐसे मामलों में लीपापोती करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं होती, तो पीड़ित जनता न्याय की उम्मीद किससे करे?
नोटिस जारी होने के कुछ ही दिनों बाद अचानक कैसे सारी प्रक्रियाएं वैध हो गईं और डीएम की अनुमति की औपचारिकताएं पूरी हो गईं? यह जांच का एक ऐसा विषय है, जिस पर जिले भर में तरह-तरह की चर्चाएं गर्म हैं।
निष्कर्ष और सख्त सवाल
क्या शासन-प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारी अपनी कुंभकर्णी नींद से जागेंगे? क्या सेवानिवृत्ति के मुहाने पर खड़े DPRO घनश्याम सागर के इन कथित कारनामों और विरोधाभासी रिपोर्टों की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच होगी? यदि ऐसे मामलों पर पर्दा डाला जाता रहा, तो सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार और अवैध वसूली का यह खेल यूं ही आम जनता के अधिकारों का गला घोंटता रहेगा।
बड़ा सवाल: जब नोटिस में वित्तीय अनियमितता का दावा किया गया था, तो जांच के नाम पर लीपापोती कर मामले को दबाना आखिर किसकी शह पर हो रहा है?
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