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मन को करें शांत, ध्यान प्रभु में लगाएं… पं लोकेश महाराज

19 Oct 2026, 01:30 AM • Vande Bharat Live TV News
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मन को करें शांत, ध्यान प्रभु में लगाएं... पं लोकेश महाराज - बलौदाबाजार-भाटापारा, छत्तीसगढ़

बिल्हा नगर पंचायत के वार्ड क्रमांक 14 -15 केसला में भागवत कथा का आज आठवां दिवस रहा जिसमें पूज्य श्री लोकेश महाराज के द्वारा किस तरह से कृष्णराज में बृजवासी रहे और किस तरह से भगवान ने परमधाम को प्राप्त किया साथ ही साथ राजा परीक्षित का भी मोक्ष प्राप्ति की कथा का आज रसपान हुआ जिसमें कथा का रसपान कराते हुए महाराज जी ने बताया कि महर्षि दुर्वासा ने यदुवंशियों को यह श्राप दिया था कि उनके ही कुल के नाश का कारण एक लोहे का मूसल (कढ़ाई) बनेगा।

श्राप का कारण

एक बार श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब और अन्य यदुवंशी युवकों ने आपस में मजाक करते हुए साम्ब के पेट पर लोहे की एक कढ़ाई (या मुसल जैसी वस्तु) बांधकर उसे स्त्री के वस्त्र पहना दिए। वे लोग ऋषि दुर्वासा के पास गए और उनसे पूछा कि इस स्त्री के गर्भ से क्या उत्पन्न होगा।अपने दिव्य ज्ञान से दुर्वासा ऋषि यह छल तुरंत समझ गए। वे अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने श्राप दिया कि "यह जिस वस्तु को गर्भ समझकर लेकर आए हो, इससे पूरे यादव कुल का नाश हो जाएगा, न कोई लड़का होगा और न लड़की"और
जब श्री कृष्ण को इस श्राप के बारे में पता चला, तो उन्होंने उस लोहे की कढ़ाई को घिसकर उसका चूर्ण समुद्र या नदी में प्रवाहित करने का आदेश दिया।उस चूर्ण से उत्पन्न नरकट (घास) और बचे हुए लोहे के एक टुकड़े से मूसल एवं तीर बना।जो कालान्तर में, आपसी कलह के दौरान इन्हीं हथियारों और सरकंडों से यदुवंशी आपस में लड़कर समाप्त हो गए।

*जो जन्म लेता है उसे मृत्यु अवश्य आती है–पं लोकेश महराज*

महराज जी ने महाभारत युद्ध के 36 साल बाद भगवान श्रीकृष्ण की पृथ्वी की लीला समाप्त होने और उनके परमधाम (गोलोक / वैकुंठ) गमन की कथा को बताया कि

1. *गांधारी का शाप और यदुवंश का विनाश*

महाभारत के युद्ध के बाद जब भगवान श्रीकृष्ण गांधारी को सांत्वना देने पहुंचे, तो पुत्रों के शोक में डूबीं गांधारी ने क्रोधित होकर उन्हें शाप दिया कि जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है, उसी तरह यदुवंश का भीसपन्न हो जाएगा। शाप के प्रभाव से कुछ समय बाद द्वारका में रहने वाले यदुवंशी आपस में ही मदिरापान के नशे में एक उत्सव के दौरान लड़ने लगे और एक-दूसरे का संहार कर बैठे। बलराम जी भी बाद में योगबल से समुद्र तट पर अपने शरीर का त्याग कर धाम को पधारे।

2. पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान और जरा शिकारी की घटना

समस्त यदुवंश के विनाश और बड़े भाई बलराम के जाने के बाद, भगवान श्रीकृष्ण अकेले प्रभास क्षेत्र (गुजरात के वेरावल के पास) पहुंचे।वहां वे एक पीपल के वृक्ष के नीचे शांत भाव से योगनिद्रा या योगधारण में लीन हो गए।उसी समय 'जरा' नामक एक व्याध (शिकारी) वहां आया। दूर से देखने पर उसे श्रीकृष्ण के पैर का लाल तलवा किसी हिरण का मुख जैसा प्रतीत हुआ। उसने हिरण समझकर बाण छोड़ दिया, जो सीधे श्रीकृष्ण के चरण (पैर) में जाकर लगा।

3. शिकारी को क्षमा और परमधाम प्रस्थान

जब शिकारी जरा दौड़कर वहां पहुंचा और उसने भगवान श्रीकृष्ण को घायल अवस्था में देखा, तो वह अत्यंत भयभीत हो गया और क्षमा मांगने लगा।मगर भगवान श्रीकृष्ण ने उसे सांत्वना दी और उसके पूर्वजन्म के कर्मों का स्मरण कराते हुए उसे क्षमा कर दिया।
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपने शरीर का त्याग किया और अपने दिव्य प्रकाशपुंज रूप में सीधे अपने परमधाम (गोलोक / वैकुंठ) के लिए प्रस्थान किया।

*जब तक श्वास है तब तक प्रभु का नाम ले–पं लोकेश महाराज*

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम मित्र और भक्त उद्धव को जो उपदेश दिए, उन्हें 'उद्धव गीता' (श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्कंध के अंतर्गत) के रूप में जाना जाता है। जिसमें महराज जी ने विस्तार से बताते हुए कहा कि

1. मोह और आसक्ति का त्याग

श्रीकृष्ण ने बताया कि संसार और परिवार के प्रति निस्पृह (अनासक्ति) होना आवश्यक है।इसका अर्थ परिवार छोड़ना नहीं है, बल्कि मन से भौतिक वस्तुओं और संबंधों के परिणामों में उलझना नहीं है।उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, लेकिन सुख-दुख या मोह के बंधनों से खुद को ऊपर रखना चाहिए।

2. प्रकृति से शिक्षा (24 गुरुओं का उपदेश)

उद्धव को आध्यात्मिक ज्ञान देते हुए श्रीकृष्ण ने प्रकृति से सीखने की प्रेरणा दी और 24 गुरुओं का उल्लेख किया।इनमें पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, सूर्य, चंद्रमा, अजगर, मधुमक्खी और मकड़ी आदि शामिल हैं। उदाहरण के लिए—वायु से सीखा जा सकता है कि कैसे संसार की वस्तुओं के बीच रहकर भी बिना आसक्त हुए स्वतंत्र रहा जाए।

3. आत्मा और शरीर का भेद

श्रीकृष्ण ने उद्धव को समझाया कि यह नश्वर शरीर और आत्मा अलग-अलग हैं।जो लोग शरीर को ही आत्मा समझ लेते हैं, वे अज्ञान में रहकर कष्ट पाते हैं। वास्तविक ज्ञान वह है जिससे व्यक्ति स्वयं को नश्वर शरीर के परे अमर आत्मा के रूप में जाने।

4. कर्म और साक्षी भाव

भगवान ने समझाया कि प्रत्येक मनुष्य का जीवन उसके कर्मों के प्रतिफल के आधार पर चलता है।ईश्वर इसमें सीधा हस्तक्षेप नहीं करते, बल्कि एक तटस्थ 'साक्षी' (द्रष्टा) की तरह सब कुछ देखते हैं। इसलिए व्यक्ति को फल की चिंता किए बिना अपना स्वधर्म निभाना चाहिए।

5. भक्ति और आत्मज्ञान

जब उद्धव को अपने ज्ञान का अहंकार हो गया था और वह गोपियों को निर्गुण ब्रह्म व योग का उपदेश देने गए थे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें गोपियों के अनन्य प्रेम और भक्ति की श्रेष्ठता का एहसास कराया।
और अंत में श्रीकृष्ण ने उद्धव को बदरिकाश्रम जाने और आत्मज्ञान प्राप्त करने का मार्ग दिखाया। इस तरह से आज महाराज के श्री मुख से बहुत ही पवन एवं आत्म मंथन रूपी भक्ति का आनंद लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और महाराज जी ने बताया कि तीर्थ तो कई प्रकार के हैं छत्तीसगढ़ में कई तीर्थ है तीर्थ में धर्मों में जाना चाहिए और भगवान के दर्शन जरूर करना चाहिए मन को हमेशा विरक्ति में लगाना चाहिए आशक्ति में नहीं। क्योंकि इस भाव से पर होने का एकमात्र साधन है वहां है प्रभु का नाम प्रभु का भजन प्रभु का संकीर्तन से ही मीराबाई ने भवसागर से पर किया तुलसीदास भी भाव से पर हुआ। और ऐसे कई संत मुनि महात्मा है जिन्होंने भगवान के विभिन्न रूपों का विभिन्न मेट्रो चरण का ज्ञान दिया हम हमेशा प्रभु के//ओम नमो भगवते वासुदेवाय नमः//का नाम का जाप करना चाहिए जो मेत्रों में उत्तम माना जाता है। और भगवन नाम लेते हुए यह जीव को निर्मल और पावन रखने की सलाह एवं जीवन में धरती लोक रहते हुए जीवन में स्थिति परिस्थिति को सहने की कथा का आज बखान महाराज ने किए।

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