शरद पूर्णिमा: चंद्र किरणों का अमृत और पित्त शमन का प्राकृतिक विधान : डाक्टर प्रियंका शर्मा

शरद पूर्णिमा: चंद्र किरणों का अमृत और पित्त शमन का प्राकृतिक विधान : डाक्टर प्रियंका शर्मा
रिपोर्ट बुध्देश मणि पाण्डेय जिला प्रभारी।
सबलापुर, बहराइच, उत्तर प्रदेश
मानसून से शरद ऋतु में प्रवेश का संधिकाल है शरद पूर्णिमा। इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर अमृत वर्षा करता है, और आयुर्वेद के अनुसार यही क्षण शरीर में संचित पित्त दोष को शीतलता देकर आरोग्यता का मार्ग खोलता है।
ऋतु संधि का स्वर्णिम सेतु
वर्षा ऋतु की नमी और उमस जब धीरे-धीरे कम होने लगती है, तब प्रकृति एक अनोखे संधिकाल से गुजरती है ।ऋतु संधि। आयुर्वेद में इस संक्रमण काल को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि इसी समय शरीर भी अपनी प्रकृति बदलता है। मानसून के दौरान कमजोर हुई पाचनाग्नि जब शरद ऋतु की स्पष्ट, सुनहरी धूप का स्वागत करती है, तो शरीर में पित्त दोष प्रबल होने लगता है। शरद पूर्णिमा इसी संधिकाल का शिखर है—वह रात जब आकाश सबसे स्वच्छ होता है, चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होता है, और प्रकृति शरीर को शीतलता का वरदान देने के लिए तैयार होती है।
धार्मिक-आध्यात्मिक दृष्टि: अमृत वर्षा और महारास
शास्त्रों के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सभी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर पृथ्वी पर अमृत वर्षा करता है। यही कारण है कि इस रात को 'अमृत काल' भी कहा जाता है। पौराणिक मान्यता है कि इसी रात भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में महारास की रचना की थी, और इसी दिन मां लक्ष्मी का प्राकट्य भी हुआ था। चंद्रमा की सोलह कलाओं का प्रतीक केवल आकाशीय सौंदर्य नहीं है—यह मन, बुद्धि और प्राण के पूर्ण संतुलन का प्रतीक है, जिसे आयुर्वेद आरोग्यता के शीर्ष बिंदु के रूप में देखता है।
आयुर्वेदिक मर्म: पित्त दोष का शमन
वर्षा ऋतु में संचित पित्त शरद ऋतु के आते ही प्रकोप में आ जाता है। इसका प्रभाव शरीर पर तीन रूपों में दिखता है—त्वचा पर दाने या एक्जिमा, पाचन में अम्लता, और मन में चिड़चिड़ापन। शरद पूर्णिमा की चंद्र किरणें इस पित्त को शांत करने का प्राकृतिक उपाय हैं। आयुर्वेद में चंद्रमा को 'शीतल' और 'ओज' का कारक माना गया है। इस रात चंद्रमा की रोशनी में बैठना या चंद्र दर्शन करना शरीर के भीतर की गर्मी को कम करता है और मन को स्थिरता प्रदान करता है।
खीर का रहस्य: चांदनी, चांदी और गाय का दूध
शरद पूर्णिमा की रात सात्त्विक आहार के रूप में चावल और गाय के दूध से बनी खीर को खुले आकाश के नीचे चांदी के बर्तन में रखने की परंपरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहन वैज्ञानिक है।
चांदी का बर्तन: आयुर्वेद में चांदी को चंद्रमा की धातु माना गया है। चांदी में उच्च प्रतिरोधक क्षमता होती है और यह दूध के साथ मिलकर शरीर में शीतलता और प्रतिरक्षा का संचार करती है।
चंद्र किरणों का प्रभाव: चांदनी में रखी खीर की तासीर बदल जाती है। चंद्रमा की शीतल किरणें खीर के पोषक तत्वों को इस प्रकार सक्रिय करती हैं कि वह श्वास संबंधी रोगों, त्वचा विकारों और पाचन की गर्मी को शांत करने में सहायक हो जाती है।
गाय का दूध: गाय का दूध मधुर रसयुक्त और पित्तशामक होता है। चावल के साथ मिलकर यह शरीर को स्थायी ऊर्जा और आरोग्यता प्रदान करता है।
रात्रि के व्यावहारिक स्वास्थ्य सूत्र
चंद्र दर्शन और त्राटक: कुछ मिनटों तक बिना पलक झपकाए चंद्रमा को देखना (त्राटक) नेत्र विकारों को दूर करने और आंखों की रोशनी बढ़ाने में सहायक माना गया है।
प्राणायाम:* चंद्रभेदी प्राणायाम या अनुलोम-विलोम करने से शरीर की अतिरिक्त गर्मी बाहर निकलती है और मन शीतल होता है।
आहार संयम: इस रात भारी, तीखे, खट्टे और अत्यधिक तेल-मसाले वाले भोजन से बचें। खीर का सेवन सुबह प्रातःकाल में करें, जब वह चंद्रमा की ऊर्जा से पूर्ण हो चुकी हो।
जल का सेवन: तांबे के बर्तन में रखा पानी पीना पित्त को संतुलित करने में लाभकारी है।
आधुनिक जीवन में ऋतुचर्या का सार
शरद पूर्णिमा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि ऋतुचर्या का वह जीवंत उदाहरण है जहाँ विज्ञान और श्रद्धा एक साथ चलते हैं। आज जब हम एयर कंडीशनर और प्रोसेस्ड फूड के बीच जी रहे हैं, तब प्रकृति का यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है—शरीर को ऋतु के अनुसार ढालना ही सच्ची आरोग्यता है। इस शरद पूर्णिमा, चंद्रमा की शीतल किरणों में बैठिए, खीर को उस अमृत का स्वाद लेने दीजिए, और अपने भीतर के पित्त को शांत होने का अवसर दीजिए। यही है—प्रकृति का स्वास्थ्य विधान, और यही है—शरद पूर्णिमा का सच्चा आशीर्वाद।
डॉ. प्रियंका शर्मा
सहायक आचार्य एवं पंचकर्म विशेषज्ञ
डॉ. सर्वेश कुमार शुक्ला आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल,
सबलापुर, बहराइच, उत्तर प्रदेश
🔔 Vande Bharat News Alerts
नई प्रमुख खबरों की browser notification पाने के लिए Subscribe करें।







