

झारखंड के वन एवं कृषि क्षेत्रों में हाल के फील्ड रिसर्च के दौरान किए गए अवलोकनों से यह स्पष्ट होता जा रहा है कि परागणकर्ताओं, विशेषकर जंगली मधुमक्खियों की उपस्थिति पहले की तुलना में कई स्थानों पर कम हो रही है। यह गिरावट केवल एक पारिस्थितिक बदलाव नहीं, बल्कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा से जुड़ा एक गंभीर संकेत है।
अपने क्षेत्रीय अध्ययन के दौरान, मैंने जंगल और खेतों के आसपास जंगली मधुमक्खियों के छत्तों का दस्तावेज़ीकरण किया। इन अवलोकनों से यह सामने आया कि परागणकर्ता जंगल और खेती के बीच एक प्राकृतिक सेतु का काम करते हैं। दालें, सब्ज़ियाँ, फल और कई नकदी फसलें इन परागणकर्ताओं पर निर्भर हैं।फील्ड रिसर्च और वैश्विक अध्ययन क्या बताते हैं
संयुक्त राष्ट्र से जुड़े वैज्ञानिक मंच IPBES की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व की प्रमुख खाद्य फसलों के उत्पादन और गुणवत्ता में परागणकर्ताओं की भूमिका निर्णायक है।
1961 से 2012 के बीच परागण पर निर्भर कृषि उत्पादन चार गुना तक बढ़ चुका है, जिससे यह स्पष्ट है कि आधुनिक खाद्य प्रणाली पहले से कहीं अधिक परागणकर्ताओं पर निर्भर हो गई है।
मेरे फील्ड अवलोकनों में यह भी देखा गया कि जिन क्षेत्रों में जंगलों की कटाई बढ़ी है या रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग अधिक है, वहाँ परागणकर्ताओं की सक्रियता अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।झारखंड के संदर्भ में विशेष चिंता
झारखंड के आदिवासी और ग्रामीण इलाक़ों में खेती पारंपरिक और मिश्रित प्रणाली पर आधारित है, जहाँ जंगल और कृषि एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यहाँ जंगली मधुमक्खियाँ केवल शहद उत्पादन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे फसलों के परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
यदि यह संतुलन बिगड़ता है, तो उसका सीधा असर स्थानीय किसानों, फसल उत्पादन और ग्रामीण आजीविका पर पड़ेगा। खाद्य उत्पादन से आर्थिक जोखिम तक
फील्ड रिसर्च और अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों से यह भी संकेत मिलता है कि परागणकर्ताओं की गिरावट से फसल उत्पादन घट सकता है, जिससे खाद्य पदार्थों की उपलब्धता और कीमत दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
कुछ अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार, परागणकर्ता संकट को अभी भी कई बड़ी कंपनियाँ और निवेशक अपने आर्थिक जोखिम के रूप में पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाए हैं, जबकि यह भविष्य में एक महत्वपूर्ण वित्तीय जोखिम बन सकता है।निष्कर्ष
फील्ड रिसर्च से यह स्पष्ट है कि परागणकर्ताओं की रक्षा केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का प्रश्न है।
जंगलों और खेतों के बीच मौजूद इस अनदेखी कड़ी को समझना और संरक्षित करना आने वाले समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।




