

धार जिले से गोपाल मारु की रिपोर्ट
सरदारपुर। धार जिले के बदनावर विकासखंड में वर्षों से फर्जी जन्म प्रमाण पत्र बनाने का एक संगठित गोरखधंधा जिला प्रशासन और बदनावर स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे फलता-फूलता रहा। अधिकारियों की अनदेखी और कथित संरक्षण के चलते इस अवैध कारोबार पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। अंततः इन्वेस्टिगेशन टीम डिवीजन, पुलिस कार्यालय यवतमाळ (महाराष्ट्र) ने बदनावर तहसील के चिराखान गांव में छापा मारकर इस फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ किया और आरोपी को गिरफ्तार किया।
महाराष्ट्र पुलिस यवतमाळ को 16 दिसंबर 2025 को मिली थी शिकायत….महाराष्ट्र पुलिस, यवतमाळ के अनुसार दिनांक 16 दिसंबर 2025 को फर्जी जन्म प्रमाण पत्र बनाए जाने को लेकर उन्हें एक शिकायत प्राप्त हुई थी। शिकायत की गंभीरता को देखते हुए यवतमाळ पुलिस कार्यालय की इन्वेस्टिगेशन टीम डिवीजन द्वारा तत्काल एक विशेष टीम का गठन किया गया।
टीम गठन के पश्चात नियमानुसार दसाई पुलिस चौकी को पूरे मामले से अवगत कराया गया। जांच के दौरान प्रथम दृष्टया अपराध प्रमाणित पाए जाने पर संबंधित आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं सहित (आईटी) अधिनियम के तहत अपराध पंजीबद्ध किया गया।
जांच के क्रम में पुलिस टीम ने धार जिले की बदनावर तहसील के चिराखान गांव में दबिश देकर आरोपी को गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के बाद आरोपी को विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत महाराष्ट्र के यवतमाळ ले जाया गया, जहां उससे आगे की पूछताछ एवं कानूनी कार्रवाई जारी है।
डिजिटल सेंटर की आड़ में खुलेआम कानून का उल्लंघन…
धार जिले की बदनावर तहसील के चिराखान गांव में संचालित “मालिक डिजिटल” नामक डिजिटल सेंटर द्वारा जन्म प्रमाण पत्र बनाने के नाम पर खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं। बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के यह सेंटर जन्म प्रमाण पत्र जारी कर रहा था।इस गोरखधंधे को प्रदेशखबरदार अख़बार द्वारा लगातार उजागर किया गया, लेकिन इसके बावजूद स्थानीय प्रशासन आंखें मूंदे बैठा रहा, जिससे यह अवैध गतिविधि लंबे समय तक निर्बाध रूप से चलती रही।
कलेक्टर कार्यालय को थी पहले से लिखित जानकारी…*
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे मामले की लिखित जानकारी जिला कलेक्टर कार्यालय (जिला योजना एवं सांख्यिकी विभाग), धार को पहले से थी।
दिनांक 08 अगस्त 2025 को पत्र क्रमांक 2057 जारी कर—
सिविल सर्जन, जनपद पंचायत, नगर पालिका अधिकारी एवं खंड चिकित्सा अधिकारी
को स्पष्ट रूप से चेतावनी दी गई थी कि चिराखान स्थित एक डिजिटल ऑनलाइन सेंटर द्वारा संदिग्ध एवं अवैध जन्म प्रमाण पत्र जारी किए जा रहे हैं।
चेतावनी के बावजूद नहीं हुई कार्रवाई…*
उक्त पत्र में यह भी स्पष्ट उल्लेख था कि संबंधित डिजिटल सेंटर द्वारा सिविल अस्पताल बदनावर और सिविल अस्पताल सरदारपुर के नाम से फर्जी जन्म प्रमाण पत्र तैयार किए जा रहे हैं। इसके बावजूद
न तो डिजिटल सेंटर को सील किया गया, न कोई एफआईआर दर्ज की गई और न ही किसी जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई की गई…
परिणामस्वरूप मध्यप्रदेश का प्रशासन तमाशबीन बना रहा, जबकि कानून का डंडा चलाने का काम महाराष्ट्र पुलिस की इन्वेस्टिगेशन टीम ने किया।
*बदनावर सीबीएमओ की पूर्व सूचना – फिर भी कार्रवाई शून्य..*
बदनावर के सीबीएमओ डॉ. मुजालदा द्वारा पत्र क्रमांक 880, दिनांक 07 अगस्त 2025 को धार कलेक्टर कार्यालय (जिला योजना एवं सांख्यिकी विभाग) को स्पष्ट रूप से अवगत कराया गया था कि चिराखान गांव, तहसील बदनावर में संचालित एक डिजिटल ऑनलाइन सेंटर अवैध रूप से जन्म प्रमाण पत्र तैयार कर रहा है। यह सूचना किसी अफवाह पर आधारित नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत भेजा गया आधिकारिक पत्र था। इसका सीधा अर्थ यह है कि जिला प्रशासन को समय रहते पूरे फर्जीवाड़े की जानकारी थी, संबंधित सेंटर, स्थान और गतिविधि स्पष्ट रूप से चिन्हित थी, इसके बाद की अनदेखी को “अज्ञानता” नहीं कहा जा सकता…
फिर भी न तो तत्काल जांच बैठाई गई, न सेंटर सील किया गया और न ही पुलिस अथवा पंजीयन विभाग को सक्रिय किया गया।
*कलेक्टर के निर्देशों के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं?*
जब किसी मामले की सूचना सीबीएमओ स्तर से कलेक्टर को दी जाती है, तो यह अपेक्षित होता है कि
कलेक्टर स्तर से संबंधित विभागों को स्पष्ट निर्देश जारी हों, जनपद पंचायत, स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन तुरंत कार्रवाई करे..
*लेकिन यहां सवाल उठता है कि
*क्या कलेक्टर स्तर से निर्देश जारी ही नहीं हुए..?
या निर्देश जारी होने के बावजूद उन्हें जानबूझकर लागू नहीं किया गया…?
यदि आदेश के बाद भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह आदेश की अवहेलना और प्रशासनिक अनुशासनहीनता का गंभीर मामला बनता है।
*आखिर बदनावर सीबीएमओ ने स्वयं कार्रवाई क्यों नहीं की…?*
सबसे अहम सवाल यही है कि जब सीबीएमओ को स्वयं फर्जी जन्म प्रमाण पत्र बनाए जाने की जानकारी थी, तो सेंटर को तत्काल बंद क्यों नहीं कराया गया…?
पुलिस को सीधे सूचना क्यों नहीं दी गई…?
जनहित में त्वरित रोकथाम क्यों नहीं की गई…?
सीबीएमओ की भूमिका केवल पत्राचार तक सीमित रह जाना कई सवाल खड़े करता है। इससे तीन संभावनाएं सामने आती हैं..
किसी प्रभावशाली व्यक्ति या नेटवर्क का दबाव,मौन सहमति या संभावित मिलीभगत,गंभीर प्रशासनिक लापरवाही..
अब जनता के सवाल..*
इस पूरे प्रकरण के बाद आम जनता और सामाजिक संगठनों में भारी आक्रोश है। लोग पूछ रहे हैं,
कार्रवाई किसके दबाव में रोकी गई…?
किन अधिकारियों ने जानबूझकर आंखें मूंदी..?
फर्जी जन्म प्रमाण पत्र किन-किन सरकारी और गैर-सरकारी कार्यों में उपयोग किए गए…?
निष्पक्ष जांच की मांग…*
यह मामला अब सीधे तौर पर राज्य शासन की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ गया है। यदि बदनावर सीबीएमओ की भूमिका की निष्पक्ष जांच नहीं होती कलेक्टर स्तर पर जारी आदेशों की स्थिति स्पष्ट नहीं की जाती
और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती
तो यह मान लिया जाएगा कि प्रशासनिक चुप्पी भी फर्जीवाड़े की साझेदार है।
अब देखना यह है कि महाराष्ट्र पुलिस की कार्रवाई के बाद मध्यप्रदेश शासन और जिला प्रशासन कब जिम्मेदारी तय करता है।
*क्या कहना है इनका*
ज़ब बदनावर सीबीएमओ डॉ एस एल मुजाल्दा से फोन पर चर्चा की गई तो उनके द्वारा बताया की अभी में बाहर हु, में एक थोडे कार्यक्रम मे हु,…
प्रश्न : सर वापस आपको को कॉल कितने समय मे करू….
जवाब = एस एल मुजाल्दा अभी मत करना,अभी थोड़ा बिजी हु, दो – तीन दिन बाद करना






