खाकी का शर्मनाक चेहरा: नाबालिग के गर्भसमापन में बाधा, विवेचक की दबंगई पर CWC सख्त
बस्ती: रक्षक बने भक्षक! नाबालिग पीड़िता को जेल भेजने की धमकी देने वाला दरोगा तलब; बस्ती पुलिस पर गंभीर सवाल: 'अंगद' की तरह जमे विवेचक ने नाबालिग पीड़िता को धमकाया
अजीत मिश्रा (खोजी)
खाकी का ‘अमानवीय’ चेहरा: नाबालिग पीड़िता को न्याय के बजाय धमकी?
- ‘मिशन शक्ति’ बनाम ‘दबंग दरोगा’: नाबालिग पीड़िता को न्याय की जगह मिली प्रताड़ना
- डेढ़ महीने तक ठप रही फाइल, अब CWC के कठघरे में विवेचक; क्या पीड़िता को मिलेगा इंसाफ?
- बस्ती का ‘विवेचक कांड’: जब खाकी के डर से सहमी नाबालिग, तो कौन करेगा भरोसा?
बस्ती। प्रदेश में ‘मिशन शक्ति’ और महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े दावों के बीच बस्ती से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने पुलिसिया कार्यशैली की पोल खोलकर रख दी है। एक गर्भवती नाबालिग से जुड़े मामले में विवेचक की संवेदनहीनता और दबंगई की जो तस्वीर उभरकर आई है, वह न केवल शर्मनाक है, बल्कि सिस्टम पर गंभीर सवाल भी खड़े करती है।
जब रक्षक ही बन जाए भक्षक
मामला एक नाबालिग पीड़िता के गर्भसमापन (Medical Termination of Pregnancy) से जुड़ा है। आरोप है कि विवेचक, उपनिरीक्षक (SI) पंकज त्यागी, ने न केवल समिति के निर्देशों की अनदेखी की, बल्कि पीड़िता और उसकी मां को डराने-धमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हद तो तब हो गई जब पीड़िता को यह धमकी दी गई कि यदि उसने गर्भसमापन का प्रयास किया तो उसे जेल भेज दिया जाएगा। यह बर्ताव उस पुलिस अधिकारी का है, जिसका काम पीड़िता को सुरक्षा और न्याय दिलाना था।
जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ने का खेल
सीडब्ल्यूसी (CWC) के संज्ञान से यह स्पष्ट है कि डेढ़ माह तक फाइल फाइलों के ढेर में दबी रही। गर्भवती नाबालिग का समय पर अल्ट्रासाउंड न कराना विवेचक की घोर लापरवाही को दर्शाता है। सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि स्थानान्तरण के आदेश होने के बावजूद, उक्त विवेचक किसी ‘अंगद’ की तरह अपनी कुर्सी पर पैर जमाए बैठा रहा। यह किसके संरक्षण में हो रहा है? यह सवाल जिले के उच्च पुलिस अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी उंगली उठाता है।
न्याय पीठ का कड़ा रुख
बाल कल्याण समिति (CWC) के चेयरपर्सन प्रेरक मिश्रा ने इस मामले में अत्यंत सख्त रुख अपनाते हुए विवेचक को तलब किया है। समिति ने एक सप्ताह के भीतर स्पष्टीकरण मांगा है। यदि जवाब संतोषजनक नहीं रहा, तो विधिक कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है। यह कदम स्वागत योग्य है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल स्पष्टीकरण मांगने से ‘बालिका के सर्वोच्च हितों’ (Best interests of the child) की रक्षा हो जाएगी?
सवाल व्यवस्था पर भी हैं
सवाल केवल एक दरोगा का नहीं है, बल्कि उस कार्य संस्कृति का है जहां संवेदनशील मामलों में भी संवेदनहीनता का बोलबाला है। महिला सशक्तिकरण के दावों के बीच, जब एक नाबालिग पीड़िता खुद को असुरक्षित महसूस करे और पुलिस की धमकी से सहमी रहे, तो आम जनता किस पर भरोसा करे?
क्या बस्ती पुलिस के आला अधिकारी इस मामले में केवल खानापूर्ति करेंगे या फिर ऐसे दागदार चेहरों को सेवा से बाहर कर एक नजीर पेश करेंगे? पीड़िता को न्याय कब मिलेगा, यह तो समय बताएगा, लेकिन इस घटना ने खाकी की छवि को जो गहरा जख्म दिया है, उसे भर पाना फिलहाल मुश्किल है।
संपादकीय टिप्पणी: प्रशासन को यह समझना होगा कि पीड़िता का दर्द केवल एक केस फाइल नहीं, बल्कि एक जीवन का सवाल है। विवेचक की यह ‘दबंगई’ वर्दी के गरिमा के खिलाफ है और इस पर सख्त से सख्त कार्रवाई ही एकमात्र रास्ता है।












