उत्तर प्रदेशबस्ती

बहादुरपुर ब्लॉक में वर्चस्व की जंग: मारपीट के बाद दोनों पक्षों ने दर्ज कराए मुकदमे

बस्ती का 'बदलापुर': 'एफआईआर' के बदले 'एफआईआर' का खेल शुरू; 'दुबेजी' ने 'एफआईआर' का बदला 'एफआईआर' से लिया

​अजीत मिश्रा (खोजी)

‘FIR’ का खेल: न्याय या बदले की राजनीति?

  • बस्ती का ‘बदलापुर’: ‘एफआईआर’ के सहारे वर्चस्व की जंग
  • सरेराह हथियारों का प्रदर्शन और धमकियां: बहादुरपुर में कानून-व्यवस्था पर उठे सवाल
  • एक्शन का रिएक्शन: ब्लॉक में प्रधान समर्थक और विरोधी आमने-सामने

​बस्ती जिले का बहादुरपुर ब्लॉक इन दिनों कानून की किताबों में दर्ज धाराओं से ज्यादा आपसी रंजिश के ‘बदलापुर’ का केंद्र बना हुआ है। रिपोर्ट बताती है कि कैसे प्रशासनिक जिम्मेदारियों से जुड़े लोग विकास की बात छोड़कर ‘एफआईआर’ के हथियारों से एक-दूसरे को नेस्तनाबूद करने पर उतारू हैं।जिले का बहादुरपुर ब्लॉक इन दिनों विकास के कार्यों से अधिक दो प्रभावशाली पक्षों के बीच चल रही ‘एफआईआर’ की जंग को लेकर चर्चा में है। ताजा घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि स्थानीय स्तर पर रसूखदार लोगों के लिए कानून और प्राथमिकी (एफआईआर) न्याय का साधन कम और प्रतिशोध लेने का औजार अधिक बन गई है।

बदले की आग में झुलसता क्षेत्र

मामला महज मारपीट और धमकी का नहीं है, बल्कि यह उस वर्चस्व की लड़ाई का है जहां कानून का सहारा सिर्फ अपना बचाव करने के लिए नहीं, बल्कि दूसरे को फंसाने के लिए लिया जा रहा है। 20 जून को अजय प्रताप चौधरी द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर के जवाब में, 22 जून की घटना का हवाला देते हुए ‘दुबेजी’ (शेलेद्र दुबे) द्वारा की गई जवाबी एफआईआर इसी बात का प्रमाण है कि यहां ‘एक्शन का रिएक्शन’ तुरंत और तीखा होता है।

विवाद की पृष्ठभूमि: एफआईआर बनाम एफआईआर

यह सारा घटनाक्रम एक-दूसरे के खिलाफ दर्ज कराई गई दो एफआईआर के इर्द-गिर्द घूमता है:

  • प्रथम एफआईआर (20 जून): बहादुरपुर ब्लॉक के बेनीपुर निवासी और प्रधान का कामकाज देखने वाले अजय प्रताप चौधरी ने कलवारी थाने में मुकदमा दर्ज कराया। उन्होंने यह मुकदमा शेलेद्र दुबे (केके दुबे के पुत्र), सौरभ, कृष्ण मुरारी, शिवम दुबे और 15 अज्ञात लोगों के खिलाफ मारपीट के आरोप में दर्ज कराया। उनके अनुसार, यह घटना 20 जून को ब्लॉक सभागार में हुई थी।
  • जवाबी एफआईआर (26 जून): इस कार्रवाई के जवाब में, शेलेद्र दुबे ने भी अजय प्रताप चौधरी, तेज प्रताप चौधरी, विजय प्रताप चौधरी और मंजीत के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। आरोप है कि यह घटना 22 जून को हुई थी।

पुलिस की मूक दर्शक भूमिका और सवाल

दोनों पक्षों के दावों में हॉकी, स्टिक और असलहों का जिक्र है। सरेआम पीछा करना, गला पकड़ना और जान से मारने की धमकियां देना—क्या यह किसी सभ्य समाज की तस्वीर है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि ये घटनाएं वास्तव में इतनी गंभीर हैं, तो स्थानीय प्रशासन और पुलिस मूकदर्शक क्यों बनी हुई है? क्या पुलिस का काम महज दोनों तरफ से एफआईआर दर्ज कर फाइलों का अंबार लगाना रह गया है, या वह निष्पक्ष जांच कर असल दोषियों को सलाखों के पीछे भेजेगी?

शेलेद्र दुबे द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर के अनुसार, 22 जून को जब वे अपने साथियों (अतुल सिंह, अमृतांश पांडे, रणजीत सिंह) के साथ चार पहिया वाहन से बहादुरपुर ब्लॉक से घर लौट रहे थे, तो चौबे बाबा स्थान के पास मंजीत, तेज प्रताप चौधरी और उनके 10 साथियों ने उन्हें घेर लिया।

  • ​आरोप है कि हमलावरों के हाथ में हॉकी, स्टिक और असलहे थे।
  • ​अमृतांश पांडे का गला पकड़कर उन्हें जबरन गाड़ी में धकेला गया, जिससे उन्हें चोटें आईं।
  • ​पीड़ित पक्ष का दावा है कि किसी तरह गाड़ी का शीशा चढ़ाकर और वहां से भागकर उन्होंने अपनी जान बचाई, अन्यथा हमलावर उन्हें जान से मार देते।

अंधेरे भविष्य की आहट

यह घटनाक्रम किसी बड़े अनर्थ का संकेत है। जब जनप्रतिनिधि और रसूखदार लोग कानून को अपने हाथ में लेकर ‘बदला’ लेने की होड़ में शामिल हो जाते हैं, तो आम जनता का भरोसा व्यवस्था से उठ जाता है। यह मामला सिर्फ एक एफआईआर नहीं, बल्कि गिरती हुई सामाजिक मर्यादा और पुलिसिया तंत्र की विफलता का कच्चा-चिट्ठा है।

इस पूरी घटना ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं:

  1. कानून का मजाक: जिस तरह से एक एफआईआर के तुरंत बाद दूसरी एफआईआर दर्ज कराई गई, वह प्रशासनिक व्यवस्था में ‘एक्शन के बदले रिएक्शन’ की मानसिकता को दर्शाता है।
  2. पुलिस की भूमिका: दोनों पक्षों ने जानलेवा हमले और हथियारों के इस्तेमाल का गंभीर आरोप लगाया है। ऐसे में यह अब पुलिस की निष्पक्षता और जांच की गति पर निर्भर करता है कि सच्चाई सामने आए।
  3. सामाजिक माहौल: जनप्रतिनिधियों और क्षेत्र के रसूखदार लोगों द्वारा इस तरह की हिंसक बयानबाजी और रंजिश से आम जनता में भय का माहौल है।

​फिलहाल, यह पूरा मामला स्थानीय पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। इन दोनों एफआईआर में कितनी सच्चाई है, यह तो गहन जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा, लेकिन तब तक बहादुरपुर ब्लॉक का यह ‘बदलापुर’ सुर्खियों में बना रहेगा।

​अब वक्त आ गया है कि पुलिस इस ‘एफआईआर युद्ध’ में सच्चाई की तह तक जाए, वरना यह क्षेत्र जल्द ही कानूनविहीन ‘जंगल राज’ का दूसरा नाम बन जाएगा।

Show More
Back to top button
error: Content is protected !!