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​”आजादी के 75 साल, फिर भी बेहाल: विकास की मुख्य धारा से कोसों दूर संग्रामपुर का चकमार्ग!”

"दस्तावेजों में विकास, धरातल पर दलदल: हरैया के संग्रामपुर में कब सुधरेगी चकमार्ग की सूरत?""75 साल का इंतजार: क्या ग्रामीणों की ये बदहाली हरैया प्रशासन के लिए सिर्फ एक आंकड़ा है?"

अजीत मिश्रा (खोजी)

आजादी के 75 साल, फिर भी बेहाल: विकास की मुख्य धारा से कोसों दूर संग्रामपुर का चकमार्ग!

बस्ती/हरैया (खोजी रिपोर्ट):

देश आजादी के अमृत महोत्सव के उपरांत विकास की दौड़ में सरपट दौड़ने का दावा कर रहा है। डिजिटल इंडिया और स्मार्ट ग्राम के नारों के बीच विकासखंड हरैया अंतर्गत ग्राम पंचायत संग्रामपुर की एक हकीकत उन तमाम दावों की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है। यहाँ का चकमार्ग बीते 75 वर्षों से अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। पक्की सड़क तो दूर, आज भी ग्रामीण इस रास्ते पर कीचड़ और जलभराव के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु

  • ऐतिहासिक उपेक्षा और खोखले दावे: देश की आजादी के 75 साल बीत जाने के बाद भी चकमार्ग का कच्चा और जर्जर बना रहना सरकार के ‘सबका साथ-सबका विकास’ के दावों पर बड़ा सवालिया निशान है।
  • आवागमन का संकट: चकमार्ग न बनने के कारण स्कूली बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों को मुख्य सड़क तक पहुँचने में भारी मशक्कत करनी पड़ती है। बरसात के दिनों में यह रास्ता पूरी तरह से दलदल में तब्दील हो जाता है, जिससे ग्रामीणों का संपर्क दुनिया से कट जाता है।
  • प्रशासनिक उदासीनता: ग्राम पंचायत से लेकर ब्लॉक मुख्यालय तक कई बार गुहार लगाने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा मामले को नजरअंदाज करना कार्यप्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार और लापरवाही को दर्शाता है।
  • बजट का बंदरबांट: मनरेगा और अन्य विकास योजनाओं के नाम पर आवंटित सरकारी धन का सही उपयोग न होना या कागजों पर काम दिखाकर धन निकासी की जांच का विषय होना।
  • कृषि और अर्थव्यवस्था पर असर: चकमार्ग के अभाव में किसानों को अपनी फसल मंडी तक पहुँचाने में अतिरिक्त परिवहन खर्च उठाना पड़ता है, जिससे उनकी आय सीधे प्रभावित हो रही है।
  • अधिकारों का हनन: एक नागरिक के रूप में ग्रामीणों को मिलने वाली मूलभूत सुविधाओं (पक्की सड़क/संपर्क मार्ग) से वंचित रखना उनके संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
  • जनप्रतिनिधियों की चुप्पी: स्थानीय स्तर पर चुने हुए जन प्रतिनिधियों द्वारा चुनाव के समय किए गए बड़े-बड़े वादों का चुनाव जीतने के बाद हवा हो जाना।

विकास के नाम पर ‘कागजी खेल’

​संग्रामपुर के ग्रामीण बताते हैं कि पिछले कई वर्षों से वे जन प्रतिनिधियों से लेकर ब्लॉक मुख्यालय तक फरियाद लगा चुके हैं। हर चुनाव में नेता आते हैं, पक्की सड़क बनाने का वादा करते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही विकास की सारी फाइलें ठंडे बस्ते में चली जाती हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर सरकार द्वारा आवंटित बजट जाता कहाँ है? क्या यह बजट केवल कागजों पर ही खर्च होता है, या फिर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है?

दलदल बना मुसीबत का सबब

​बरसात के दिनों में इस चकमार्ग की स्थिति भयावह हो जाती है। रास्ता पूरी तरह से दलदल में तब्दील हो जाता है, जिससे ग्रामीणों का संपर्क मुख्य सड़क से कट जाता है। सबसे अधिक परेशानी स्कूली बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बीमार बुजुर्गों को होती है। आपातकाल की स्थिति में एंबुलेंस का गांव तक पहुंचना तो दूर, किसी भी वाहन का गुजरना नामुमकिन सा हो जाता है।

अधिकारों का हनन और प्रशासनिक चुप्पी

​ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल एक सड़क का मुद्दा नहीं, बल्कि उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन है। स्थानीय प्रशासन की उदासीनता और ग्राम पंचायत स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार ने इस क्षेत्र को विकास की मुख्य धारा से कोसों दूर धकेल दिया है। 134 पूर्व-वर्तमान प्रधानों और पंचायत सचिवों की जवाबदेही तय करने की बात करने वाले प्रशासनिक अधिकारी आखिर इस चकमार्ग की अनदेखी क्यों कर रहे हैं?

क्या सुध लेगी सरकार?

​75 साल का लंबा समय बीत जाने के बाद भी संग्रामपुर का चकमार्ग आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ रहा है। ग्रामीणों ने अब प्रशासन से स्पष्ट जवाब और त्वरित कार्रवाई की मांग की है।

​अब देखना यह है कि क्या यह खोजी रिपोर्ट स्थानीय प्रशासन की नींद तोड़ेगी और क्या संग्रामपुर के ग्रामीणों को पक्की सड़क नसीब होगी, या फिर एक बार फिर ‘विकास’ के नाम पर केवल कोरे आश्वासन ही मिलेंगे?

रिपोर्टर: अजीत मिश्रा (खोजी), वंदे भारत लाईव टीवी न्यूज

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