बस्ती: भ्रष्टाचार का विरोध करने पर मिल रही ‘सजा’, ईमानदार कर्मचारियों का हो रहा तबादला

अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती वन विभाग में करोड़ों का फर्जीवाड़ा: कमीशन के खेल में ‘माली’ बन रहे ‘वन रक्षक’
- बस्ती वन विभाग में बड़ा घोटाला: कागजी हरियाली के नाम पर करोड़ों का खेल
- ‘वन रक्षक’ से 50 और ‘माली’ से 70 फीसदी कमीशन, वन विभाग के भ्रष्टाचार की खुली पोल
बस्ती। वन विभाग में पौधारोपण और पौधे उगाने के नाम पर किए जा रहे कथित फर्जीवाड़े ने व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विभाग को प्रतिवर्ष लगभग 10 से 12 करोड़ रुपये का बजट पौधारोपण के लिए प्राप्त होता है, लेकिन धरातल पर काम के बजाय कमीशन का खेल हावी है।जिले का वन विभाग इन दिनों गंभीर आरोपों के घेरे में है। विभाग में पौधारोपण और पौधे उगाने के नाम पर करोड़ों रुपये का फर्जीवाड़ा सामने आया है। हर साल विभाग को इस मद में 10 से 12 करोड़ रुपये का बजट मिलता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है।
कागजी हरियाली और कमीशन का गणित
आरोप है कि विभाग केवल कागजों में हरियाली दिखाकर अपनी पीठ थपथपा रहा है। दावा किया जा रहा है कि अगर आवंटित बजट का आधा हिस्सा भी ईमानदारी से खर्च किया जाता, तो जिले की पूरी जमीन पौधारोपण से भर जाती। इस कथित सफलता के लिए जिला प्रशासन के ‘दिशा’ बैठक में भी वन विभाग की सराहना की गई है, जबकि हकीकत में वास्तविक कार्य केवल 20 प्रतिशत ही हो पाता है। आरोप है कि विभाग में पौधारोपण के नाम पर जो भी काम कागजों में दिखाया जाता है, वह असल में मात्र 20 प्रतिशत ही धरातल पर होता है। शेष 80 प्रतिशत बजट कमीशन की भेंट चढ़ जाता है, जिसमें माली और वन रक्षकों की भूमिका संदिग्ध है।
- कमीशन का वितरण: यदि वन रक्षक 50 प्रतिशत कमीशन देता है, तो वह 20 प्रतिशत काम करता है और शेष 30 प्रतिशत अपने पास रखता है।
- माली का शोषण: रेंजरों द्वारा जानबूझकर मालियों को ‘वन रक्षक’ का कार्यभार दिया जाता है, ताकि उनसे 70 प्रतिशत तक कमीशन वसूला जा सके। माली भी इस काम के लिए तैयार हो जाते हैं क्योंकि इससे उन्हें नर्सरी में मिट्टी खोदने और रोपाई जैसे कठिन शारीरिक कार्यों से मुक्ति मिल जाती है।
- शासन के आदेशों की अनदेखी: नियमों के अनुसार किसी माली को वन रक्षक नहीं बनाया जा सकता, और फॉरेस्ट मिनिस्ट्रियल एसोसिएशन भी इसका विरोध कर चुका है। यहाँ तक कि डीएफओ ने भी 9 दिसंबर 25 को सभी रेंजरों को आदेश दिया था कि मालियों से वन रक्षक का काम न लिया जाए, लेकिन रेंजरों ने इन निर्देशों को दरकिनार कर दिया है।
भ्रष्टाचार का विरोध करने पर मिलती है ‘सजा’
विभाग के भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार पर यदि कोई आवाज उठाने का प्रयास करता है, तो उसे सीधे तौर पर प्रताड़ित किया जाता है। ऐसे ईमानदार अधिकारियों और कर्मचारियों को जिले से बाहर स्थानांतरित (ट्रांसफर) कर दिया जाता है। अब तक इस विरोध की कीमत तीन वन दरोगा, दो वन रक्षक, एक माली और एक बाबू को चुकानी पड़ी है।वन विभाग के भीतर भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को भी बख्शा नहीं जा रहा है। जो कर्मचारी इस फर्जीवाड़े का विरोध करते हैं, उन्हें जिले से बाहर स्थानांतरित कर दिया जाता है। अब तक तीन वन दरोगा, दो वन रक्षक, एक माली और एक बाबू को इस विरोध की कीमत चुकानी पड़ी है।
प्रशासन की आंखों में धूल
हैरानी की बात यह है कि कागजों में किए गए इस फर्जी काम के दम पर बस्ती जिला ‘हरियाली’ के मामले में दूसरे स्थान पर आ गया है, जिसका बखान ‘दिशा’ की बैठक में भी डीएफओ द्वारा किया गया है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर कार्यरत कर्मचारियों का कहना है कि इस हरियाली का श्रेय उन्हें जाता है, जबकि अधिकारी केवल कागजों में इसका लाभ ले रहे हैं।
सवालों के घेरे में रामनगर रेंज
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिले भर में रामनगर रेंज में ही सबसे अधिक फर्जीवाड़ा क्यों हो रहा है? एसडीओ की जिम्मेदारी मॉनिटरिंग और निरीक्षण की है, लेकिन उनकी कथित लापरवाही के कारण ही यह फर्जीवाड़ा फल-फूल रहा है। डीएफओ की मिलीभगत के आरोपों के बीच, रेंजरों के लिए उच्च अधिकारियों के आदेशों का कोई महत्व नहीं रह गया है।सवाल यह उठ रहा है कि क्या वन विभाग के आला अधिकारी इस मिलीभगत से अनजान हैं, या फिर यह भ्रष्टाचार पूरी तरह से संरक्षण में फल-फूल रहा है? जनता अब इस मामले में ठोस जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग कर रही है।
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