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डी ए पी के वैकल्पिक उर्वरक को बढ़ावा देने हेतु प्रशिक्षण एवं प्रत्यक्षण आयोजित l

प्रेस-विज्ञप्ति

(06.08.2026/कृषि विभाग/गया)

*डी॰ए॰पी॰ के वैकल्पिक उर्वरक को बढ़ावा देने हेतु प्रशिक्षण एवं प्रत्यक्षण आयोजित*

1. जिला में फास्फेटिक उर्वरक का पर्याप्त भण्डार
2. पी॰एस॰बी॰ के प्रयोग से बढ़ेगी उर्वरक की उपयोग क्षमता

कृषि विभाग अंतर्गत कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंध अभिकरण (आत्मा) गया द्वारा कोंच प्रखण्ड के मुडेरा ग्राम में डी॰ए॰पी॰ के वैकल्पिक उर्वरक को बढ़ावा देने हेतु प्रशिक्षण एवं प्रत्यक्षण का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन श्री संजीव कुमार, जिला कृषि पदाधिकारी, गया ने दीप प्रज्जवलित कर किया। इस अवसर पर उनके साथ कृषि विज्ञान केन्द्र, मानपुर के वैज्ञानिक डा॰ अशोक कुमार, अनुमण्डल कृषि पदाधिकारी, टिकारी श्री उदय पंडित, उप परियोजना निदेशक, आत्मा श्री नीरज कुमार वर्मा, सहायक निदेशक (शष्य) श्री शिवम कुमार, इफको के क्षेत्रीय प्रबंधक श्री दिलीप कुमार, आई॰पी॰एल॰ के प्रबंधक श्री रत्नेश कुमार सिंह, प्रखण्ड कृषि पदाधिकारी, कोंच श्री अभय कुमार, प्रखण्ड तकनीकी प्रबंधक, सुश्री अर्चना कुमारी, सहायक तकनीकी प्रबंधक श्री शिव चन्द्र धारिया एवं श्री सूर्यकान्त निराला तथा बड़ी संख्या में किसान उपस्थित थे।
जिला कृषि पदाधिकारी ने किसानों को जानकारी दिया कि पौधों को अपना जीवन चक्र पूरा करने के लिये सामान्यतः 17 पोषक तत्वों की आवश्कता होती है। इसमें से नाईट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश को प्राथमिक पोषक तत्व की श्रेणी मे रखा गया है क्योंकि पौधों को इनकी अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है। सल्फर, कैल्शियम एवं मैग्निशियम द्वितीयक पोषक तत्व हैं, जबकि जिंक, बोरॉन, आयरन, मैगनीज, कॉपर, मॉलीब्लेडनम, क्लोरीन आदि सूक्ष्म पोषक तत्व हैं जिनकी पौधों को आवश्यकता होती है। नाईट्रोजन के लिये किसान यूरिया का, फास्फोरस के लिये डी॰ए॰पी॰ का और पोटाश के लिये एम॰ओ॰पी॰ का उपयोग करते हैं। परन्तु वैश्विक परिस्थितियों के कारण जिला में डी॰ए॰पी॰ की आपूर्ति कम हुई है, जबकि उसके विकल्प टी॰एस॰पी॰, एस॰एस॰पी॰ एवं एन॰पी॰के॰ उर्वरकों का पर्याप्त भण्डार उपलब्ध है। जिला मंे 3264 मे॰टन एस॰एस॰पी॰, 4622 मे॰टन एन॰पी॰के॰ उपलब्ध है।
इफको के क्षेत्रीय प्रबंधक ने किसानों को बताया कि डी॰ए॰पी॰ से मिलने वाला फास्फोरस एवं टी॰एस॰पी॰, एस॰एस॰पी॰ तथा एन॰पी॰के॰ में मिलने वाला फास्फोरस एक ही होता है, पौधों को फास्फोरस तत्व की आवश्कता होती है श्रोत्र के बदलने से पौधों पर कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है। उन्होने किसानों से कहा कि मिट्टी जांच के अनुसार एवं खेत में लगायी जा रही फसल के लिये अनुशंसित मात्रा में उर्वरक का व्यवहार करना चाहिये। उन्होंने बताया कि धान की फसल में किसान प्रायः 1.5 किलोग्राम प्रति कट्ठा की दर से डी॰ए॰पी॰ का उपयोग करते हैं इसकी जगह पर 1.5 किलोग्राम टी॰एस॰पी॰ और 0.6 किलोग्राम यूरिया को मिलाकर प्रति कट्ठा दिया जा सकता है, इसी प्रकार 4.3 किलोग्राम एस॰एस॰पी॰ के साथ 0.6 किलोग्राम यूरिया प्रति कट्ठा, 2.5 किलोग्राम 14ः28 ग्रेड का उर्वरक प्रतिकट्ठा, 3.5 किलोग्राम एन॰पी॰के॰एस॰ 20ः20ः0ः13 का उपयोग प्रति कट्ठा डी॰ए॰पी॰ के विकल्प के रुप में उपयोग किया जा सकता है।
कृषि विज्ञान केन्द्र, मानपुर के वैज्ञानिक डा॰ अशोक कुमार ने बताया कि फास्फेटिक उर्वरक की गतिशीलता बहुत कम होती है और खेत में उपयोग के बाद पौधे इसका केवल 20 से 22 प्रतिशत ही उपयोग कर पाते हैं, उपयोगिता बढ़ाने के लिये फास्फोरस घोलक बैक्टेरिया (पी॰एस॰बी॰) का उपयोग करने से फास्फेटिक उर्वरक की उपयोग क्षमता बढ़ जाती है, यह एक सरल और सस्ता उपाय है जिसे किसानों को अपनाना चाहिये।
इसके बाद मुडेरा ग्राम के 05 किसान श्री विद्याभूषण शर्मा, श्री सुबोध शर्मा, श्री अटल बिहारी, श्री शैलेश कुमार एवं श्री आलोक कुमार के एक-एक एकड़ खेत में डी॰ए॰पी॰ के वैकल्पिक उर्वरक का प्रयोग प्रत्यक्षण अंतर्गत किया गया जिससे किसानों को इसके प्रभाव का तुलनात्मक परिणाम दिखाया जा सके।

(संजीव कुमार)
जिला कृषि पदाधिकारी,
गया जी।

त्रिलोकी नाथ डिस्ट्रिक्ट रिपोर्टर गयाजी बिहार

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