बस्ती: वाल्टरगंज थानाध्यक्ष की मौत के 7 दिन बाद FIR दर्ज, बेटे ने 3 लोगों पर लगाया ब्लैकमेलिंग का आरोप

अजीत मिश्रा (खोजी)
खाकी पर भारी ब्लैकमेलिंग का जाल: वाल्टरगंज थानाध्यक्ष की आत्महत्या और सवालों के घेरे में व्यवस्था
- प्रियंका चौधरी, रामनयन चौधरी और विजय प्रकाश के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने की धाराओं में मुकदमा दर्ज
- 29 अगस्त को हुई थी थानाध्यक्ष सूर्य प्रकाश सिंह की मौत, 5 सितंबर की रात कोतवाली में दर्ज हुई तहरीर
- मामले की जांच उपनिरीक्षक जयविंद कुमार यादव को सौंपी गई, पुलिस ब्लैकमेलिंग और प्रताड़ना के साक्ष्य जुटाने में जुटी
बस्ती।। जब कानून के रखवाले ही अपराधियों और ब्लैकमेलर्स के मानसिक शिकंजे में घुट-घुट कर जान देने को मजबूर हो जाएं, तो यह सिर्फ एक पुलिसकर्मी की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक और सामाजिक व्यवस्था पर एक करारा तमाचा है। बस्ती जिले के वाल्टरगंज थाने के तत्कालीन थानाध्यक्ष सूर्य प्रकाश सिंह की आत्महत्या का मामला इसी वीभत्स सच्चाई को उजागर करता है। अप्रैल 2026 में थाने की कमान संभालने वाले एक जिम्मेदार अधिकारी को इस हद तक प्रताड़ित किया गया कि 29 अगस्त को उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर वे कौन सी ताकतें थीं, जो एक थानेदार को ब्लैकमेल कर रही थीं और पुलिस महकमा अपनों की ही जान बचाने में लाचार साबित हुआ?
घटना के पूरे सात दिनों बाद, 5 सितंबर की रात को कोतवाली में दर्ज हुई एफआईआर इस मामले के कई अनछुए पहलुओं को सामने लाती है। मृतक के बेटे संदीप सिंह की शिकायत पर प्रियंका चौधरी, रामनयन चौधरी और विजय प्रकाश के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और ब्लैकमेलिंग की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। लेकिन सात दिनों का यह लंबा अंतराल कई गंभीर संदेह पैदा करता है। जब एक थानाध्यक्ष की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होती है, तब प्राथमिक एफआईआर दर्ज होने में एक हफ्ता क्यों लग गया? क्या सिस्टम के भीतर ही मामले को दबाने या लीपापोती करने की कोशिश चल रही थी?
यह घटना इस कड़वी सच्चाई को बयान करती है कि आज अपराधी किस हद तक दुस्साहसी हो चुके हैं। यदि एक थानेदार ब्लैकमेलिंग और मानसिक प्रताड़ना का शिकार होकर चरम कदम उठाने को विवश हो सकता है, तो आम नागरिकों की सुरक्षा का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। पुलिस विभाग के भीतर का यह मानसिक दबाव, उच्चाधिकारियों का रवैया और बाहरी अराजक तत्वों का गठजोड़ अब नासूर बन चुका है।
उपनिरीक्षक जयविंद कुमार यादव को इस मामले की जांच सौंपी गई है, लेकिन औपचारिकता भर से न्याय नहीं मिलने वाला। जांच का दायरा सिर्फ नामजद आरोपियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उस गहरी साजिश और ब्लैकमेल के उस तंत्र को बेनकाब करना होगा जिसके चलते एक हंसता-खेलता परिवार उजड़ गया। यदि इस मामले में त्वरित, निष्पक्ष और कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, तो खाकी का इकबाल पूरी तरह से धूमिल हो जाएगा और अपराधियों केौौ हौसले और बुलंद होंगे। सूर्य प्रकाश सिंह की मौत महकमे के लिए एक चेतावनी है—समय रहते अपने भीतर के और बाहर के भेदियों पर नकेल नहीं कसी गई, तो ऐसी त्रासदियां सिस्टम को अंदर से खोखला करती रहेंगी।
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