धार समाचार डिस्टिक हेड सुरेन्द्र दुबे

धार जिले में नरवाई जलाने पर प्रतिबंधात्मक आदेश जारी, उल्लंघन पर लगेगा अर्थदंड
कंबाइन हार्वेस्टर के साथ एसएमएस अथवा स्ट्रा रीपर का उपयोग अनिवार्य, 6 दिसंबर 2026 तक प्रभावशील रहेगा आदेश
धार, 11 अक्टूबर 2026। जिले में पर्यावरण संरक्षण, जनस्वास्थ्य की सुरक्षा तथा फसल अवशेष जलाने से होने वाली संभावित हानि की रोकथाम के लिए अपर जिला दंडाधिकारी श्री संजीव केशव पांडेय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 163 के अंतर्गत प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किया है। आदेश के अनुसार खेतों में नरवाई जलाने पर प्रतिबंध रहेगा तथा फसल कटाई में उपयोग किए जाने वाले कंबाइन हार्वेस्टर के साथ स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम (एसएमएस) अथवा स्ट्रा रीपर में से किसी एक मशीन का उपयोग अनिवार्य होगा। यह आदेश 6 दिसंबर 2026 तक प्रभावशील रहेगा।
कंबाइन हार्वेस्टर के साथ एसएमएस अथवा स्ट्रा रीपर अनिवार्य
जारी आदेश के तहत जिले में फसल कटाई के लिए उपयोग किए जाने वाले प्रत्येक कंबाइन हार्वेस्टर के साथ स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम अथवा स्ट्रा रीपर का होना अनिवार्य किया गया है। कृषकों की भूसे की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए एसएमएस के स्थान पर स्ट्रा रीपर का उपयोग किया जा सकेगा। जिला परिवहन अधिकारी एवं सहायक कृषि अभियांत्रिकी, जिला धार को कंबाइन हार्वेस्टर के संचालन की सतत निगरानी करने तथा निर्धारित मशीन के बिना हार्वेस्टर चलाए जाने पर वैधानिक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
नरवाई जलाने से मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण को नुकसान
आदेश में बताया गया है कि खेतों में फसल अवशेष अथवा नरवाई जलाने से मिट्टी में मौजूद लाभदायक सूक्ष्म जीव नष्ट होते हैं तथा जैविक कार्बन की मात्रा कम होती है। इससे मिट्टी की गुणवत्ता और उर्वरता प्रभावित होती है। नरवाई जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ने के साथ पर्यावरण एवं जनस्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए कृषकों से अपील की गई है कि वे नरवाई जलाने के बजाय उसका उपयोग लाभकारी तरीके से करें।
नरवाई का उपयोग कर किसान प्राप्त कर सकते हैं अतिरिक्त लाभ
कृषक फसल अवशेषों का उपयोग खेतों में आच्छादन (मल्चिंग) के रूप में कर सकते हैं। स्ट्रा रीपर से भूसा बनाकर पशुओं के चारे के रूप में उपयोग करने अथवा उसका विपणन कर अतिरिक्त आय प्राप्त की जा सकती है। इसके अलावा खरीफ फसल की कटाई के बाद बिना जुताई किए खड़ी नरवाई में हैप्पी सीडर अथवा सुपर सीडर की सहायता से सीधे बोनी की जा सकती है। इससे मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाने, भूमि की गुणवत्ता बनाए रखने तथा खेती की लागत कम करने में मदद मिलती है।
नरवाई के प्रबंधन के लिए बेलर, रैकर एवं चॉपर मशीनों का भी उपयोग किया जा सकता है। इनकी सहायता से फसल अवशेषों के बंडल तैयार कर उनका उपयोग औद्योगिक इकाइयों में ईंधन, खेतों में आच्छादन तथा आवश्यकता के अनुसार भूसा बनाने में किया जा सकता है।
नरवाई जलाने पर प्रति घटना 2,500 से 15,000 रुपये तक अर्थदंड
मध्यप्रदेश शासन के पर्यावरण विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के प्रावधानों के अनुसार नरवाई जलाने की घटनाओं को प्रतिबंधित करते हुए पर्यावरण क्षतिपूर्ति राशि निर्धारित की गई है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देशों के क्रम में वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के अंतर्गत फसल अवशेष जलाने पर प्रतिबंध संबंधी प्रावधान लागू हैं। उल्लंघन की स्थिति में संबंधित कृषक से पर्यावरण क्षतिपूर्ति राशि वसूल की जाएगी।
निर्धारित प्रावधानों के अनुसार दो एकड़ से कम भूमि वाले कृषकों पर प्रति घटना 2,500 रुपये, दो एकड़ से अधिक एवं पांच एकड़ से कम भूमि वाले कृषकों पर प्रति घटना 5,000 रुपये तथा पांच एकड़ से अधिक भूमि वाले कृषकों पर प्रति घटना 15,000 रुपये का अर्थदंड अधिरोपित किया जाएगा।
कृषि विभाग करेगा निगरानी, सात दिवस में कार्रवाई का निर्णय
आदेश का पालन सुनिश्चित कराने के लिए उप संचालक, किसान कल्याण तथा कृषि विकास, जिला धार को नोडल अधिकारी बनाया गया है। आदेश की किसी शर्त का उल्लंघन होने पर संबंधित कृषि विकास अधिकारी क्षेत्र के पटवारी के साथ संयुक्त जांच कर प्रतिवेदन संबंधित तहसीलदार को प्रस्तुत करेंगे। तहसीलदार संबंधित कृषक को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर प्रदान करने एवं सुनवाई के बाद सात दिवस के भीतर शास्ति अधिरोपित करने के संबंध में समुचित निर्णय लेंगे।
उल्लंघन पर वैधानिक कार्रवाई
अपर जिला दंडाधिकारी द्वारा यह आदेश एकपक्षीय रूप से पारित किया गया है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 163 की उपधारा (2) के अंतर्गत आदेश तत्काल प्रभाव से लागू होगा। आदेश का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 223 के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। आदेश 6 दिसंबर 2026 तक प्रभावशील रहेगा।
विश्व कपास दिवस पर कुक्षी में कृषक प्रशिक्षण आयोजित, 200 से अधिक किसानों ने सीखी उन्नत उत्पादन तकनीकें
लंबे एवं अतिरिक्त लंबे रेशे वाली कपास की खेती, उच्च घनत्व पौध रोपण और समन्वित कीट प्रबंधन की दी गई जानकारी
धार, 11 अक्टूबर 2026। राष्ट्रीय कपास उत्पादकता मिशन के अंतर्गत एवं विश्व कपास दिवस के उपलक्ष्य में किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग, विकासखंड कुक्षी के सहयोग से साइमा (SIMA) कॉटन डेवलपमेंट एंड रिसर्च एसोसिएशन, कोयंबटूर द्वारा कुक्षी में एक दिवसीय क्लस्टर स्तरीय कृषक प्रशिक्षण आयोजित किया गया। प्रशिक्षण में विकासखंड के 200 से अधिक प्रगतिशील किसानों ने सहभागिता कर कपास की उन्नत खेती एवं आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी प्राप्त की।
प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य किसानों को लंबे रेशे एवं अतिरिक्त लंबे रेशे (ईएलएस) वाली कपास की उन्नत किस्मों की उत्पादन तकनीकों से अवगत कराना तथा सर्वोत्तम कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना था। प्रशिक्षण के माध्यम से किसानों को कपास की उत्पादकता बढ़ाने, खेती की लागत कम करने और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त करने के संबंध में तकनीकी मार्गदर्शन दिया गया।
उन्नत तकनीक अपनाकर बढ़ाएं कपास की उत्पादकता
कार्यक्रम में किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग, जिला धार के उप संचालक श्री विजय चौरसिया ने किसानों को कपास उत्पादन की आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी। उन्होंने उच्च घनत्व पौध रोपण प्रणाली (एचडीपीएस) एवं कम दूरी पर पौध रोपण तकनीक अपनाने पर जोर दिया। इस तकनीक के अंतर्गत कतार से कतार तथा पौधे से पौधे के बीच 3 × 1 फीट की दूरी पर कपास की बुवाई करने की जानकारी दी गई। उन्होंने बताया कि उन्नत उत्पादन तकनीकों को अपनाकर किसान सीमित रकबे में भी बेहतर उत्पादन प्राप्त कर अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं।
श्री चौरसिया ने कपास की फसल में समन्वित कीट प्रबंधन (आईपीएम) अपनाने की सलाह दी। उन्होंने संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग तथा फसल की आवश्यकताओं के अनुरूप कृषि कार्य करने की तकनीकी जानकारी भी दी।
उन्नत किस्मों की प्रदर्शनी और प्रदर्शन प्रक्षेत्र का कराया भ्रमण
प्रशिक्षण स्थल पर शक्ति बीटी एवं सुरक्षा कपास की उन्नत किस्मों की प्रदर्शनी लगाई गई। किसानों को शक्ति बीटी कपास के प्रदर्शन प्रक्षेत्र का प्रत्यक्ष भ्रमण भी कराया गया। इस दौरान उन्हें खेत में अपनाई गई उत्पादन तकनीकों, पौधों की दूरी तथा उन्नत कृषि पद्धतियों की व्यावहारिक जानकारी दी गई, जिससे वे इन तकनीकों को अपने खेतों में अपनाने के लिए प्रेरित हो सकें।
कार्यक्रम में साइमा कॉटन डेवलपमेंट एंड रिसर्च एसोसिएशन, कोयंबटूर के विपणन सलाहकार श्री दिनेश गुप्ता, सचिव एवं मुख्य कपास प्रजनक डॉ. एम. आशारानी, सहायक संचालक श्री डी.एस. मौर्य, वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी कुक्षी श्री अजय चौहान, बीज विक्रेता श्री सुनील पाटीदार एवं श्री सोहन पाटीदार सहित विकासखंड के कृषि विकास अधिकारी, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी तथा बड़ी संख्या में कृषक उपस्थित रहे।
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