जिस बेटे की नौकरी लगने पर पूरे गांव में मिठाई बँटी थी, उसी बेटे के घर लौटने पर उसकी माँ ने पूछा— “बेटा, तुम कौन हो?” और फिर जो हुआ, उसने पूरे परिवार की जिंदगी बदल दी…

विवेक अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। पिता महेश प्रसाद गाँव में बिजली के उपकरण ठीक करने की छोटी-सी दुकान चलाते थे।
माँ सुशीला घर संभालती थीं और छोटी बहन नेहा कॉलेज में पढ़ती थी।विवेक पढ़ाई में बहुत अच्छा था। पिता ने अपनी दुकान बढ़ाने का सपना छोड़कर उसकी पढ़ाई पर पैसे लगाए।
माँ ने कई बार अपनी जरूरतें टाल दीं, लेकिन बेटे की फीस कभी नहीं रुकने दी।आखिरकार विवेक को दिल्ली की एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई।जिस दिन वह पहली बार शहर जाने लगा, पिता ने अपनी पुरानी घड़ी उतारकर उसके हाथ में बाँध दी।बेटा, ये घड़ी बहुत महँगी नहीं है, लेकिन जब भी इसे देखना, याद रखना कि समय कभी किसी के लिए वापस नहीं आता।”विवेक ने हँसकर कहा, “पापा, आप भी न! अब तो आपकी सारी परेशानियाँ खत्म समझिए।”समय बीता।
विवेक की तरक्की होती गई। उसने शहर में अपना फ्लैट खरीद लिया, शादी कर ली और एक बच्चे का पिता भी बन गया।माता-पिता खुश थे।
बेटे की तस्वीर देखकर ही दिन काट लेते थे।शुरुआत में विवेक हर रविवार फोन करता था। फिर रविवार की जगह महीने में एक बार फोन आने लगा।एक दिन माँ ने फोन पर कहा, “बेटा, तेरे पापा की दुकान अब उनसे नहीं संभलती।
अगर तू कुछ दिन आ जाता तो अच्छा लगता।”विवेक ने लैपटॉप पर नजर रखते हुए कहा, “माँ, अभी बहुत जरूरी काम चल रहा है। अगले महीने जरूर आऊँगा।”अगला महीना आया, फिर अगला साल भी निकल गया।एक दिन उसकी बहन नेहा का फोन आया।भैया, पापा ने दुकान बंद कर दी है।”तो क्या हुआ?
आराम करेंगे अब। तुम लोग हो न उनके पास?”नेहा कुछ पल चुप रही, फिर बोली, “हाँ भैया, मैं हूँ… लेकिन कभी-कभी बेटी होने के बावजूद लगता है कि मैं अपने माता-पिता के लिए अकेली पड़ गई हूँ।”विवेक को उसकी बात बुरी लगी।नेहा, मैं यहाँ पैसे कमाने के लिए मेहनत कर रहा हूँ।
हर समय घर की चिंता करूँगा तो अपना भविष्य कैसे बनाऊँगा?”नेहा ने धीरे से कहा, “भैया, भविष्य बनाने में कहीं वर्तमान पीछे न छूट जाए।”विवेक ने फोन काट दिया।उसे लगा, बहन बेवजह भावुक हो रही है।कुछ महीनों बाद कंपनी की तरफ से उसे लंबी छुट्टी मिली। उसने सोचा, इस बार माता-पिता को बिना बताए जाकर चौंकाएगा।वह गाँव पहुँचा तो शाम हो चुकी थी।पुराने घर के बाहर ताला देखकर वह पड़ोस में पूछने चला गया।पड़ोस की बुजुर्ग कमला काकी ने उसे देखते ही कहा, “अरे विवेक!
आज तुम्हें अपने घर की याद कैसे आ गई?”विवेक को उनका लहजा अजीब लगा।काकी, माँ-पापा कहाँ हैं?”उन्होंने सामने वाले घर की ओर इशारा किया।तुम्हारे पिता की तबीयत बिगड़ी थी। तुम्हारी बहन उन्हें अपने घर ले गई।
तुम्हारी माँ भी वहीं रहती हैं।”विवेक हैरान रह गया।लेकिन हमारा घर बंद क्यों है?”कमला काकी ने कुछ देर उसे देखा, फिर बोलीं, “बेटा, घर तो तुम्हारा ही है। मगर उसमें रहने वाले दो बूढ़े लोगों को अब अकेलेपन से डर लगने लगा था।”विवेक बिना कुछ कहे बहन के घर पहुँच गया।दरवाजा नेहा ने खोला।
उसे देखकर उसकी आँखें भर आईं, लेकिन उसने कोई शिकायत नहीं की।अंदर माँ बिस्तर पर बैठी थीं और पिता खिड़की के पास कुर्सी पर चुपचाप बैठे थे।विवेक माँ के पास गया।“माँ, मैं आ गया!”माँ ने उसकी तरफ देखा। चेहरे पर पहचानने की कोशिश साफ दिखाई दे रही थी।फिर उन्होंने धीरे से पूछा, “बेटा, तुम नेहा के ऑफिस से आए हो क्या?”विवेक के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।नेहा ने बताया कि माँ की याददाश्त कमजोर होने लगी थी।
कई बार उन्हें पुरानी बातें याद रहती थीं, लेकिन हाल की बातें भूल जाती थीं।विवेक माँ के पास बैठ गया। उनका हाथ अपने हाथों में लेकर बोला, “माँ, मैं विवेक हूँ… आपका बेटा।”माँ कुछ क्षण उसे देखती रहीं।
फिर अचानक उसके माथे को छूकर बोलीं, “मेरा विवेक भी बिल्कुल तुम्हारी तरह दिखता था। बड़ा आदमी बनने गया है मेरा बेटा… बहुत व्यस्त रहता है।
फोन पर कहता है कि माँ, बाद में बात करूँगा।”इतना कहकर वह मुस्कुराईं। लेकिन मुझे उसकी आवाज बहुत याद आती है।”विवेक की आँखों से आँसू गिरने लगे।माँ को यह तक याद नहीं था कि उनका बेटा सामने बैठा है, लेकिन उसे यह याद था कि वह उससे बात करने का इंतजार करती थीं।तभी पिता ने अपनी पुरानी घड़ी मेज पर रखते हुए कहा, “विवेक, इसे पहचानता है?”विवेक ने काँपते हाथों से घड़ी उठा ली।पिता बोले, “तुझे शहर भेजते समय दी थी।
तूने इसे संभालकर रखा, यह अच्छी बात है। मगर बेटा, इसकी सबसे बड़ी सीख तू भूल गया।”“कौन-सी सीख, पापा?”पिता की आवाज भर्रा गई।“समय वापस नहीं आता।”कमरे में सन्नाटा छा गया।विवेक को पहली बार अपनी बड़ी तनख्वाह, महँगी गाड़ी और आलीशान फ्लैट सब छोटे लगने लगे।
जिस माँ ने उसके बचपन की हर बात याद रखी थी, आज वह उसे पहचानने के लिए संघर्ष कर रही थी।उसने पिता के घुटनों के पास बैठकर कहा, “पापा, मैंने आप लोगों को पैसे भेजे, लेकिन अपना समय नहीं दिया। मैं हर जिम्मेदारी पूरी करने का दावा करता रहा, मगर सबसे जरूरी जिम्मेदारी ही भूल गया।”पिता ने उसके सिर पर हाथ रखा।“बेटा, गलती समझ आ जाए तो लौटने में देर मत करना।
बीते हुए दिन नहीं लौटते, लेकिन बचे हुए दिनों को अच्छा बनाया जा सकता है।”अगले कुछ दिनों तक विवेक गाँव में रहा। वह पिता के साथ सुबह टहलने जाता, माँ को पुराने गीत सुनाता और बहन के साथ बैठकर घर की बातें करता।जाते समय उसने नेहा से कहा, “तुमने इतने साल अकेले सब संभाला।
मैं तुम्हारा कर्ज कभी नहीं चुका पाऊँगा।”नेहा मुस्कुराई।“भैया, मैं कोई हिसाब नहीं रखती। बस अगली बार माँ-पापा को यह महसूस मत होने देना कि उनका बेटा उनके लिए बहुत व्यस्त है।”विवेक शहर लौट गया, लेकिन इस बार उसने अपनी जिंदगी में बदलाव किया।
उसने काम के घंटे तय किए, हर दिन माता-पिता से बात करने का समय निकाला और महीने में कुछ दिन गाँव आने का नियम बनाया।एक दिन माँ ने फोन पर उससे पूछा, “बेटा, आजकल तू रोज फोन कैसे कर लेता है? काम नहीं होता क्या?”विवेक हँस पड़ा।
उसकी आँखें नम थीं।काम तो होता है माँ, लेकिन अब समझ गया हूँ कि जिंदगी में हर जरूरी काम को पूरा करने के लिए समय निकालना पड़ता है।”माँ ने फोन पर ही उसे ढेरों आशीर्वाद दे दिए।उस दिन विवेक ने पिता की घड़ी फिर से पहनी और देर तक उसकी सुइयों को देखता रहा।उसे समझ आ गया था कि माता-पिता को खुश रखने के लिए हमेशा बड़ा घर, महँगे उपहार या बहुत सारे पैसे जरूरी नहीं होते।कभी-कभी उनके लिए सबसे कीमती चीज बस इतनी होती है कि फोन की दूसरी तरफ उनका बच्चा कहे—माँ, मैं व्यस्त हूँ, लेकिन आपके लिए कभी इतना व्यस्त नहीं कि आपकी आवाज सुनने का समय न निकाल सकूँ।”
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