बस्ती में प्रशासनिक ‘बंदरबांट’: 5 करोड़ के टेंडर पर किसकी ‘गिद्ध दृष्टि’?

अजीत मिश्रा (खोजी)
’साहब’ की शह और ‘बाबू’ का खेल: बस्ती में 40 लाख की फर्जीवाड़े की भेंट चढ़ी निष्पक्षता!
🎯अफसरों के साए में ‘सफेदपोश’ डकैती: बस्ती में 40 लाख का फर्जीवाड़ा उजागर!
🎯‘साहब’ की शह, ‘बाबू’ का खेल: बिना टेंडर बांटे गए करोड़ों के काम!
🎯‘ठेकेदार’ की खुली ललकार: “भ्रष्टाचारियों पर FIR करो, वरना हम खींचेंगे कोर्ट!”
🎯फर्जी दस्तखत, फर्जी ऑर्डर… क्या बस्ती विकास भवन ही बन गया फर्जीवाड़े का अड्डा?
विशेष संवाददाता | बस्ती ।। जिले के विकास का दावा करने वाले अधिकारियों के कामकाज पर अब सीधे सवाल उठने लगे हैं। जनसेवक बनने का मुखौटा पहनकर आए अफसर जब जनता की शिकायतों को सुधारने के बजाय सवाल उठाने वालों को ही निशाना बनाने लगें, तो व्यवस्था का अपंग होना तय है। बस्ती जिले में स्वास्थ्य विभाग से लेकर विकास भवन के गलियारों तक फैली ‘कमीशनखोरी’ और ‘बंदरबांट’ की बदबू ने अब प्रशासनिक अनुशासन की धज्जियां उड़ा दी हैं।
40 लाख का गबन और स्कैन हस्ताक्षर का खेल
ताजा मामला सिविल कार्य कराने वाले ठेकेदार दीपक कुमार मिश्र द्वारा उठाए गए सवालों से जुड़ा है। मिश्र ने साक्ष्यों के साथ खुलासा किया है कि स्वास्थ्य विभाग में बाबू प्रेम बहादुर सिंह और ठेकेदार दीवानचंद्र पटेल की जुगलबंदी ने 40 लाख रुपये के सरकारी धन पर डाका डाला है।
हैरानी की बात यह है कि इस बड़े गबन को छिपाने और कार्रवाई से बचने के लिए एक-एक लाख रुपये से कम के फर्जी ऑर्डर तैयार किए गए, ताकि टेंडर प्रक्रिया की नजरों से बचा जा सके। इतना ही नहीं, जब मामले की शिकायत हुई, तो शिकायतकर्ता के ही हस्ताक्षर स्कैन करके फर्जी शिकायती पत्र सीडीओ और सीएमओ कार्यालय में भिजवा दिए गए, ताकि असली शिकायत को दबाया जा सके और ठेकेदार की छवि खराब की जा सके।
- सीडीओ के कामकाज पर सवाल और अधिकारियों की प्रतिक्रिया: यदि कोई ठेकेदार सीडीओ के कामकाज पर सवाल उठाता है, तो एक अच्छे और ईमानदार अधिकारी को उसकी समीक्षा करनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई सवाल न उठे। लेकिन इसके विपरीत, कई अधिकारी समीक्षा करने की बजाय सवाल उठाने वाले को ही निशाना बनाते हैं।
- ठेकेदार दीपक कुमार मिश्र के गंभीर आरोप: ठेकेदार दीपक कुमार मिश्र ने मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) को पत्र लिखकर स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े के कई मामले उजागर किए हैं। उनका आरोप है कि बाबू प्रेम बहादुर सिंह और ठेकेदार दीवानचंद्र पटेल ने बिना टेंडर के फर्जी तरीके से एक-एक लाख के अंदर के ऑर्डर के जरिए 40 लाख रुपये का कार्य कराया है।
- फर्जी शिकायत और छवि खराब करने की साजिश: दीपक मिश्र का कहना है कि उनके हस्ताक्षर स्कैन करके उनके नाम से फर्जी शिकायतें कराई जा रही हैं ताकि उनकी छवि धूमिल की जा सके। उन्होंने सीडीओ से इस मामले में एफआईआर दर्ज कराने और उचित कार्रवाई की मांग की है।
- भ्रष्टाचार और बंदरबांट की रणनीति: लेख में आरोप लगाया गया है कि बाबू और साहब मिलकर ठेकेदारों को बिना टेंडर के करोड़ों के काम और ऑर्डर देते हैं। 15वें वित्त आयोग के पांच करोड़ के टेंडर को लेकर भी सीएमओ के आवास पर बंदरबांट की रणनीति बनने की बात कही गई है।
- प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल: लेख में यह भी दर्शाया गया है कि जो अधिकारी जनता और नियमों का सम्मान नहीं करते तथा भ्रष्टाचार के रास्ते का रोड़ा बनने वालों को हटाने का प्रयास करते हैं, वे जनता की नजरों में कभी ‘हीरो’ नहीं बन सकते।
एफआईआर से परहेज क्यों, क्या ‘साहब’ भी साझेदार हैं?
दीपक मिश्र ने सीडीओ को पत्र लिखकर साफ कर दिया है कि उनके नाम से बिना ओरिजिनल हस्ताक्षर और मोबाइल नंबर के दिए गए फर्जी पत्रों पर कार्रवाई करने के बजाय विभाग सो रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब साक्ष्य सामने हैं, तो दोषी बाबू और ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज कराने में हाथ क्यों कांप रहे हैं? मिश्र ने अल्टीमेटम दिया है कि यदि प्रशासन ने जल्द एफआईआर का आदेश नहीं दिया, तो वे खुद अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे और पुलिस में मुकदमा दर्ज कराएंगे।
5 करोड़ के टेंडर पर टिकी ‘गिद्ध दृष्टि’
बात सिर्फ 40 लाख रुपये के गबन की नहीं है। अंदरखाने की खबर यह है कि 15वें वित्त आयोग के तहत आने वाले 5 करोड़ रुपये के टेंडर पर भी वही पुरानी रणनीति अपनाने की तैयारी चल रही है। आरोप है कि सीएमओ आवास पर टेंडर निकालने से पहले ही बंदरबांट की बिसात बिछ चुकी है। यही वजह है कि नियम-कानून से काम करने वाले ठेकेदारों को रास्ते से हटाने की साजिशें रची जा रही हैं।
सीधा सवाल: क्या बस्ती के आला अधिकारी ईमानदारी का ढोंग छोड़कर निष्पक्ष जांच की हिम्मत दिखाएंगे, या फिर अपने मातहतों की काली कमाई में अपनी हिस्सेदारी निभाते रहेंगे? जनता सब देख रही है और जवाब चाहती है!
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