जिला रिपोर्टर सुरेश चौहान आगर मालवा मध्य प्रदेश शारदीय नवरात्रि पर विशेष कानड़ की मां बिजासन माता: जहां हर शुभ कार्य से पहले झुकते हैं सिर, सदियों से अटूट है आस्था का रिश्ता रक्त

कानड़।मालवा की धरती पर आस्था और परंपराओं की जड़ें इतनी गहरी हैं कि यहां के मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थल नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही संस्कृति, विश्वास और सामाजिक एकता के जीवंत प्रतीक हैं।
आगर-मालवा जिले के कानड़ नगर में स्थित मां बिजासन माता मंदिर भी ऐसा ही एक प्रमुख शक्तिस्थल है, जहां श्रद्धालुओं की आस्था सदियों से अटूट बनी हुई है। नगरवासियों के लिए मां बिजासन केवल आराध्य देवी नहीं, बल्कि नगर की रक्षिका और सुख-समृद्धि की प्रतीक हैं। यही कारण है कि यहां के छोटे-बड़े व्यापारी अपने कारोबार की शुरुआत भी मां के दर्शन के बाद करते हैं। शारदीय नवरात्रि में माता के दरबार में श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ उमड़ती है और पूरा वातावरण देवी भक्ति से सराबोर हो उठता है।
*रक्तबीज के संहार से जुड़ी है मां बिजासन के नाम की पौराणिक कथा*
मां बिजासन माता के नाम के पीछे एक प्रचलित पौराणिक मान्यता जुड़ी हुई है। मार्कण्डेय पुराण में वर्णित दुर्गा सप्तशती की कथा के अनुसार, रक्तबीज नामक असुर को वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त की प्रत्येक बूंद धरती पर गिरते ही उसके समान एक नया असुर उत्पन्न हो जाएगा। इस कारण उसका संहार करना कठिन हो गया था।
मान्यता के अनुसार, देवी दुर्गा ने रक्तबीज के रक्त को धरती पर गिरने से रोकते हुए उसका वध किया। इसी कथा से जुड़ी लोकमान्यता में देवी के बीजासन अथवा बिजासन स्वरूप की व्याख्या की जाती है। कानड़ स्थित मां बिजासन माता मंदिर में विराजित देवी के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था इसी धार्मिक परंपरा से जुड़ी हुई है।
*लाखा बंजारा की कन्या से जुड़ी है मंदिर की लोककथा*
मंदिर की प्राचीनता को लेकर स्थानीय स्तर पर कई जनश्रुतियां प्रचलित हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, पूर्व में इस क्षेत्र में सघन वन हुआ करते थे और यहां का जनजीवन पशुधन पर निर्भर समुदायों से जुड़ा था। जनश्रुति है कि लाखा बंजारा की दिव्य कन्या के चमत्कार और अंतर्ध्यान होने के बाद इसी स्थान पर मां की पिंडी स्वरूप प्रतिमा प्रकट हुई।
समय के साथ स्थानीय श्रद्धालुओं और नगरवासियों के सहयोग से मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया और इसे वर्तमान स्वरूप प्रदान किया गया। हालांकि, मंदिर के निर्माण काल से संबंधित कोई लिखित शिलालेख उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय बुजुर्गों और जानकारों के अनुसार यह मंदिर लंबे समय से नगर की धार्मिक पहचान बना हुआ है।
*भील समाज के पूर्वजों ने मंदिर निर्माण के लिए दी थी भूमि*
मां बिजासन माता मंदिर के इतिहास में स्थानीय समाज के योगदान की कहानी भी महत्वपूर्ण है। स्थानीय श्रद्धालुओं और बुजुर्गों के अनुसार, प्रारंभ में गांव की प्राचीन बावड़ी के समीप मंदिर निर्माण कर माता की प्रतिमा स्थापित करने की योजना थी, लेकिन वहां मंदिर का निर्माण नहीं हो सका।
इसके बाद भील समाज के पूर्वजों ने मंदिर निर्माण के लिए अपनी भूमि उपलब्ध कराई और यहां मंदिर का निर्माण करवाया। बताया जाता है कि प्रारंभिक दौर में भील समाज के नानूराम जी और उनके परिवार के सदस्य ही माता की पूजा-अर्चना करते थे। इस प्रकार मंदिर की स्थापना और सेवा-परंपरा में स्थानीय समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
*पीढ़ियों से निभाई जा रही पूजा-अर्चना की परंपरा*
मंदिर के वर्तमान पुजारी सुखदेव जी बिजापारी के अनुसार, नानूराम जी के बाद उनके दादाजी मां बिजासन की सेवा और पूजा-अर्चना करते रहे। इसके बाद परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह परंपरा आगे बढ़ती रही और वर्तमान में वे स्वयं पुजारी के रूप में माता की सेवा का दायित्व निभा रहे हैं।
मंदिर में नियमित रूप से पूजा-अर्चना, आरती, भोग और श्रृंगार किया जाता है। नवरात्रि जैसे विशेष पर्वों पर विधि-विधान से पूजा और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए जाते हैं। यह परंपरा मंदिर की ऐतिहासिक विरासत के साथ स्थानीय परिवारों की देवी के प्रति समर्पित आस्था को भी दर्शाती है।
*शुभ कार्य से पहले माता के दरबार में हाजिरी*
कानड़ नगर में मां बिजासन माता मंदिर का धार्मिक महत्व केवल नवरात्रि तक सीमित नहीं है। यहां के अनेक परिवार विवाह, नए व्यवसाय और अन्य मांगलिक कार्यों से पहले माता के दर्शन कर आशीर्वाद लेते हैं। नवविवाहित जोड़े भी माता के दरबार में पहुंचकर सुखी दांपत्य जीवन की कामना करते हैं।
संतान के स्वास्थ्य, परिवार की खुशहाली और जीवन में सुख-समृद्धि की प्रार्थना लेकर भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। भक्तों की मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद माता के आशीर्वाद से पूरी होती है। यही विश्वास पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों को माता के दरबार से जोड़े हुए है।
नगर के व्यापारियों की दिनचर्या भी माता की आस्था से जुड़ी है। स्थानीय स्तर पर प्रचलित परंपरा के अनुसार, अनेक छोटे-बड़े व्यापारी और दुकानदार प्रतिदिन अपने प्रतिष्ठान खोलने से पहले मां बिजासन के दर्शन करते हैं। उनके लिए माता का आशीर्वाद दिनभर के कामकाज की शुभ शुरुआत का प्रतीक है।
*नवरात्रि में नौ दिन तक भक्ति और आराधना का विशेष आयोजन*
चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। घट स्थापना, अखंड ज्योति प्रज्वलन, दुर्गा सप्तशती पाठ, भजन-कीर्तन और विशेष पूजन के माध्यम से श्रद्धालु मां की आराधना करते हैं। मंदिर को फूलों और आकर्षक विद्युत सज्जा से सजाया जाता है।
प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल आरती तथा भोग की परंपरा निभाई जाती है। नवरात्रि के दिनों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। फागुन माह की पूर्णिमा सहित अन्य प्रमुख धार्मिक अवसरों पर भी मंदिर में भक्तों की आवाजाही बढ़ जाती है।
मंदिर की व्यवस्थाओं में स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ मंदिर समिति और नगर परिषद कानड़ का भी सहयोग रहता है।
*मालवा की लोकसंस्कृति और सामुदायिक आस्था का प्रतीक*
कानड़ का मां बिजासन माता मंदिर धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सहभागिता की भी मिसाल है। मंदिर के निर्माण में भील समाज के पूर्वजों का योगदान, पुजारी परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही सेवा और नगरवासियों की नियमित उपस्थिति इसकी परंपरा को विशिष्ट बनाती है।
यहां माता के प्रति श्रद्धा किसी एक परिवार या समुदाय तक सीमित नहीं, बल्कि नगर के सामूहिक जीवन का हिस्सा है। यही कारण है कि मंदिर लोगों को धार्मिक विश्वास के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी जोड़ता है।
शारदीय नवरात्रि के अवसर पर मां बिजासन माता का दरबार एक बार फिर श्रद्धा, विश्वास और भक्ति का केंद्र बना हुआ है। कानड़वासियों के लिए यह मंदिर केवल आस्था का स्थान नहीं, बल्कि उनकी परंपराओं, पूर्वजों की स्मृतियों और सामूहिक विश्वास की धरोहर है। पीढ़ियों से प्रज्वलित आस्था की यह ज्योति आज भी उसी विश्वास के साथ जगमगा रही है कि मां बिजासन का आशीर्वाद उनके नगर और परिवारों पर सदैव बना रहे।
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