भोलेनाथ की नगरी में मेला शाही, लेकिन शौचालय व्यवस्था बेहाल! क्या श्रद्धालुओं को सिर्फ दर्शन और धक्के खाने के लिए बुलाया जाता है?

*दूसरे नगर परिषदों से गाड़ी मांगने में शर्म नहीं, लेकिन अपनी मोबाइल टॉयलेट गाड़ी खरीदने में आखिर परेशानी क्या है? हर साल मेले लगते हैं, नेता आते हैं, भाषण होते हैं, मगर जनता की मूलभूत सुविधा आज भी लापता!*
*बिरसिंहपुर, सतना।* वाह रे व्यवस्था! एक तरफ भोलेनाथ की पावन नगरी बिरसिंहपुर में दीपावली का पांच दिवसीय मेला सज चुका है। दूर-दराज से श्रद्धालुओं की भीड़ पहुंच रही है। दूसरी तरफ नगर परिषद की तैयारियों की हकीकत यह है कि शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा के लिए भी लोगों को इधर-उधर भटकना पड़ रहा है। सुविधा के नाम पर गड्ढे खोदकर पर्दे लगा देना क्या आधुनिक नगर परिषद की व्यवस्था कहलाएगी?
*सवाल तीखा है—मेले हर साल लगते हैं, तो व्यवस्था हर साल उधार क्यों चलती है?*
दशहरा हो, दीपावली हो या बसंत पंचमी का मेला, बिरसिंहपुर में हर बार श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। जब भी मोबाइल टॉयलेट गाड़ी की जरूरत पड़ती है, दूसरे नगर परिषदों की तरफ देखना पड़ता है। आखिर अपने नगर परिषद के जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि कब तक दूसरों के भरोसे व्यवस्था चलाते रहेंगे? अपनी गाड़ी खरीदने के लिए अब तक ठोस पहल क्यों नहीं हुई?
*नेताओं का आगमन होता रहा, मगर श्रद्धालुओं की परेशानी दूर नहीं हुई!*
इस नगरी में मंत्री, विधायक और मुख्यमंत्री तक आ चुके हैं। बड़े-बड़े दावे और विकास की बातें भी होती रही हैं। लेकिन आज भी श्रद्धालुओं को शौचालय जैसी सामान्य सुविधा के लिए परेशान होना पड़ रहा है। क्या जनप्रतिनिधियों की नजर इस समस्या पर कभी नहीं पड़ी? या फिर आम जनता की परेशानी चुनावी मंचों और स्वागत समारोहों के बीच कहीं दबकर रह गई?
*पर्दे लगाकर जिम्मेदारी पूरी, फिर गंदगी फैलने पर कौन होगा जवाबदेह?*
अस्थायी शौचालयों की व्यवस्था में सफाई और रखरखाव की समस्या बनी रहती है। कई बार वे दोबारा उपयोग के लायक नहीं रह जाते। नतीजा यह कि आसपास गंदगी फैलने का खतरा बढ़ता है। रात में आने वाले यात्रियों और महिलाओं को भी परेशानी उठानी पड़ती है। यदि नगर परिषद के पास अपनी मोबाइल टॉयलेट गाड़ी हो, तो मेले के अलग-अलग स्थानों पर स्वच्छ और व्यवस्थित सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है।
*जब वसूली की व्यवस्था है, तो सुविधा देने में इतनी बेरुखी क्यों?*
नगर में आने वाले श्रद्धालुओं और नागरिकों से विभिन्न शुल्क व टैक्स लिए जाते हैं। फिर सवाल उठना लाजिमी है कि जब लोगों से वसूली हो सकती है, तो उनके लिए सम्मानजनक शौचालय व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती? क्या श्रद्धालुओं की सुविधा नगर परिषद की प्राथमिकता में शामिल नहीं है?
*अब नगर परिषद और जनप्रतिनिधियों को देना होगा जवाब!*
1. बिरसिंहपुर में अपनी मोबाइल टॉयलेट गाड़ी आखिर कब खरीदी जाएगी?
2. हर साल दूसरे नगर परिषदों से गाड़ी मांगने की नौबत क्यों आती है?
3. पांच दिवसीय दीपावली मेले में पर्याप्त शौचालय व्यवस्था क्यों नहीं है?
4. महिलाओं, बुजुर्गों और रात्रिकालीन यात्रियों की सुविधा की जिम्मेदारी कौन लेगा?
5. क्या नगर परिषद इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए बजट और प्रस्ताव तैयार करेगी?
*आखिरी सवाल—क्या भोलेनाथ की नगरी सिर्फ मेलों में भीड़ जुटाने के लिए है, या यहां आने वाले श्रद्धालुओं को सम्मानजनक सुविधाएं देना भी किसी की जिम्मेदारी है?*
अब जनता को भाषण नहीं, सुविधा चाहिए। फोटो खिंचवाने और स्वागत कराने से नगर की व्यवस्था नहीं सुधरती। व्यवस्था तब सुधरेगी जब जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि जमीन पर उतरकर जनता की परेशानी का समाधान करेंगे।
नगर परिषद ध्यान दे! मेले खत्म हो जाएंगे, भीड़ चली जाएगी, लेकिन यह समस्या फिर अगले मेले में सामने खड़ी मिलेगी। इसलिए अब बहाने नहीं, मोबाइल टॉयलेट गाड़ी की स्थायी व्यवस्था चाहिए।
*जनता पूछ रही है—आखिर बिरसिंहपुर को अपनी मोबाइल टॉयलेट गाड़ी कब मिलेगी? या फिर श्रद्धालुओं का इंतजार यूं ही जारी रहेगा?*
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