बस्ती: नगर थाने में न्याय लाचार, SHO रामप्रसाद यादव के कार्यकाल में आधा दर्जन से अधिक पीड़ितों को खटखटाना पड़ा न्यायालय का दरवाजा!

अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती: नगर थाने की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल, न्याय के लिए पीड़ितों को खटखटाना पड़ रहा है न्यायालय का दरवाजा
- न्यायालय का सहारा: नगर एसएचओ रामप्रसाद यादव के कार्यकाल में थाने से न्याय न मिलने पर आधा दर्जन से अधिक पीड़ितों को मजबूरन अदालत की शरण लेनी पड़ी।
- गंभीर धाराओं में मुकदमे: अदालत के हस्तक्षेप के बाद अपहरण और ट्राला चोरी जैसी गंभीर घटनाओं में पुलिस को मुकदमा दर्ज करना पड़ा है।
- बढ़ता अपराध: क्षेत्र में लगातार हो रही आपराधिक वारदातों और पुलिस की निष्क्रियता से स्थानीय विधायक की चिंताएं भी बढ़ गई हैं।
- कार्यशैली पर सवाल: पीड़ितों का आरोप है कि थाने के मनमाने रवैये और सुनवाई न होने के कारण आम जनता थाने जाने से डरने लगी है।
खाकी के पहरे में न्याय लाचार, आखिर कब तक अदालत के सहारे चलेंगे थाने?
उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद का नगर थाना इन दिनों अपनी कार्यप्रणाली और कार्यशैली को लेकर सुर्खियों में है। एक तरफ जहां सरकार और प्रशासन कानून-व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त होने का दावा करते नहीं थकते, वहीं नगर थाना क्षेत्र की जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। एसएचओ रामप्रसाद यादव के कार्यकाल में कानून का राज किस कदर बेपटरी हुआ है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि थाने की दहलीज पर इंसाफ की आस लेकर पहुंचने वाले पीड़ितों को बैरंग लौटाया जा रहा है और उन्हें न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है।
स्थिति इतनी दयनीय हो चुकी है कि पिछले कुछ महीनों में आधा दर्जन से अधिक पीड़ितों को थाने से न्याय न मिलने पर न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। न्यायालय के कड़े आदेश के बाद ही नगर थाने में अपहरण, चोरी और हाईवे के पास से ट्राला चोरी जैसी गंभीर घटनाओं में मुकदमे दर्ज किए गए हैं। बड़ा सवाल यह है कि यदि थानों में ही फरियादियों की सुनवाई बंद हो जाएगी और पुलिस महज कागजी खानापूर्ति तक सीमित रहेगी, तो आम आदमी अपनी सुरक्षा की उम्मीद किससे करे?
क्षेत्र में लगातार बढ़ रहे अपराधों और पुलिस की इस उदासीनता ने अब जनप्रतिनिधियों की भी नींद उड़ा दी है। हालात यह हैं कि थाना क्षेत्र के सिटिंग विधायक की चिंताएं भी बढ़ती जा रही हैं, क्योंकि न्याय से वंचित पीड़ित अपनी फरियाद लेकर सीधे जनप्रतिनिधियों के पास पहुंचने को विवश हैं। एक तरफ अपराधी बेखौफ होकर वारदातों को अंजाम दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ थाने पर दर्ज गंभीर मामलों का खुलासा करने में पुलिस पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है।
क्या खाकी का यह रवैया जनता के प्रति जवाबदेही को ताक पर रखने वाला नहीं है? जब एक आम पीड़ित थाने के मुखिया के मनमाने और तानाशाही रवैये के डर से थाने की सीढ़ियां चढ़ने से कतराने लगे, तो समझा जा सकता है कि उस इलाके में कानून-व्यवस्था की स्थिति किस रसातल में जा चुकी है। घटनाएं लगातार हो रही हैं, खुलासे के नाम पर शून्य स्थिति है और जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं।
- थाने की चौखट पर दम तोड़ती उम्मीदें: अपहरण और ट्राला चोरी जैसे मामलों में कोर्ट के आदेश पर दर्ज हो रहे मुकदमे, पुलिस की कार्यशैली पर खड़े हुए बड़े सवाल।
- बस्ती में बेलगाम अपराध और पुलिस की निष्क्रियता: नगर थाने के मनमाने रवैये से बढ़ी विधायक की चिंता, आखिर कब जागेगी खाकी?
- न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर पीड़ित: नगर एसएचओ की कार्यशैली से सहमी जनता, थाने जाने से कतरा रहे फरियादी।
अब समय आ गया है कि उच्चाधिकारी इस मामले का संज्ञान लें और नगर थाने की कार्यशैली की निष्पक्ष जांच कराएं। यदि पीड़ितों को उनके ही थाने में न्याय नहीं मिलेगा, तो कानून पर से जनता का भरोसा उठना लाजिमी है। आखिर इस व्यवस्था की नाकामी की जिम्मेदारी किसकी होगी—यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है जिसका जवाब बस्ती की जनता तलाश रही है।
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