बस्ती फर्जी डीएल मामला: 1017 फर्जी लाइसेंस का सनसनीखेज खुलासा, आयुक्त के आदेश पर चला शिकंजा

अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती फर्जी डीएल मामला: 1017 फर्जी लाइसेंस का बड़ा खेल और महकमे के भीतर सुलगते तीखे सवाल
- आयुक्त का आदेश बड़ा या सहायक की कलम? 6 दोषियों में से 4 पर कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल
- फर्जी डीएल प्रकरण: IAS आशुतोष निरंजन की सख्ती के बावजूद महकमे के भीतर चल रहा ‘बचाव का खेल’
- बस्ती एआरटीओ कार्यालय का कारनामा: जांच में नाम तय होने के बावजूद दो आरोपियों को कथित क्लीन चिट
- सेवा दाता कंपनी ब्लैक लिस्ट, पर क्या परिवहन विभाग के असली गुनहगारों को दी जा रही है ढाल?
बस्ती।। परिवहन आयुक्त IAS आशुतोष निरंजन के कड़े तेवर और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस के दावों के बीच, बस्ती एआरटीओ कार्यालय से जुड़ा फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस (DL) मामला अब एक नए और हैरान करने वाले मोड़ पर आ गया है। इस प्रकरण में एक तरफ जहां बड़े पैमाने पर अनियमितता उजागर हुई है, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक फाइलों के भीतर चल रहा ‘खेल’ न्याय व्यवस्था और विभागीय पारदर्शिता पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर रहा है।
1017 फर्जी डीएल और सेवा दाता कंपनी पर शिकंजा
मामला तब तूल पकड़ा जब जांच के दायरे में यह सनसनीखेज तथ्य सामने आया कि कुछ कर्मचारियों की सुनियोजित मिलीभगत से कुल 1017 फर्जी डीएल तैयार किए गए। परिवहन आयुक्त आशुतोष निरंजन ने इस गंभीर मामले का संज्ञान लेते हुए तत्काल प्रभाव से एक्शन मोड अपनाया और न सिर्फ संलिप्तों पर कार्रवाई के निर्देश दिए, बल्कि इस पूरे फर्जीवाड़े में लिप्त सेवा दाता कंपनी को भी ब्लैक लिस्ट करने का कड़ा आदेश जारी किया। इसके बाद अपर परिवहन आयुक्त चित्रलेखा सिंह के निर्देश पर बस्ती एआरटीओ प्रशासन द्वारा एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया पूरी की गई।
आयुक्त का आदेश भारी या सहायक की कलम?
विवाद की असली जड़ कागजी पत्रावलियों और आदेशों के विरोधाभास में छिपी है। परिवहन आयुक्त के आदेश पत्र (पत्रांक संख्या) में साफ तौर पर 6 कर्मचारियों को दोषी करार दिया गया था। इनमें प्रदीप तिवारी, अखिलेश कुमार, पंकज यादव, प्रवीण यादव समेत दो अन्य कर्मचारियों के नाम शामिल थे। आयुक्त के पत्र में दर्ज विवरण के मुताबिक, प्रदीप तिवारी पर एक फर्जी लाइसेंस और अखिलेश कुमार पर तीन फर्जी लाइसेंस बनाने का सीधा आरोप है।
बावजूद इसके, जब कार्रवाई की तलवार लटकी, तो पत्रांक संख्या और आदेशों के निष्पादन में बड़ा झोल सामने आया। आयुक्त के आदेश में 6 कर्मचारियों को दोषी बताए जाने के बावजूद, कार्रवाई केवल 4 पर सीमित कर दी गई। वहीं, एक अन्य स्तर पर उसी पत्रांक संख्या के भीतर कुछ आरोपियों को कथित तौर पर क्लीन चिट दिए जाने की चर्चा ने तूल पकड़ लिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या परिवहन आयुक्त का आदेश बड़ा है या किसी सहायक की मनमानी कलम?
चोरी एक की हो या लाख की, दोषियों को कौन बचा रहा?
बस्ती एआरटीओ प्रशासन ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर क्रमांक संख्या का हवाला देकर एफआईआर तो दर्ज करा दी है, लेकिन इस कार्रवाई के दायरे से दो आरोपियों के बाहर होने या उन्हें परोक्ष रूप से राहत मिलने की सुगबुगाहट ने कई सुलगते सवाल छोड़ दिए हैं। महकमे में यह चर्चा आम है कि क्या भ्रष्टाचार के इस बड़े खेल में कुछ मोहरों को बचाकर असली गुनहगारों को ढाल दी जा रही है? जब जांच में नाम और कारनामे दोनों बेनकाब हो चुके हैं, तो फिर न्याय की इस प्रक्रिया में चयनात्मक रवैया क्यों अपनाया जा रहा है?
IAS आशुतोष निरंजन की प्रशासनिक सख्ती यदि कागजी खानापूरी बनकर रह जाएगी, तो परिवहन विभाग में व्याप्त इस तरह के फर्जीवाड़ों पर लगाम लगाना मुमकिन नहीं होगा। जनता और कानून के जानकारों की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस पूरे सिंडिकेट के हर एक मोहरे पर बिना किसी भेद-भाव के गाज गिरेगी, या फिर यह मामला भी फाइलों के शोर में कहीं दबकर रह जाएगा।
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