बिना ‘पंजीकरण’ और ‘जीएसटी’ के, ‘पीओसीएल’ को मिला ‘करोड़ों’ का ‘ऑर्डर’

अजीत मिश्रा (खोजी)
स्वास्थ्य विभाग में मिलीभगत का खेल: कमीशन के लालच में एडी हेल्थ, जिला महिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. अनिल कुमार, पीओ ‘सीएल’ के शुभम अग्रवाल और फार्मासिस्ट शैलेन्द्र राय पर मिलीभगत के गंभीर आरोप
- शिकायत दबाने की साजिश: ईमानदार शिकायतकर्ताओं की आवाज दबाने के लिए एडी हेल्थ द्वारा फर्जी रिपोर्ट लगाकर मामले को निक्षेपित (खारिज) कराने का प्रयास।
- फर्जी फर्म और लेटर पैड का इस्तेमाल: बिना पंजीकरण नंबर, बिना जीएसटी, बिना स्थायी पता और बिना मोबाइल नंबर वाली फर्जी फर्म ‘जय श्री श्याम सर्विसेज’ के लेटर पैड पर करोड़ों के रीजेंट की आपूर्ति और भुगतान।
- अवैध प्राइवेट लैब का संचालन: सरकारी अस्पताल के भीतर नियमों के विरुद्ध दो प्राइवेट लैबों का धड़ल्ले से संचालन.
सीएसआर फंड और टर्नओवर नियमों की अनदेखी। - सीएसआर (CSR) फंड से मिलने वाली मशीनों के नाम पर 100 करोड़ के सालाना टर्नओवर के नियम को ताक पर रखकर अंदरखाने कमीशनखोरी का काला कारोबार।
बस्ती।। स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार और घपलेबाजी की इबारत अब इतनी गहरी हो चुकी है कि फाइलें भी चीख-चीखकर धांधली की गवाही दे रही हैं, जहाँ बिना किसी पंजीकरण, बिना जीएसटी नंबर और बिना किसी स्थायी पते के फर्जी फर्मों को करोड़ों रुपये के आर्डर बांटे जा रहे हैं। बस्ती के जिला महिला अस्पताल में कमीशनखोरी का खेल इस हद तक पार हो चुका है कि ‘पीओसीएल’ (POCL) और ‘जय श्री श्याम सर्विसेज’ जैसी कागजी व अस्तित्वहीन फर्मों को नियमों को ताक पर रखकर मालामाल किया जा रहा है।
हद तो तब हो गई जब जिस फर्म के पास न तो कोई वैध पहचान है और न ही टर्नओवर, उसे सीएसआर (CSR) फंड और सरकारी बजट के नाम पर नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए करोड़ों का भुगतान कर दिया गया। जब इस मामले की शिकायत की गई, तो निष्पक्ष जांच करने के बजाय जिम्मेदार अधिकारियों ने फर्जी रिपोर्ट लगाकर फाइलों को ठंडे बस्ते में डालने का कुत्सित प्रयास किया। एडी हेल्थ और महिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. अनिल कुमार पर लगे गंभीर आरोप यह साबित करने के लिए काफी हैं कि कैसे एक संगठित गिरोह स्वास्थ्य सेवाओं की आड़ में सरकारी धन को लूट रहा है।
नियम यह कहता है कि सीएसआर के तहत मशीन दान करने वाली फर्म का सालाना टर्नओवर 100 करोड़ रुपये होना चाहिए और उसे इनकम टैक्स की पात्रता मिलनी चाहिए, लेकिन यहाँ तो एक करोड़ की मशीन दान के नाम पर अंदरखाने कमीशन का ऐसा खेल रचा गया कि प्राइवेट लैबों को सरकारी अस्पतालों के भीतर अवैध रूप से संचालित किया जाने लगा। सवाल यह उठता है कि आखिर किस नियम के तहत बिना टेंडर और बिना मानकों की पूर्ति के इन फर्जी फर्मों को जीवन से खिलवाड़ करने की खुली छूट दी गई है?
यदि समय रहते शासन स्तर से इस पूरे नेक्सस की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच नहीं कराई गई, तो स्वास्थ्य विभाग का यह काला कारोबार आम जनता की जिंदगियों के लिए और अधिक घातक साबित होगा। वक्त आ गया है कि इस कमीशनखोरी की सरपरस्ती करने वाले भ्रष्ट अधिकारियों और फर्जी फर्म संचालकों को कटघरे में खड़ा किया जाए, ताकि सरकारी तिजोरी पर डाका डालने वालों को उनकी सही जगह यानी सलाखों के पीछे भेजा जा सके।
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