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व्यवस्था का ‘दरोगा राज’: मोहरों को सजा, मास्टरमाइंड को शह? अग्निकांड की राख में दबे सवाल: सिर्फ जेई-एई ही दोषी, या शीर्ष पर बैठे आका?

27 Jun 2026, 11:28 AM • Vande Bharat Live TV News
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अजीत मिश्रा (खोजी)

व्यवस्था के ‘मोहरे’ और ‘मास्टरमाइंड’: अलीगंज अग्निकांड से उपजे कड़वे सवाल

​लखनऊ के अलीगंज में हाल ही में हुआ अग्निकांड महज एक दुर्घटना नहीं, बल्कि हमारे प्रशासनिक तंत्र के खोखलेपन का एक और ज्वलंत प्रमाण है। जिस तरह की खबरें सामने आई हैं और जिस स्तर के अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है, उसने व्यवस्था के उन गहरे घावों को फिर से कुरेद दिया है, जिन्हें हम अक्सर उपेक्षा की चादर ओढ़कर ढक देते हैं।

​’पिरामिड’ की राजनीति: बली का बकरा कौन?

​विजिलेंस और अन्य जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गौर करें, तो एक पैटर्न साफ दिखता है। अक्सर रिश्वत लेते पकड़े जाने वाले या कार्रवाई झेलने वाले निचले पायदान के कर्मचारी—लेखपाल या दरोगा—ही होते हैं। यह स्थिति एक आम नागरिक के मन में यह धारणा पुख्ता कर देती है कि शायद पूरी बेईमानी का ढांचा इन्हीं के कंधों पर टिका है।

​लेकिन अलीगंज मामले ने इस भ्रम को तोड़ दिया है। जब पाँच कालिदास मार्ग से जेई, एई और एफएसएसओ स्तर के अधिकारियों पर गाज गिरती है, तो सवाल उठता है—क्या यही ‘सिस्टम’ के संचालक हैं? या फिर ये केवल वे ‘मोहरे’ हैं जिन्हें व्यवस्था के संरक्षण में मलाई खाने की छूट दी गई थी, और अब ‘सेटिंग’ बिगड़ने पर बलि का बकरा बना दिया गया है?

​उत्तरदायित्व का ‘शून्य’ शिखर

​प्रश्न यह है कि क्या जवाबदेही का दायरा केवल फाइल निपटाने वाले अधिकारियों तक ही सीमित रहना चाहिए? एक शहर के भीतर अवैध निर्माण, मानक विहीन इमारतें, अवैध शराब के अड्डे और ड्रग माफियाओं का फलना-फूलना क्या शीर्ष पर बैठे अधिकारियों की जानकारी के बिना संभव है?

​पुलिस कप्तान, कलेक्टर, पुलिस कमिश्नर, मंडलायुक्त और प्राधिकरण के सचिव जैसे उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों का काम केवल फाइलों पर हस्ताक्षर करना या बैठकों में निर्देश देना नहीं होता। उनकी जिम्मेदारी—’सुपरवाइजरी’—की होती है। यदि शहर की सड़कों पर अवैध बाजार सज रहा है, तो उस क्षेत्र के चौकी इंचार्ज से लेकर पुलिस कमिश्नर तक की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यदि मानकों के विपरीत बिल्डिंग बन रही है, तो एलडीए के उपाध्यक्ष और सचिव की जवाबदेही से किनारा नहीं किया जा सकता।

  • जिम्मेदारी का भ्रम (Scapegoating): भ्रष्टाचार के मामलों में अक्सर केवल निचले स्तर के कर्मचारियों (लेखपाल/दरोगा) पर कार्रवाई करके बड़े ‘सिस्टम’ को सुरक्षित बचा लिया जाता है। यह निचले स्तर के लोगों को “बलि का बकरा” बनाने की रणनीति है।
  • शीर्ष अधिकारियों की जवाबदेही: केवल जेई, एई या एफएसएसओ तक सीमित कार्रवाई नाकाफी है। पुलिस कमिश्नर, कलेक्टर, मंडलायुक्त और प्राधिकरण के सचिव जैसे उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों की ‘सुपरवाइजरी’ जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, क्योंकि उनके संज्ञान के बिना शहर में अवैध निर्माण और अपराध फल-फूल नहीं सकते।
  • अघोषित ‘दरोगा राज’: प्रशासनिक तंत्र का जमीन पर स्वरूप ‘अफ़सरशाही’ से हटकर ‘दरोगा राज’ में बदल गया है। जनप्रतिनिधियों और आम जनता की आवाज को नजरअंदाज करना इस बात का प्रमाण है कि सत्ता का वास्तविक नियंत्रण निचले स्तर के फील्ड अधिकारियों के हाथ में है।
  • प्रशासनिक अनदेखी: शहर में चल रहे अवैध कॉल सेंटर्स, मानक विहीन इमारतों और नशे के कारोबार की जानकारी स्थानीय निवासियों को होती है, लेकिन एलडीए, पुलिस और आबकारी जैसे विभाग या तो जानबूझकर आंखें मूंद लेते हैं या मिलीभगत के कारण मौन रहते हैं।
  • आपदा में अवसर का खेल: आम जनता में यह गहरा अविश्वास है कि अग्निकांड जैसी त्रासदियां केवल दुखद घटनाएं नहीं हैं, बल्कि ‘बेईमान गिद्धों’ के लिए अवैध कमाई के नए रास्ते और वसूली के अवसर खोलने का जरिया बन जाती हैं।
  • व्यवस्था सुधार की चुनौती: जब तक उच्च पदस्थ अधिकारियों की कुर्सी उनकी विफलता पर नहीं डोलती, तब तक कोई भी कार्रवाई केवल एक रस्म अदायगी बनी रहेगी और आम नागरिक का सिस्टम से भरोसा पूरी तरह खत्म हो जाएगा।

​अघोषित ‘दरोगा राज’ और आम जन की बेबसी

​आज की हकीकत यह है कि व्यवस्था ‘दरोगा राज’ और ‘फील्ड अधिकारियों’ के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई है। जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा और आम जनमानस की अनदेखी इस बात का प्रमाण है कि सत्ता का हस्तांतरण केवल कागजों पर हुआ है, जमीन पर नहीं। शहर के सक्रिय नागरिक को पता है कि कहाँ अवैध कॉल सेंटर चल रहा है, कहाँ नशीले पदार्थों का कारोबार हो रहा है, लेकिन जिन विभागों (एलडीए, पुलिस, आबकारी) को यह सब रोकना है, वे या तो अंधे हो जाते हैं या फिर मौन साधे रहते हैं।

​याददाश्त का संकट और ‘गिद्धों’ का उत्सव

​इतिहास गवाह है कि हमने कोविड, कुंभ और हाथरस जैसी त्रासदियों को समय के साथ भुला दिया है। अलीगंज अग्निकांड भी शायद कुछ समय बाद पुरानी फाइलों में दब जाएगा। सबसे डरावना यह है कि शहर की चौकड़ियों पर अब यह चर्चा आम है कि “इस अग्निकांड की आड़ में बेईमान गिद्धों की कमाई बढ़ जाएगी।” यानी, आपदा में अवसर तलाशने वाले इस तंत्र का चरित्र अब आम आदमी के लिए किसी रहस्य से कम नहीं रह गया है।

​निष्कर्ष

​यदि हम वास्तव में व्यवस्था में सुधार चाहते हैं, तो ‘सजा’ का मानक बदलना होगा। जब तक शीर्ष पर बैठे अधिकारियों की कुर्सी उनकी प्रशासनिक विफलता (अवैध गतिविधियों को न रोक पाना) पर नहीं डोलती, तब तक निचले स्तर के कर्मचारियों पर की जाने वाली कार्रवाई केवल एक दिखावा बनी रहेगी।

​प्रशासन को यह समझना होगा कि शहर की आग केवल उस बिल्डिंग में नहीं लगी थी, बल्कि वह उस भरोसे में भी लगी है, जो एक आम नागरिक का सरकारी व्यवस्था से टूट चुका है। यदि इस बार भी कार्रवाई केवल ‘जेई-एई’ तक सिमट गई, तो यह आग भविष्य में किसी और रूप में फिर से दिखाई देगी।

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