फाइलें जो कचरे में दम तोड़ देती हैं: क्यों आम आदमी की ‘सुनवाई’ महज एक कागजी छलावा है?

अजीत मिश्रा (खोजी)
क्या फरियाद का अंत ‘कचरे की पेटी’ में ही लिखा है? – व्यवस्था के ‘मठाधीशों’ पर एक कड़वा प्रहार
- “जनसुनवाई पोर्टल से पारदर्शिता तक: अब जांच के तरीके बदलने होंगे।”
- “जांच अधिकारी की मनमानी पर लगाम जरूरी, तभी सुधरेगा थाना-तहसील का ढांचा।”
- “क्रॉस-डिस्ट्रिक्ट जांच और वीडियो रिकॉर्डिंग: भ्रष्टाचार मिटाने का एकमात्र रास्ता।”
- “फरियाद के नाम पर छलावा नहीं, अब ‘जवाबदेही’ तय करने का वक्त आ गया है।”
लोकतंत्र में ‘जनता दरबार’ और ‘ऑनलाइन पोर्टल’ को सुशासन की रीढ़ माना जाता है। उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक, सरकारें दावा करती हैं कि उनकी “पहुंच अंतिम व्यक्ति तक है”। लेकिन, धरातल पर स्थिति भयावह है। आम आदमी जब अपनी आपबीती लेकर जनता दर्शन में पहुंचता है या PMO-PG/जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत दर्ज करता है, तो उसे लगता है कि अब न्याय मिलेगा। लेकिन हकीकत यह है कि यह पूरी कवायद एक ‘धोखाधड़ी’ के जाल से कम नहीं है। जनता दर्शन, PMO-PG पोर्टल, जनसुनवाई और रजिस्टर्ड डाक—ये नाम सुनने में तो लोकतंत्र के ‘पवित्र मार्ग’ लगते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि ये आम आदमी की उम्मीदों की कब्रगाह बन चुके हैं। आज उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक, शिकायत तंत्र एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसा है जहाँ न्याय की उम्मीद करना ही सबसे बड़ा ‘गुनाह’ बन गया है।
’शिकायतकर्ता’ से ‘अपराधी’ बनाने का खेल
हकीकत यह है कि पीड़ित चाहे अपनी फरियाद मुख्यमंत्री के जनता दर्शन में दे या प्रधानमंत्री कार्यालय के पोर्टल पर, अंततः वह फाइल घूम-फिरकर उसी लोकल थाने, तहसील या ब्लॉक के टेबल पर पहुँचती है, जिसके खिलाफ शिकायत की गई है। यह व्यवस्था का वह क्रूर मज़ाक है जहाँ “आरोपी ही जज” बन जाता है। भ्रष्ट जांच अधिकारी और धनबली प्रभावशालियों का गठजोड़ इतना मजबूत है कि वे फर्जी रिपोर्ट लगाकर या तो मामले को रफा-दफा कर देते हैं, या फिर पीड़ित को ही किसी झूठे मुकदमे में फंसाकर उसका मुंह बंद कर देते हैं।हमारी व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष यह है कि शिकायत की जांच उसी विभाग या अधिकारी को दी जाती है, जिस पर भ्रष्टाचार का आरोप है। यदि किसी ने लेखपाल, दरोगा, खंड शिक्षा अधिकारी या पंचायत सचिव के खिलाफ शिकायत की, तो वह पत्र घूम-फिरकर उसी मेज पर पहुंचता है।
क्या किसी अपराधी से यह उम्मीद की जा सकती है कि वह खुद को दोषी ठहराएगा? बिल्कुल नहीं। नतीजा यह होता है:
जांच अधिकारी आरोपी से मिलकर ‘फर्जी रिपोर्ट’ तैयार करता है।
पीड़ित को ‘झूठी शिकायत’ करने के नाम पर धमकाया जाता है।
फाइल पर ‘मामला निस्तारित’ की मुहर लग जाती है, जबकि जमीनी हकीकत जस की तस रहती है।
सत्ता के ‘इच्छाधारी मठाधीश’
इस पूरी विफलता के पीछे कौन है? वे ‘इच्छाधारी मठाधीश’ जो पाला बदलकर हमेशा सत्ता के करीब बने रहते हैं। सरकारें बदलती हैं, लेकिन इनका ‘रेट-कार्ड’ नहीं बदलता। स्थानीय जनप्रतिनिधियों से लेकर विभागीय अधिकारियों तक, भ्रष्टाचार का एक ‘फिक्स्ड कमीशन’ तय है। निचले स्तर से लेकर ऊपर तक बँटने वाला यह ‘सुविधा शुल्क’ ही वह गोंद है, जो इस भ्रष्ट तंत्र को मजबूती से जोड़े हुए है। इसीलिए, जब तक जांच अधिकारी नहीं सुधरेंगे, तब तक ‘रामराज्य’ केवल भाषणों का आभूषण बना रहेगा।भ्रष्टाचार अब एक व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि ‘संस्थागत संस्कृति’ बन चुका है। जिलों में कुछ ऐसे “इच्छाधारी मठाधीश” सक्रिय हैं जो सरकार किसी की भी हो, अपना दबदबा बनाए रखते हैं। ये सत्ता की हर धुरी के साथ तालमेल बिठा लेते हैं।
नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार का ‘रेट-कार्ड’ तय है:
थाना-तहसील स्तर: दरोगा, लेखपाल और बीडीओ का हिस्सा बंधा हुआ है।
ऊपरी गलियारा: विभाग के मंत्रियों और प्रभावशाली जनप्रतिनिधियों तक एक निश्चित प्रतिशत का ‘कमीशन’ पहुंचता है।
नतीजा: जब ऊपर तक ‘हिस्सा’ पहुंच रहा हो, तो अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की उम्मीद करना बेमानी है। इसीलिए शिकायत पोर्टल फेल हैं; वे महज आंकड़ों का खेल बनकर रह गए हैं।
व्यवस्था क्यों ‘कचरा पेटी’ बन गई है?
लोग रजिस्टर्ड डाक से शिकायतें भेजते हैं, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी यह पता नहीं चलता कि पत्र किस टेबल से होकर किस कूड़ेदान में गिरा। जब तक ‘जवाबदेही’ (Accountability) तय नहीं होगी, तब तक शिकायतें महज कागज के टुकड़े ही रहेंगी। जनता का यह सवाल अब जायज है—क्या जनता दर्शन केवल फोटोशूट के लिए है, या वास्तव में न्याय के लिए?
सुधार की अनिवार्य मांगें
अगर सरकार वास्तव में न्याय चाहती है और शासन को पारदर्शी बनाना चाहती है, तो केवल जनता दर्शन के फोटो काफी नहीं हैं। इसके लिए व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन अनिवार्य है:
- क्रॉस-डिस्ट्रिक्ट जांच: एक जिले की शिकायत दूसरे जिले के निष्पक्ष अधिकारी को सौंपी जाए। अपने ही क्षेत्र के अधिकारियों के खिलाफ जांच की अपेक्षा करना बेईमानी है।
- ‘Conflict of Interest’ कानून: आरोपी से जुड़े या उसी विभाग के किसी भी अधिकारी को जांच का जिम्मा न दिया जाए। ‘आरोपी को जांच सौंपने’ की प्रथा तुरंत बंद हो।
- जांच की वीडियो रिकॉर्डिंग: हर जांच प्रक्रिया अनिवार्य रूप से वीडियो ग्राफी के दायरे में हो, ताकि भविष्य में फर्जी रिपोर्ट लगाने वाले अधिकारी पर कानूनी डंडा चल सके।
- शिकायत ट्रैकिंग पब्लिक हो: PMO/CM पोर्टल की फाइलों का स्टेटस पब्लिक डोमेन में हो, ताकि जनता देख सके कि उसकी फाइल किस बाबू की मेज पर धूल फांक रही है और वहां से उसे क्यों नहीं निकाला गया।
निष्कर्ष: सुधार नीचे से शुरू होगा
शासन ऊपर से नहीं, बल्कि थाना, तहसील और ब्लॉक से सुधरता है। जब तक अंतिम छोर पर बैठा अधिकारी ‘भयमुक्त’ रहेगा और पीड़ित ‘पीड़ित’ ही बना रहेगा, तब तक सुशासन का हर दावा अधूरा है।
समय आ गया है कि जनता दर्शन के पत्रों को ‘दबाव’ से नहीं, बल्कि ‘न्याय’ की कसौटी पर तोला जाए। यदि जांच अधिकारियों की नकेल नहीं कसी गई, तो यह व्यवस्था आम आदमी के भरोसे को पूरी तरह निगल जाएगी।
थाना, तहसील और ब्लॉक—यही लोकतंत्र की पहली और सबसे महत्वपूर्ण इकाई हैं। जब तक ये इकाइयां पारदर्शी नहीं होंगी, तब तक ऊपर की बड़ी-बड़ी योजनाएं सिर्फ कागजी ढकोसला साबित होती रहेंगी।
मुख्यमंत्री जी, आपने जनता की आवाज सुनने का साहस दिखाया है, अब उस आवाज को न्याय तक पहुंचाने का संकल्प भी दिखाइए। वरना, ये फरियादें इसी तरह ‘कचरे की पेटी’ में जाती रहेंगी और व्यवस्था पर जनता का भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा।
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