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‘जीवनरक्षक’ बनीं ‘जानलेवा’: यूपी के सरकारी अस्पतालों में घटिया दवाओं का खेल

28 Jun 2026, 12:15 PM • Vande Bharat Live TV News
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अजीत मिश्रा(खोजी)

बच्चों की सेहत से खिलवाड़: ‘बीमार’ व्यवस्था और मौत का सबब बनती दवाएं

  • बच्चों की सेहत से खिलवाड़: सरकारी स्कूलों में सप्लाई की जा रही ‘फेल’ दवाएं
  • दवा नहीं, जहर! सरकारी जांच में फेल हुईं कीड़े मारने की टैबलेट्स

​उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिस ‘एल्बेंडाजोल-400 एमजी’ टैबलेट पर बच्चों के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने का दारोमदार था, वही अब खुद बीमारी का कारण बन गई है। सरकारी अस्पतालों में सप्लाई की जा रही पेट के कीड़े मारने वाली यह दवा सरकारी जांच में ‘फेल’ पाई गई है। यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि लाखों मासूमों के जीवन के साथ किया गया आपराधिक खिलवाड़ है।खरीद प्रक्रिया में गहरे प्रशासनिक गड्ढे

उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाई कॉर्पोरेशन (UPMSCL) पर राज्य के अस्पतालों में समय पर और अच्छी गुणवत्ता वाली दवाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है। हालांकि, जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है:

  • गुणवत्ता नियंत्रण की विफलता: दवाएं शरीर के अंदर निर्धारित समय (जैसे 15-30 मिनट) में घुलने या दवा के घटक (composition) में कमी होना एक गंभीर तकनीकी चूक है। जब 500 एमजी की दवा में सक्रिय तत्व कम पाए जाते हैं, तो वह दवा ‘दवा’ नहीं, केवल एक प्रभावहीन टुकड़ा बनकर रह जाती है।
  • दवा किल्लत और विवशता: अक्सर सरकारी अस्पतालों में दवाओं की किल्लत के कारण मरीज बाहर से दवा खरीदने को मजबूर होते हैं। दवाओं का स्टॉक न होना और फिर आनन-फानन में की गई खरीद में गुणवत्ता से समझौता करना एक चक्र की तरह चल रहा है।
  • प्रभावी रिकॉल तंत्र का अभाव: भारत में ‘सब-स्टैंडर्ड’ दवाओं को बाजार या अस्पतालों से तुरंत वापस लेने (Mandatory Recall) के लिए कोई सशक्त कानून नहीं है। यूपी में भी, जब किसी दवा को फेल घोषित किया जाता है, तब तक वे दवाएं कई बच्चों और मरीजों तक पहुँच चुकी होती हैं।

 प्रशासनिक जवाबदेही का संकट

  • दवाओं की गुणवत्ता की जांच करने वाली प्रयोगशालाओं को भी अक्सर संसाधनों, उपकरणों और कुशल जनशक्ति की कमी का सामना करना पड़ता है। जब नियामक संस्थाएं ही पर्याप्त रूप से सुसज्जित नहीं होंगी, तो बाजार में और अस्पतालों में बिकने वाली दवाओं की शुद्धता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
  • कंपनियों को ‘ब्लैकलिस्ट’ करना या 3 साल के लिए बैन कर देना एक सतही कार्रवाई है। असल समस्या उस टेंडर प्रक्रिया में है, जहाँ कंपनियों का चयन केवल सबसे सस्ती बोली के आधार पर किया जाता है, अक्सर उनकी साख या विनिर्माण क्षमता की गहन जांच किए बिना। यह ‘सस्ता’ विकल्प अंततः जनता के लिए ‘महंगा’ और जानलेवा साबित हो रहा है।

आगे की राह क्या?

केवल सप्लायर को बैन करने से व्यवस्था नहीं सुधरेगी। सरकार को निम्नलिखित कदम उठाने की तत्काल आवश्यकता है:

  • कठोर ऑडिट: दवाओं की खरीद से लेकर वितरण तक एक ‘ट्रैक-एंड-ट्रेस’ (Track-and-Trace) प्रणाली अनिवार्य की जाए।
  • जवाबदेही तय करना: यदि कोई दवा सब-स्टैंडर्ड पाई जाती है, तो आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) के उन अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए जिन्होंने इन दवाओं की खरीद को मंजूरी दी थी।
  • पारदर्शी खरीद: टेंडर प्रक्रियाओं में कंपनियों के पिछले ट्रैक रिकॉर्ड और उनकी विनिर्माण इकाइयों की स्वतंत्र जांच (third-party audit) अनिवार्य होनी चाहिए।

सिस्टम की लापरवाही का काला सच

नेशनल डीवार्मिंग डे (National Deworming Day) के अवसर पर सरकारी और निजी स्कूलों में बच्चों को जो दवा दी जाती है, वह अब संदेह के घेरे में है। कई मौकों पर यह खबरें सामने आई हैं कि इस दवा के सेवन के बाद बच्चों की तबीयत बिगड़ी है। फाइल “1003313494.jpg” में दिखाई गई दवा, जो स्वास्थ्य सुरक्षा का वादा करती है, आज उसी की विश्वसनीयता तार-तार हो चुकी है। क्या हमारी व्यवस्था इतनी जर्जर हो चुकी है कि बच्चों के मुंह में ‘दवा’ की जगह ‘जहर’ भेजा जा रहा है?

एफी पैरेन्ट्रल्स पर कार्रवाई: क्या यह काफी है?

उत्तर प्रदेश सरकार ने घटिया दवा सप्लाई करने वाली कंपनी ‘एफी पैरेन्ट्रल्स’ को 3 साल के लिए बैन कर दिया है। सवाल यह है कि इस बैन से उन बच्चों को क्या राहत मिलेगी जिन्होंने यह दवा खाई और बीमार पड़े? कंपनी को काली सूची में डाल देना मात्र एक खानापूर्ति है।

​इस पूरी प्रक्रिया में जिम्मेदारी किसकी थी? किस स्तर पर गुणवत्ता की जांच (Quality Control) में हेराफेरी हुई और टेंडर मिलने से पहले किस अधिकारी ने इन मानकों को नजरअंदाज किया? जब तक उन सफेदपोशों और भ्रष्ट अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ‘घटिया दवाओं’ का यह धंधा चलता रहेगा।

निगरानी का ढकोसला

आज जब हम स्वास्थ्य सुविधाओं के आधुनिक होने का दावा करते हैं, तब यह घटना साबित करती है कि जमीनी हकीकत खोखली है। सरकारी सप्लाई चैन में सेंधमारी यह बताती है कि मुनाफाखोरी मानवीय मूल्यों पर भारी पड़ रही है। अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं कि वे स्वस्थ होकर लौटें, न कि सरकारी लापरवाही के कारण अस्पताल की बेड पर पहुँचें।

​सरकार को इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच करवानी चाहिए और केवल कंपनी को बैन करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला में शामिल हर दोषी को कटघरे में खड़ा करना चाहिए। बच्चों के स्वास्थ्य के साथ प्रयोग करने वालों के लिए केवल 3 साल का प्रतिबंध ही पर्याप्त सजा नहीं है; यह एक जघन्य अपराध है।

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