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उत्तर प्रदेश

‘नेताओं’ का दोहरा चरित्र: विकास के नाम पर ‘वसूली’ का खेल!

28 Jun 2026, 01:23 PM • Vande Bharat Live TV News
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अजीत मिश्रा (खोजी)

जमीनी हकीकत: बस्ती में ‘विकास’ बनाम ‘वसूली’ का घिनौना खेल

  • विकास के दुश्मन बने ‘कथित नेता’: रील बनाने और दलाली के लिए लगा रहे फैक्ट्री का विरोध!
  • जनता बेनकाब कर रही नेताओं का सच: “पैसा मिला नहीं कि विरोध हुआ खत्म!”

बस्ती: बस्ती जनपद के रुधौली विधानसभा क्षेत्र के दसिया में स्थापित हो रही एथेनॉल फैक्ट्री इन दिनों न केवल औद्योगिक चर्चाओं में है, बल्कि स्थानीय राजनीति के सबसे शर्मनाक अध्याय का केंद्र भी बन गई है। यह फैक्ट्री अब औद्योगिक प्रगति से ज्यादा नेताओं के ‘दोहरे चरित्र’ का आईना बन गई है।हमारे जिले में इन दिनों विकास और ‘विवाद’ का एक ऐसा तमाशा चल रहा है, जो सीधे तौर पर नेताओं के दोहरे चरित्र को बेनकाब करता है। रुधौली विधानसभा क्षेत्र के दसिया में बन रही एथेनॉल फैक्ट्री इसका सबसे ताजा उदाहरण है। फैक्ट्री का निर्माण लगभग पूरा हो चुका है, लेकिन इसे लेकर मचाया जा रहा ‘विपक्ष’ का शोर, विकास से ज्यादा ‘वसूली’ की बू दे रहा है।

​’विरोध’ का एजेंडा: विकास से पहले ‘सुविधा शुल्क’ की मांग

​सोशल मीडिया और स्थानीय गलियारों में इस बात की जोरदार चर्चा है कि फैक्ट्री का विरोध करने वाले कुछ नेता दरअसल इस विकास कार्य को रोकने में नहीं, बल्कि उसे अपने निजी लाभ के लिए ‘मैनेज’ करने में लगे हैं। जनता का एक बड़ा वर्ग अब इस सच्चाई से वाकिफ है कि इन नेताओं का विरोध किसी जनहित के लिए नहीं, बल्कि एक तय ‘डीलिंग’ का हिस्सा है। जैसे ही फैक्ट्री प्रबंधन से समझौता होगा और ‘जेबें गर्म’ होंगी, विरोध का यह सुर अचानक शांत हो जाएगा।यह कोई छिपी बात नहीं है कि हमारे यहाँ कुछ नेता पहले किसी भी प्रोजेक्ट का शोर-शराबा करके विरोध करते हैं, और फिर जैसे ही उनकी ‘जेबें गर्म’ होती हैं, विरोध का यह नाटक मिनटों में खत्म हो जाता है। सोशल मीडिया पर आम जनता इस खेल को बखूबी समझ रही है। सवाल यह है कि जब फैक्ट्री का एमओयू मुख्यमंत्री स्तर से हो चुका है और काम अंतिम चरण में है, तो अब विरोध का क्या औचित्य है? क्या यह केवल अपनी राजनीति चमकाने या जनता को बरगलाने का जरिया नहीं है?

​सोशल मीडिया पर जनता का फूटा गुस्सा

​इस पूरे प्रकरण पर आम नागरिकों और प्रबुद्धजनों की प्रतिक्रियाएं नेताओं के लिए एक बड़ा आईना हैं। सोशल मीडिया पर लोग इस तरह की टिप्पणियों से अपना आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं:

  • कमीशनखोरी का पर्दाफाश: आम लोगों का कहना है कि जो नेता आज विरोध का झंडा लेकर खड़े हैं, वे वास्तव में अपना हिस्सा (कमीशन) पक्का करने में लगे हैं। जैसे ही उन्हें ‘माल’ मिल जाएगा, वे खामोश हो जाएंगे।
  • विकास में बाधा: स्थानीय लोगों का मानना है कि रुधौली जैसे क्षेत्र में एथेनॉल फैक्ट्री का आना जिले के औद्योगिक विकास के लिए एक मील का पत्थर है। इसे रोजगार के अवसर पैदा होंगे, किसानों को अपनी उपज का बेहतर बाजार मिलेगा। ऐसे में इसका विरोध करना सीधे तौर पर जिले की प्रगति को बाधित करने जैसा है।
  • ‘रील’ बनाने वाले नेता: कई लोगों ने तो यहाँ तक कहा है कि कुछ नेता सिर्फ सोशल मीडिया पर अपनी ‘रील’ बनाने और सुर्खियों में बने रहने के लिए बिना किसी तथ्य के विरोध कर रहे हैं। उन्हें विकास से कोई लेना-देना नहीं है।

​सत्ताधारी नेताओं का ‘विरोधाभास’

​इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जो लोग सत्ताधारी दल (भाजपा) से जुड़े होने का दावा करते हैं, वे भी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा समर्थित और मुख्यमंत्री स्तर से मंजूर परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं। यह स्थिति यह दर्शाती है कि इन नेताओं के लिए पार्टी की नीति और विकास से बढ़कर अपना निजी ‘व्यापार’ है।हैरानी की बात यह है कि जो लोग खुद को पार्टी का निष्ठावान बताते हैं, वे भी पार्टी द्वारा समर्थित विकास कार्यों का विरोध करने से बाज नहीं आ रहे हैं। यदि सत्ता में बैठे लोगों के अपने ही लोग विकास कार्यों में अड़ंगा डालेंगे, तो जिले की प्रगति की उम्मीद किससे की जाए?

​प्रबुद्ध वर्ग की टिप्पणी: “सब कुछ राजनीति चमकाने का खेल”

​बुद्धिजीवी वर्ग का मानना है कि जिले में जब वर्षों बाद कोई बड़ा औद्योगिक निवेश आ रहा है, तो उसका स्वागत करने के बजाय उस पर दलाली करना निंदनीय है। कुछ लोगों ने तो इसे “50 रुपये का खेल” करार दिया है, जहाँ विरोध को एक हथियार बनाकर शाम के ‘इंतजाम’ करने की कोशिश की जा रही है।

​अजय, अभय, अमरदीप, अमित प्रताप, अनिल मिश्र और मनीष सोनी जैसे लोगों द्वारा व्यक्त की गई राय यह स्पष्ट करती है कि जनता अब इन नेताओं के ‘विरोध वाले ड्रामे’ को अच्छी तरह समझ चुकी है।

​निष्कर्ष: ‘फैक्ट्री बनेगी और चलेगी भी’

​प्रशासनिक गलियारों और जनता की राय को देखें तो यह स्पष्ट है कि एथेनॉल फैक्ट्री का निर्माण किसी के विरोध से रुकने वाला नहीं है। यह परियोजना आगे बढ़ेगी, लेकिन इसके साथ ही उन नेताओं का असली चेहरा भी बेनकाब हो गया है जो विकास के नाम पर ‘वसूली’ का धंधा चला रहे हैं।नेताओं को यह समझना होगा कि जनता अब जागरूक हो चुकी है। वे भली-भांति जानती हैं कि कौन वास्तव में जिले के विकास के लिए चिंतित है और कौन सिर्फ अपनी जेब भरने के लिए ‘हल्ला’ मचा रहा है। फैक्ट्री बनेगी भी और चलेगी भी, लेकिन नेताओं का यह ‘विरोध और फिर चुप हो जाने’ का गंदा खेल उन्हें जनता की नजरों में पूरी तरह बेनकाब कर चुका है।

​समय आ गया है कि बस्ती की जनता ऐसे ‘विरोध करने वाले’ नेताओं को चिन्हित करे और उनसे पूछे कि क्या वे जिले के विकास के साथ हैं या अपनी तिजोरी भरने के साथ? याद रहे, विकास की रफ्तार को रोकने वाले दलालों को इतिहास कभी माफ नहीं करेगा।

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