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बस्ती: पत्रकारों पर हमले के बाद भी पुलिस की चुप्पी, एफआईआर दर्ज न होने से आक्रोश

29 Jun 2026, 12:05 PM • Vande Bharat Live TV News
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अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती: पीएचसी बनकटी में पत्रकारों पर ‘हमला’, पुलिस की सुस्त कार्यशैली पर उठे सवाल

  • दबंगों के आगे नतमस्तक पुलिस? पत्रकारों पर हमले के आरोपियों को बचाने का आरोप
  • बस्ती में पत्रकारों का अपमान: साक्ष्य नष्ट करने और धमकाने के मामले में नहीं हो रही एफआईआर
  • न्याय के लिए दर-दर भटक रहे पत्रकार: पीएचसी में हुई घटना पर पुलिस की निष्क्रियता से बढ़ा रोष

बस्ती। बस्ती जिले का लालगंज थाना क्षेत्र इन दिनों कानून-व्यवस्था को लेकर सुर्खियों में है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकार, जो समाज की समस्याओं को आईना दिखाते हैं, खुद आज अपराधियों के निशाने पर हैं और न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। लालगंज में पत्रकारों के साथ हुई अभद्रता और धमकी का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है, और पुलिस की निष्क्रियता ने इस मामले को और अधिक गंभीर बना दिया है।लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी पत्रकारिता की रक्षा का दम भरने वाला प्रशासन क्या अब अपराधियों की ढाल बन गया है? बस्ती जिले के लालगंज थाना क्षेत्र में पत्रकारों के साथ हुई अभद्रता, गाली-गलौज, धमकी और मारपीट के मामले में पुलिस की कार्यशैली ने न केवल स्थानीय पत्रकारों में आक्रोश भर दिया है, बल्कि खाकी की निष्पक्षता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।

घटना का घटनाक्रम

​प्राप्त जानकारी के अनुसार, पत्रकार रोहित कुमार, परवेज आजम, बालकृष्ण और उनके अन्य साथी जब पीएचसी बनकटी में समाचार संकलन के लिए पहुँचे, तो उन्हें वहाँ तीखे विरोध का सामना करना पड़ा। आरोप है कि वहाँ मौजूद झिन्ना चौधरी, महेंद्र चौधरी, रंजीत नाई और अमन चौधरी (सभी निवासी बघाड़ी, थाना लालगंज) ने न केवल पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार किया और अभद्र भाषा का प्रयोग किया, बल्कि उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी।

​इतना ही नहीं, आरोपियों ने पत्रकारों पर दबाव बनाकर उनके मोबाइल से कवरेज के डिजिटल साक्ष्य तक मिटवा दिए। यह घटना स्पष्ट रूप से प्रेस की स्वतंत्रता और सरकारी संस्थान के भीतर अराजकता का एक बड़ा उदाहरण है।

तहरीर के बाद भी एफआईआर का इंतजार

​घटना के तुरंत बाद पीड़ित पत्रकारों ने एकजुट होकर लालगंज थाने में नामजद तहरीर दी। पत्रकारों ने औपचारिक रूप से पुलिस के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज कराई है। लेकिन खेद का विषय यह है कि शिकायत के इतने दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है और न ही मामला दर्ज (एफआईआर) किया गया है।

पुलिस की कार्यशैली पर गहरा आक्रोश

​पुलिस की इस लेटलतीफी और आरोपियों के प्रति नरम रुख ने स्थानीय पत्रकार बिरादरी में गहरा आक्रोश पैदा कर दिया है। पत्रकारों का स्पष्ट मानना है कि यदि प्राथमिकी दर्ज करने में इतनी देरी की जा रही है, तो कहीं न कहीं पुलिस आरोपियों को बचाने का प्रयास कर रही है। पत्रकार संगठनों ने पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए इसे ‘प्रशासनिक विफलता’ करार दिया है।

सुरक्षा पर सवाल और चेतावनी

​पत्रकारों का कहना है कि “पत्रकार कहीं भी सुरक्षित नहीं है।” जब पीएचसी जैसे सार्वजनिक स्थानों पर पत्रकारों के साथ ऐसी घटनाएं हो सकती हैं, तो आम नागरिकों की सुरक्षा का क्या हाल होगा, यह सहज ही समझा जा सकता है।

​पीड़ित पत्रकारों ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि:

  • ​मामले को तत्काल गंभीरता से लिया जाए और दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो।
  • ​पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित किया जाए।
  • ​यदि न्याय मिलने में और देरी हुई, तो पत्रकार संघ आंदोलन के लिए विवश होंगे।

निष्कर्ष

​बस्ती पुलिस प्रशासन अब पूरी तरह से सवालों के घेरे में है। क्या पुलिस राजनीतिक या किसी अन्य दबाव में है, या फिर अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्हें कानून का डर नहीं रहा? अब सभी की निगाहें पुलिस के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या प्रशासन एक निष्पक्ष जांच बैठाकर दोषियों को जेल भेजेगा, या फिर पत्रकारों की आवाज को ऐसे ही दबा दिया जाएगा?

यह घटना केवल चंद पत्रकारों के अपमान की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की विफलता है जो अभिव्यक्ति की आजादी और प्रेस की स्वतंत्रता का दावा करती है। यदि पुलिस प्रशासन ने समय रहते दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की, तो यह मान लिया जाएगा कि बस्ती में ‘जंगलराज’ का बोलबाला है। पत्रकारों की चेतावनी स्पष्ट है—न्याय नहीं तो आंदोलन। अब गेंद पुलिस प्रशासन के पाले में है; देखना यह है कि वे कानून का पालन करते हैं या फिर अपराधियों को बचाने का कलंक अपने माथे पर लेते हैं।

​यह मामला न केवल पत्रकारों के आत्मसम्मान का है, बल्कि यह बस्ती में कानून के शासन की परीक्षा भी है।

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