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प्रशासनिक ओवरलैपिंग: क्या सीडीओ की ‘व्हाट्सएप हाजिरी’ से सुधरेगा खाद का संकट?

02 Jul 2026, 08:22 AM • Vande Bharat Live TV News
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अजीत मिश्रा (खोजी)

​’एआर’ साहब घर ‘जाइए’, ‘सीडीओ’ साहब ‘सब’ संभाल ‘लेंगे’!

  • प्रशासनिक विफलता और जवाबदेही पर रिपोर्ट: बस्ती का उर्वरक संकट और ‘अति-सक्रियता’ का सच
  • जमीनी हकीकत से दूर, ‘व्हाट्सएप’ पर सिमटी प्रशासन की सक्रियता: क्या सीडीओ साहब ही सब संभाल लेंगे?
  • भ्रष्टाचार का ‘मनरेगा’ मॉडल: 3 अरब 12 करोड़ खर्च, फिर भी धरातल पर सन्नाटा
  • क्या सीडीओ साहब के लिए ही सीमित है जिले की बागडोर, बाकी अधिकारी घर बैठें?

बस्ती: जिले की प्रशासनिक व्यवस्था इन दिनों एक अजब ही दौर से गुजर रही है। आलम यह है कि जिस अधिकारी को जो काम सौंपा गया है, वह उसे करने के बजाय दूसरे विभागों के कार्यों में हस्तक्षेप करने में ज्यादा व्यस्त है।सीडीओ साहब की अति-सक्रियता अब सवालों के घेरे में है।जिले की प्रशासनिक व्यवस्था इस समय एक अजीबोगरीब ‘ओवरलैपिंग’ (कार्यक्षेत्र के अतिक्रमण) के दौर से गुजर रही है। आलम यह है कि जिस अधिकारी को जो कार्य करना चाहिए, वह उसे छोड़कर दूसरे के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने में व्यस्त है। प्रशासन की यह कार्यप्रणाली अब चर्चा का विषय बन गई है और सवाल उठ रहे हैं कि आखिर जिले का विकास किस दिशा में जा रहा है?

​क्या पद और गरिमा का है मजाक?

​ यदि सीडीओ साहब ही व्हाट्सएप के जरिए सचिवों की हाजिरी लेंगे, उर्वरक का आवंटन करेंगे और समितियों तक खाद पहुंचाएंगे, तो फिर एआर (AR), डीएसओ और एडीओ जैसे अधिकारियों की आवश्यकता ही क्या है? प्रशासनिक नियमों को दरकिनार कर की जा रही यह दखलअंदाजी व्यवस्था को सुधारने के बजाय और अधिक पटरी से उतार रही है।प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि यदि मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) साहब ही सचिवों की व्हाट्सएप के जरिए हाजिरी लेने का काम करेंगे, उर्वरक आवंटन करेंगे और समितियों तक खाद पहुंचाएंगे, तो फिर एआर (AR), डीएसओ और एडीओ जैसे अधिकारियों की आवश्यकता ही क्या है? इन विभागों के अधिकारियों को उनके कार्यों से मुक्त कर घर क्यों नहीं भेज दिया जाता, जब सब कुछ सीडीओ साहब को ही संभालना है? इस दखलअंदाजी का परिणाम यह हो रहा है कि व्यवस्था सुधरने के बजाय और अधिक पटरी से उतरती जा रही है।

​खाद का संकट और सरकारी धन की बंदरबांट

​सबसे गंभीर मुद्दा किसानों के लिए खाद की उपलब्धता का :

  • ​सरकार ने समितियों को खाद उपलब्ध कराने के लिए जिला सहकारी बैंक के माध्यम से 10-10 लाख की ऋण सीमा तय की थी।
  • ​हकीकत यह है कि करीब 80 प्रतिशत समितियों पर खाद का अता-पता नहीं है।
  • ​सवाल यह है कि आखिर समितियों ने खाद क्यों नहीं खरीदी? वह पैसा कहां गया?
  • ​अब तक दोषी सचिवों के खिलाफ एफआईआर दर्ज न होना प्रशासन की कार्यशैली पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है।

​ईमानदारी का ढोल और जमीनी हकीकत

​एक समय था जब सीडीओ साहब की छवि एक ईमानदार अधिकारी के रूप में बनी थी, जिससे उम्मीदें जगी थीं। लेकिन तथ्यों के अनुसार, मनरेगा में हुए करोड़ों के खर्च के बावजूद धरातल पर काम न दिखना इस छवि को धूमिल करता है।सीडीओ साहब की नियुक्ति के समय एक ईमानदार अधिकारी के तौर पर उनकी काफी चर्चा हुई थी। लोगों को उम्मीद थी कि अब भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी। लेकिन समय बीतने के साथ यह उम्मीदें धुंधली पड़ती गई हैं।

  • मनरेगा में लगभग 3 अरब 12 करोड़ रुपये खर्च हो गए, लेकिन धरातल पर काम न के बराबर दिखा।
  • सीडीओ साहब पत्रकारों को बाहर जाने के निर्देश देकर अपनी कार्यशैली पर पर्दा डालने की कोशिश करते दिखे, जबकि उन्हें अपनी ऊर्जा उन सचिवों की जांच में लगानी चाहिए जिन्होंने 10-10 लाख रुपये लेने के बाद न तो खाद खरीदी और न ही पैसा वापस किया।

दिखावा बंद कर जवाबदेही तय करें

​सीडीओ साहब की यह ‘व्हाट्सएप वाली सक्रियता’ किसानों के लिए कोई खाद नहीं ला पा रही है। सचिव जो सरकारी धन का उपयोग खाद खरीदने के बजाय निजी व्यापार में कर रहे हैं, उन पर कठोर कार्रवाई करने के बजाय केवल हाजिरी लेना प्रशासन की विफलता को ही दर्शाता है। वक्त आ गया है कि दिखावे की सक्रियता बंद हो और भ्रष्ट सचिवों पर नकेल कसकर किसानों को राहत दी जाए।

​सीडीओ साहब, यदि आप वास्तव में किसानों का भला चाहते हैं, तो व्हाट्सएप पर हाजिरी लेने का दिखावा बंद करें। उन सचिवों की जांच कराएं जिन्होंने सरकारी पैसा तो ले लिया, लेकिन न खाद खरीदी और न ही पैसा वापस किया। अगर व्यवस्था नहीं सुधार सकते, तो कम से कम दिखावे वाली सक्रियता से परहेज करें।

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