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बस्ती वन विभाग में बड़ा घोटाला: अधिकारियों की ‘फुलप्रूफ़’ योजना से 50 लाख का फर्जीवाड़ा

03 Jul 2026, 08:08 AM • Vande Bharat Live TV News
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​अजीत मिश्रा (खोजी)

वन विभाग में ‘लूट’ का काला अध्याय: डीएफओ, एसडीओ और रेंजर पर लगे गंभीर आरोप

  • डीएफओ, एसडीओ और रेंजर की मिलीभगत: फर्जी हस्ताक्षरों से हुआ लाखों का बंदरबांट
  • कार्रवाई के नाम पर लीपापोती: रेंजर क्लर्क को बचाने के लिए विभाग ने खेला तबादले का खेल

बस्ती। आम तौर पर वन विभाग का काम जंगलों और पेड़ों को बचाना होता है, लेकिन बस्ती के वन विभाग में जो कारनामा सामने आया है, उसे जानकर रोंगटे खड़े हो जाएंगे। यहाँ के अधिकारियों ने जंगलों को बचाने के बजाय सरकारी खजाने को लूटने की ऐसी ‘फुलप्रूफ़’ योजना बनाई, जिसने भ्रष्टाचार के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए हैं। वन विभाग, जिसका प्राथमिक दायित्व वनों की रक्षा और संवर्धन है, आज उसी विभाग में कार्यरत कुछ अधिकारियों की कार्यशैली सवालों के घेरे में है। बस्ती में सामने आया एक मामला वन विभाग के प्रशासनिक ढांचे में व्याप्त भ्रष्टाचार की परतें खोल रहा है, जिसमें डीएफओ डॉ. सरीन सिद्दीकी, एसडीओ देवेंद्र प्रताप सिंह और रेंजर सोनल वर्मा का नाम प्रमुखता से सामने आया है।

​’मैडम’ की ईमानदारी पर सवाल

​अक्सर यह माना जाता है कि जो व्यक्ति धार्मिक अनुष्ठान या नमाज़ आदि में सक्रिय है, वह ईमानदार होगा। लेकिन डीएफओ डॉ. सरीन सिद्दीकी ने इस धारणा को आईना दिखा दिया है। आरोप है कि उन्होंने और उनकी ‘टीम’ (एसडीओ देवेंद्र प्रताप सिंह और रेंजर सोनल वर्मा) ने मात्र सात वित्तीय स्वीकृतियों में ही लगभग 26 लाख रुपये हड़पने की साजिश रची।

​भ्रष्टाचार की ‘फुलप्रूफ़’ योजना

​घोटाले की जड़ें और भी गहरी हैं। एक दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी को ‘रेंजर क्लर्क’ बनाकर उसके माध्यम से लगभग 50 लाख रुपये का बंदरबांट किया गया। खेल इतना शातिर है कि जिन लोगों को इस बारे में कुछ पता ही नहीं था, उनके नाम पर एक-एक व्यक्ति के नाम से छह से सात फर्जी बिल बना दिए गए। आरोप है कि डीएफओ डॉ. सरीन सिद्दीकी और उनकी टीम ने सरकारी धन को डकारने के लिए एक अत्यंत सुनियोजित योजना बनाई। डीएफओ की इस ‘टीम’ ने केवल सात वित्तीय स्वीकृतियों के माध्यम से लगभग 26 लाख रुपये का गबन करने की साजिश रची। इन वित्तीय स्वीकृतियों का विवरण इस प्रकार है:

  • ​वित्तीय स्वीकृति संख्या 983/25-26 के तहत 200492 रुपये और 100056 रुपये निकाले गए।
  • ​वित्तीय स्वीकृति संख्या 1103/25-26 से 300035 रुपये।
  • ​वित्तीय स्वीकृति संख्या 1237/25-26 से 553195 रुपये।
  • ​वित्तीय स्वीकृति संख्या 1168/25-26 से 376110 रुपये।
  • ​वित्तीय स्वीकृति संख्या 1099/25-26 से 702470 रुपये।
  • ​वित्तीय स्वीकृति संख्या 1280/25-26 से 352500 रुपये निकाले गए।

​रेंजर क्लर्क का किरदार और फर्जीवाड़े का जाल

​इस पूरे घोटाले के केंद्र में एक दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी है जिसे ‘रेंजर क्लर्क’ के पद पर तैनात कर दिया गया था। इन तीन अधिकारियों और उक्त रेंजर क्लर्क ने मिलकर रामनगर क्षेत्र में लगभग 50 लाख रुपये हड़पने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए।

​फर्जीवाड़े का तरीका इतना शातिर था कि जिन वन रक्षकों और वन दरोगाओं के नाम पर बिल बनाए गए, उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगी। रेंजर क्लर्क ने इनके फर्जी हस्ताक्षर बनाकर पौधों की सुरक्षा और मिट्टी पाटने जैसे कार्यों के नाम पर बिल भुना लिए। इस पूरे खेल में कथित तौर पर लाभार्थियों से पांच प्रतिशत कमीशन लेकर बाकी राशि अधिकारियों और रेंजर क्लर्क द्वारा आपस में बांट ली गई।

​फर्जी बिलों की लंबी सूची

​जांच में सामने आया है कि एक ही व्यक्ति के नाम पर कई फर्जी बिल बनाए गए, ताकि भुगतान लेने में आसानी हो। इसके कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं:

  • रामबृक्ष (पुत्र तुलसीराम): इनके नाम पर 19035, 6697, 11985, 19035 रुपये के अलग-अलग बिल लगाए गए।
  • देवेंद्र कुमार (पुत्र लाल बिहारी): इनके नाम पर 18682, 10575, 14452, 18682, 18682, 18682 रुपये के बिल बनाए गए।
  • पंकज कुमार चौधरी (पुत्र भौमिक): इनके नाम पर 19035 और 15510 रुपये के बिल बनाए गए।

​कार्रवाई के नाम पर लीपापोती

​जब इस फर्जीवाड़े का विरोध हुआ और रेंजर क्लर्क को बर्खास्त करने की मांग उठी, तो उसे बर्खास्त करने के बजाय केवल रामनगर रेंज से मुख्यालय तबादला कर दिया गया। विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा की जा रही इस अनदेखी और मिलीभगत के कारण ही दोषियों का मनोबल बढ़ा हुआ है। यह मामला एमएलसी प्रतिनिधि हरीश सिंह द्वारा ‘दिशा’ की बैठक में उठाए जाने के बाद सार्वजनिक हुआ है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जब इस फर्जीवाड़े का विरोध हुआ, तो आरोपी रेंजर क्लर्क को बर्खास्त करने के बजाय उसका तबादला कर दिया गया। विभाग में शिकायत होने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई न होना यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार के इस खेल में ऊपरी संरक्षण भी मौजूद है। यदि एमएलसी प्रतिनिधि हरीश सिंह ने मामले का खुलासा न किया होता, तो शायद यह लूट का सिलसिला बदस्तूर जारी रहता।

वन विभाग के इन ‘रक्षकों’ ने साबित कर दिया है कि उनके लिए पर्यावरण से ज्यादा महत्वपूर्ण सरकारी धन की मलाई खाना है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस ‘जंगलराज’ पर क्या कार्रवाई करता है।

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