बस्ती में ‘अर्दली’ का भ्रष्टाचार: क्या यह एक मोहरे की बलि है या व्यवस्था की सफाई की शुरुआत?

अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती में ‘अर्दली’ का खेल: भ्रष्टाचार के दलदल में धंसी व्यवस्था पर कब लगेगी लगाम?
बस्ती: क्या जिले के प्रशासनिक कार्यालयों में ‘अर्दली’ पद की गरिमा अब ‘दलाली’ की परिभाषा में बदल गई है? बस्ती में एडीएम कार्यालय से संबद्ध एक सफाईकर्मी जयसिंह का निलंबन इस सवाल को फिर से सतह पर ले आया है। रिश्वतखोरी की स्वीकारोक्ति वाला ऑडियो वायरल होने के बाद पंचायतराज विभाग द्वारा की गई यह कार्रवाई जितनी त्वरित है, उतनी ही भयावह भी है। यह केवल एक कर्मचारी के निलंबन की खबर नहीं, बल्कि उस सड़ चुकी व्यवस्था का आईना है, जहाँ छोटे पदों पर बैठे लोग ऊंचे ओहदों की आड़ में जनता की गाढ़ी कमाई का सौदा कर रहे हैं।
जिम्मेदार कौन?
सवाल यह उठता है कि एक सफाईकर्मी, जो कागजों पर एडीएम का अर्दली था, उसे खुलेआम घूस लेने का साहस कैसे हुआ? क्या उसने यह तंत्र अकेले खड़ा किया था या इस जाल के तार कहीं और तक जुड़े हैं? जिला पंचायतराज अधिकारी घनश्याम सागर ने उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली का हवाला देकर कार्रवाई तो कर दी है, लेकिन क्या विभागीय जांच की खानापूर्ति इस कैंसर का इलाज है?
भ्रष्टाचार का ‘ऑडियो’ सबूत मात्र नहीं, चेतावनी है
वायरल ऑडियो में रिश्वतखोरी की स्वीकारोक्ति प्रशासनिक तंत्र के खोखलेपन को उजागर करती है। जब किसी कर्मचारी के पास इतना ‘पावर’ आ जाए कि वह फाइलों को प्रभावित करने या कराने का सौदा करने लगे, तो यह स्पष्ट है कि विभाग के भीतर ‘चेक एंड बैलेंस’ (निगरानी) का तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। सहायक जिला पंचायतराज अधिकारी रेखा मौर्या को जांच सौंपी गई है, लेकिन जनता को रस्म अदायगी वाली रिपोर्ट नहीं, बल्कि ठोस और नजीर बनने वाली कार्रवाई का इंतजार है।
व्यवस्था पर गहराता जनविश्वास का संकट
प्रशासनिक सुधार और पारदर्शी कार्यप्रणाली के बड़े-बड़े दावों के बीच, ऐसे मामले शासन की साख पर बट्टा लगाते हैं। अगर अर्दली और निचले स्तर के कर्मचारी ही भ्रष्टाचार का जरिया बन गए हैं, तो आम आदमी की फरियाद का क्या होगा? शासन को यह समझना होगा कि भ्रष्टाचार का यह ‘दीमक’ केवल एक जयसिंह को हटाने से खत्म नहीं होगा। इसके लिए उन सभी स्तरों की जवाबदेही तय करनी होगी, जिनकी नाक के नीचे यह खेल खेला जा रहा था।
निष्कर्ष
जयसिंह का निलंबन तो बस एक शुरुआत होनी चाहिए। यदि बस्ती प्रशासन वास्तव में सुशासन के प्रति गंभीर है, तो उसे इस मामले की तह तक जाकर उन ‘संरक्षकों’ को भी बेनकाब करना होगा, जिनकी शह पर यह सब हो रहा था। अन्यथा, यह निलंबन भी कागजी फाइलों में दफन होकर रह जाएगा और भ्रष्टाचार का यह चक्र फिर किसी नए ‘चेहरे’ के साथ शुरू हो जाएगा।
बस्ती की जनता पूछ रही है: क्या यह कार्रवाई केवल एक मोहरे की बलि है, या तंत्र को दुरुस्त करने का इरादा?
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