”आसरा” की आड़ में मौत का इंतज़ार: 25 दिनों तक तड़पते रहे बुजुर्ग, सिस्टम सोता रहा!

अजीत मिश्रा (खोजी)
संवेदनहीनता की पराकाष्ठा: ‘आसरा’ के नाम पर बेसहारा बुजुर्गों का दम तोड़ता भरोसा
अजीत मिश्रा (खोजी पत्रकार)
- इमारतें तो बन गईं, लेकिन इंसानियत कहां है? हर्रैया की ये तस्वीर व्यवस्था पर तमाचा है।
- “बचा लो, हमें कोई सहारा नहीं”: 25 दिन की कराह और बहरी हो चुकी सरकारी मशीनरी।
- आसरा मिला, पर अपनों का प्यार और सरकारी ध्यान नहीं… क्या यही है बुढ़ापे की हकीकत?
क्या हम सचमुच इंसान कहलाने के लायक बचे हैं? यह सवाल केवल एक जुमला नहीं, बल्कि बस्ती जनपद के हर्रैया स्थित ‘आसरा आवास’ की उन चार दीवारों के बीच से उठने वाली उस कराह का प्रतिध्वनि है, जिसने व्यवस्था की संवेदनशीलता को तार-तार कर दिया है।
तस्वीरें अक्सर बोलती हैं, लेकिन हर्रैया के इस आवास से आई तस्वीर चीख-चीख कर कह रही है कि हमारे यहाँ फाइलों में ‘संवेदनाएं’ तो बहुत हैं, लेकिन हकीकत में ‘बेबसी’ का दम घुट रहा है। जिस छत का नाम ही ‘आसरा’ हो, वहाँ रहने वाले दो बुजुर्गों का 25 दिनों तक दर्द से तड़पना और सिस्टम का पूरी तरह से मौन रहना, यह साबित करता है कि हमारी प्रशासनिक व्यवस्था कागजी घोड़ों पर सवार होकर इंसानियत के उस धरातल से कितनी दूर निकल गई है, जहाँ से किसी की कराह सुनाई देती है।
क्या कागजों में सब ठीक है?
25 दिन… यह समय कोई कम नहीं होता। एक-दो दिन नहीं, लगभग चार हफ्तों तक दो बुजुर्ग अपने ही कमरे में अपनी नियति से लड़ते रहे। उनका शरीर जवाब दे रहा था, दर्द उनकी रूह को छलनी कर रहा था, लेकिन ‘जिम्मेदारों’ की आंखें नहीं खुलीं। शायद उनके लिए फाइलों का रिकॉर्ड दुरुस्त था, शायद उनके लिए आंकड़े पूरे थे। जब कागजों में सब कुछ ‘ठीक’ नजर आ रहा हो, तो भला हकीकत की धूल में हाथ कौन गंदा करना चाहता है?
’आसरा’ या ‘अंधेरा’?
विडंबना देखिए, जिस ‘आसरा आवास’ का निर्माण बेसहारा लोगों को संबल देने के लिए किया गया था, वहीं रहने वाले सबसे ज्यादा बेसहारा हो गए। क्या यह इमारतें सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा हैं? यदि इन इमारतों में मानवता के प्राण ही नहीं फूंके जा सकते, तो इन्हें बनाने का उद्देश्य क्या है?
यह तो गनीमत रही कि ‘सेवा समर्पण भाव’ से जुड़े लोगों ने समय रहते पहल की, अधिकारियों को जगाया और स्वास्थ्य विभाग को मौके पर पहुंचाया। यदि वे लोग न होते, तो शायद आज हम किसी अस्पताल में इलाज की खबर नहीं, बल्कि किसी अंतिम संस्कार की हृदयविदारक रिपोर्ट पढ़ रहे होते।
यह व्यवस्था नहीं, बीमारी है
फिलहाल, दोनों बुजुर्ग जिला अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। प्रार्थना है कि वे स्वस्थ हों। लेकिन यह घटना एक ऐसा गहरा घाव छोड़ गई है, जिसका जवाब केवल संबंधित अधिकारियों को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को देना होगा। जब एक समाज के भीतर बुजुर्गों की कराह अनसुनी होने लगे, तो समझ लीजिए कि व्यवस्था के साथ-साथ हमारी सामूहिक इंसानियत भी गंभीर रूप से बीमार हो चुकी है।
अंतिम प्रश्न: इमारतों के नीचे दबी इस बेरुखी का जिम्मेदार कौन है? क्या संवेदनहीनता अब हमारी सरकारी कार्यशैली का हिस्सा बन चुकी है? अगर हम आज नहीं जागे, तो कल हमारे हिस्से में भी ऐसी ही ‘खामोश मौतें’ आएंगी।
याद रखिए, इमारतें बनाना आसान है, उनमें इंसानियत को ज़िंदा रखना सबसे कठिन काम है, और फिलहाल हम उस परीक्षा में पूरी तरह फेल होते दिख रहे हैं।
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