वीआईपी प्रकरणों का 24 घंटे में खुलासा, आम आदमी के मामलों में वर्षों का इंतजार, आखिर क्यों अलग-अलग है पुलिस की कार्यप्रणाली?


जिला ब्योरों गोपाल मारु की रिपोर्ट 9993454360
बरमंडल । प्रदेश में अक्सर यह देखने को मिलता है कि किसी वीआईपी, जनप्रतिनिधि, वरिष्ठ अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़ी घटना होने पर पुलिस विभाग तत्काल सक्रिय हो जाता है और कई मामलों का खुलासा 24 घंटे से लेकर सात दिनों के भीतर कर दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर आम नागरिकों के चोरी, धोखाधड़ी, मारपीट, गुमशुदगी या अन्य मामलों में प्रकरण दर्ज होने के बाद वर्षों तक केवल “जांच जारी है” और “तलाश जारी है” जैसे जवाब सुनने को मिलते हैं। ऐसा ही मामला धार जिले के राजोद थाने में देखने को मिल रहा है।इस थाना अंतर्गत पिछले कई वर्षो में क्षेत्र में अनगिनत छोटी बड़ी चोरीया हो चुकी है जिसका आज तक कोई खुलासा नहीं करना कही ना कही पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। बरमंडल के अन्नपुर्णा चौंक बरखेड़ा रोड़ पर कपड़े के व्यापारी, अनाज व्यापारी, इलैक्ट्रोनिक दुकान आदि अनेक दुकानों पर हुई चोरियों का आज तक कोई खुलासा हुआ ही नहीं और रविवार रात्रि में फिर स्थानीय मां अन्नपूर्णा चौक स्थित के एस ट्रेडर्स दुकान पर अज्ञात बदमाशों ने धावा बोलकर चोरी की वारदात को अंजाम दिया। चोरों ने दुकान के मुख्य दरवाजे का ताला तोड़ने का प्रयास किया किन्तु ताला नहीं टूटने पर नकुचे सहित तोड़कर दुकान में घुसे। दुकान संचालक ईश्वरलाल मारू ने बताया कि चोर गल्ले में रखे लगभग 15000 रुपए नगदी , कंपनी के बल्ब , मोबाइल कवर , इयर फोन , इलेक्ट्रिक प्रेस , किराना सामान सहित अन्य सामग्री चुरा ले गए। चोरों ने सीसीटीवी कैमरे को भी क्षतिग्रस्त किया। डायल 112 पर सूचना करने पर मौका मुआयना किया। उसके पश्चात राजोद थाने पर जाकर आवेदन दिया गया चोरी की घटना पर भी सिर्फ आवेदन लेना और उसकी भी प्राप्ति नहीं देना इस प्रकार की कार्यप्रणाली को लेकर आम जनता के बीच यह प्रश्न लगातार उठ रहा है कि क्या पुलिस व्यवस्था में सभी नागरिकों को समान प्राथमिकता मिलती है या फिर मामलों का निपटारा राजनीतिक प्रभाव, मीडिया दबाव के आधार पर किया जाता है।आमजन के मन में उठ रहे कई सवाल यदि पुलिस 24 घंटे में किसी मामले का खुलासा कर सकती है तो अन्य मामलों में वर्षों का समय क्यों लगता है? क्या आम नागरिकों के मामलों को कम महत्व दिया जाता है? क्या पुलिस संसाधनों की कमी का हवाला देकर जिम्मेदारी से बचती है? क्या प्रभावशाली लोगों के मामलों में अतिरिक्त दबाव काम करता है? क्या लेन-देन और बाहरी हस्तक्षेप जांच को प्रभावित करते हैं? इन सवालों ने पुलिस व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं?
*पुलिस के नियम क्या कहते हैं?*
भारत में पुलिस की कार्यप्रणाली विभिन्न कानूनों और दिशा-निर्देशों से संचालित होती है। इनमें प्रमुख रूप से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), भारतीय न्याय संहिता (BNS), राज्य पुलिस अधिनियम तथा पुलिस नियमावली शामिल हैं।
*नियमों के अनुसार*
सभी नागरिक कानून की नजर में समान हैं। प्रत्येक शिकायत पर निष्पक्ष जांच होना अनिवार्य है।
जांच बिना किसी भेदभाव, दबाव या पक्षपात के की जानी चाहिए। पीड़ित को जांच की प्रगति की जानकारी देने का दायित्व पुलिस का होता है। पुलिस का दायित्व केवल प्रकरण दर्ज करना नहीं, बल्कि समयबद्ध जांच करना भी है। कहीं भी यह प्रावधान नहीं है कि वीआईपी मामलों को प्राथमिकता देकर आम नागरिकों के मामलों की अनदेखी की जाए।
*न्यायालय क्या कहता है?*
उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालय समय-समय पर स्पष्ट कर चुके हैं कि पुलिस को निष्पक्ष, स्वतंत्र और बिना किसी बाहरी दबाव के कार्य करना चाहिए। न्यायालयों ने यह भी कहा है कि, कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं।पुलिस जांच में भेदभाव संविधान के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।अनावश्यक देरी पीड़ित के न्याय के अधिकार का उल्लंघन हो सकती है। जांच में पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य होना चाहिए।
*लेन-देन और पक्षपात के आरोप*
आम जनता के बीच यह धारणा बनी हुई है कि पुलिस मामलों में राजनीतिक प्रभाव, सिफारिश और आर्थिक हितों के कारण कार्रवाई की गति प्रभावित होती है। बिना शुभ लाभ के कागज टेबल से हिलता भी नहीं है। देश में भ्रष्टाचार की जड़े गहरी है, भ्रष्टाचार सिस्टम में ऊपर से लेकर नीचे तक पहुंच चुका है और आम लोगों की धारणा भी बन चुकी हैं कि धन बल, बाहुबल, राजनीतिक प्रभाव ही मुख्य आधार बन चुका है।
जनता की मांग
सभी मामलों में समान प्राथमिकता तय हो, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों का कहना है कि पुलिस विभाग को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जिसमें हर मामले की समयसीमा तय हो और जांच की ऑनलाइन निगरानी हो ताकि आमजन को वर्षों तक न्याय का इंतजार न करना पड़े। पुलिस प्रशासन का मूल उद्देश्य आमजन की सुरक्षा और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना है। यदि वीआईपी मामलों में त्वरित कार्रवाई संभव है तो आम नागरिकों के मामलों में भी उसी संवेदनशीलता, गंभीरता और जवाबदेही के साथ कार्य होना चाहिए। कानून किसी व्यक्ति की हैसियत नहीं देखता, बल्कि सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है। ऐसे में न्याय व्यवस्था में भेदभाव की धारणा को समाप्त करना पुलिस प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती हैं।
इस प्रकार की कार्यप्रणाली को लेकर आम जनता के बीच यह प्रश्न लगातार उठ रहा है कि क्या पुलिस व्यवस्था में सभी नागरिकों को समान प्राथमिकता मिलती है या फिर मामलों का निपटारा राजनीतिक प्रभाव, मीडिया दबाव के आधार पर किया जाता है।
*आमजन के मन में उठ रहे कई सवाल*
यदि पुलिस 24 घंटे में किसी मामले का खुलासा कर सकती है तो अन्य मामलों में वर्षों का समय क्यों लगता है? क्या आम नागरिकों के मामलों को कम महत्व दिया जाता है? क्या पुलिस संसाधनों की कमी का हवाला देकर जिम्मेदारी से बचती है? क्या प्रभावशाली लोगों के मामलों में अतिरिक्त दबाव काम करता है? क्या लेन-देन और बाहरी हस्तक्षेप जांच को प्रभावित करते हैं? इन सवालों ने पुलिस व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं?
*पुलिस के नियम क्या कहते हैं?*
भारत में पुलिस की कार्यप्रणाली विभिन्न कानूनों और दिशा-निर्देशों से संचालित होती है। इनमें प्रमुख रूप से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), भारतीय न्याय संहिता (BNS), राज्य पुलिस अधिनियम तथा पुलिस नियमावली शामिल हैं।
*नियमों के अनुसार*
सभी नागरिक कानून की नजर में समान हैं। प्रत्येक शिकायत पर निष्पक्ष जांच होना अनिवार्य है।
जांच बिना किसी भेदभाव, दबाव या पक्षपात के की जानी चाहिए। पीड़ित को जांच की प्रगति की जानकारी देने का दायित्व पुलिस का होता है। पुलिस का दायित्व केवल प्रकरण दर्ज करना नहीं, बल्कि समयबद्ध जांच करना भी है। कहीं भी यह प्रावधान नहीं है कि वीआईपी मामलों को प्राथमिकता देकर आम नागरिकों के मामलों की अनदेखी की जाए।
*न्यायालय क्या कहता है?*
उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालय समय-समय पर स्पष्ट कर चुके हैं कि पुलिस को निष्पक्ष, स्वतंत्र और बिना किसी बाहरी दबाव के कार्य करना चाहिए। न्यायालयों ने यह भी कहा है कि, कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं।पुलिस जांच में भेदभाव संविधान के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।अनावश्यक देरी पीड़ित के न्याय के अधिकार का उल्लंघन हो सकती है। जांच में पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य होना चाहिए।
लेन-देन और पक्षपात के आरोप
आम जनता के बीच यह धारणा बनी हुई है कि पुलिस मामलों में राजनीतिक प्रभाव, सिफारिश और आर्थिक हितों के कारण कार्रवाई की गति प्रभावित होती है। बिना शुभ लाभ के कागज टेबल से हिलता भी नहीं है। देश में भ्रष्टाचार की जड़े गहरी है, भ्रष्टाचार सिस्टम में ऊपर से लेकर नीचे तक पहुंच चुका है और आम लोगों की धारणा भी बन चुकी हैं कि धन बल, बाहुबल, राजनीतिक प्रभाव ही मुख्य आधार बन चुका है।
*जनता की मांग*
सभी मामलों में समान प्राथमिकता तय हो, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों का कहना है कि पुलिस विभाग को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जिसमें हर मामले की समयसीमा तय हो और जांच की ऑनलाइन निगरानी हो ताकि आमजन को वर्षों तक न्याय का इंतजार न करना पड़े। पुलिस प्रशासन का मूल उद्देश्य आमजन की सुरक्षा और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना है। यदि वीआईपी मामलों में त्वरित कार्रवाई संभव है तो आम नागरिकों के मामलों में भी उसी संवेदनशीलता, गंभीरता और जवाबदेही के साथ कार्य होना चाहिए। कानून किसी व्यक्ति की हैसियत नहीं देखता, बल्कि सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है। ऐसे में न्याय व्यवस्था में भेदभाव की धारणा को समाप्त करना पुलिस प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती हैं।
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