चापलूसी के दौर में संघर्ष करती निष्पक्ष पत्रकारिता : सवालों के घेरे में पत्रकार का आत्मसम्मान

सुरेन्द्र दुबे डिस्टिक हेड (धार) इन दिनों
पत्रकारिता अपने मूल सिद्धांतों और आदर्शों से जूझती हुई दिखाई दे रही है। जिस पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, वह अब दबाव, प्रलोभन, और चाटुकारिता के बीच अपनी पहचान बचाने में संघर्ष कर रही है। निष्पक्षता, निर्भीकता और जनहित की बात करने वाले पत्रकार आज उपेक्षा और अकेलेपन का शिकार हैं। पत्रकार न किसी पार्टी का होता है, न किसी विचारधारा का गुलाम। उसका धर्म है सत्य को उजागर करना और जनमानस तथा सत्ता के बीच संवाद की पुल बनना। लेकिन 21वीं सदी में जिस तरह चापलूसी और पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता को बढ़ावा मिला है, उसने ईमानदार पत्रकारों को हाशिये पर ला खड़ा किया है। अब सत्य से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह हो गया है कि कौन-सा पत्रकार किसके पक्ष में लिखता है।
सत्ता, प्रतिष्ठान और पूंजीपति वर्ग द्वारा पोषित पत्रकारों को प्रोत्साहन और विज्ञापन मिलते हैं, जबकि समदर्शी पत्रकार, जो सच के साथ खड़े होते हैं, उन्हें ‘असहज’ बना दिया जाता है। ऐसे पत्रकारों को कोई ‘पत्रकार साहब’ कहता भी है तो सिर्फ स्वार्थ सिद्धि के लिए, काम निकलते ही वही लोग उन्हें ‘पर्सनल पत्रकार’ कहकर नीचा दिखाने लगते हैं। आज पाठक भी संवेदनहीन होते जा रहे हैं। उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि पत्रकार किसी हालत में लिख रहा है, बस यह चाहिए कि लिखा उनके मन मुताबिक हो। अगर एक पंक्ति भी आलोचना की मिल जाए तो राम-राम ठीक पत्रकार बंधु की खैर नहीं तमाम तरह की धमकियों के साथ राजनीतिक संरक्षण प्राप्त लोग पत्रकारों के अस्तित्व तक पर हमला कर देते हैं। निष्पक्ष पत्रकारों की आज सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे न तो चटकारता कर सकते हैं ना ही बिक सकते हैं इसलिए समाज और सत्ता दोनों की उपेक्षा का शिकार बनते जा रहे हैं। इस दौर में निष्पक्ष पत्रकारिता करना अपने आप में एक साहसिक अभियान है। पत्रकारिता जगत की यह पीड़ा केवल किसी एक कि नहीं बल्कि हर उसे पत्रकार की है जो अपना जमीर जिंदा रखकर कलम चलाता है। इस पर वरिष्ठ लोगों द्वारा चिंतन अत्यंत आवश्यक है नहीं तो आने वाले समय में पत्रकारिता भी सिर्फ कॉन्टैक्ट इंडस्ट्री बनकर रह जाएगी जिसमें ना सच्चाई होगी ना सरोकार।
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