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MDM का सच: गेहूं स्कूल में, आटा पिसवाए कौन? सफाई कर्मचारी कौन? जवाबदेह सिर्फ मास्टर जी क्यों?

26 Aug 2026, 06:41 PM • Vande Bharat Live TV News
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मिड-डे मील और शिक्षकों की अंतहीन उलझनें: व्यवस्था आखिर सवालों के घेरे में क्यों?

बस्ती/लखनऊ – प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में चल रही प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (PM POSHAN – पुराना नाम मिड-डे मील) योजना एक बार फिर सवालों के घेरे में है। योजना का उद्देश्य बच्चों को पोषण देना है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इसकी पूरी भागदौड़ का ठीकरा शिक्षक के सिर पर फोड़ दिया जाता है।
1. गेहूं मिला, आटा कौन पिसवाएगा?
नियमतः भारत सरकार FCI के माध्यम से गेहूं उपलब्ध कराती है। उत्तर प्रदेश में कई जिलों में विद्यालयों को सीधे गेहूं मिल रहा है, आटा नहीं। PM POSHAN गाइडलाइन के अनुसार गेहूं से आटा बनवाने के लिए Conversion Cost और परिवहन का पैसा राज्य सरकार को देना है, लेकिन विद्यालय स्तर पर इसके लिए कोई अलग कर्मचारी नामित नहीं है।
हकीकत में प्रधानाध्यापक को ही चक्की तक गेहूं ले जाना, पिसाई का खर्च निकालना और हिसाब देना पड़ता है। न कोई पिसाई भत्ता तय, न कोई व्यक्ति नियुक्त।
2. साफ-सफाई और बर्तन कौन धोएगा? पद ही नहीं है
सरकारी आदेश कहता है विद्यालय में रोज साफ-सफाई होनी चाहिए। लेकिन तथ्य यह है:
• परिषदीय प्राथमिक विद्यालयों में स्वतंत्र सफाई कर्मचारी का पद सृजित ही नहीं है। • मिड-डे मील में बर्तन धोने के लिए कोई पद नहीं है। PM POSHAN गाइडलाइन में सिर्फ एक रसोइया-सह-सहायिका का प्रावधान है, जिसका काम खाना बनाना है।
नतीजा – बच्चे खुद थाली धोते हैं, या शिक्षक पर कैमरा तान दिया जाता है। सवाल यह है कि जब पद ही नहीं तो जिम्मेदारी शिक्षक की कैसे?

यूपी में 1.5 लाख से अधिक परिषदीय विद्यालयों में यह योजना चल रही है, पर सफाई और बर्तन धोने की व्यवस्था आज भी रामभरोसे है।
3. रसोई गैस से लेकर सब्जी-फल-दूध तक – शिक्षक कब पढ़ाएगा?
विद्यालय का सिलेंडर खत्म होने पर एजेंसी के चक्कर लगाना, रोज ताजी सब्जी लाना, शासन के मेन्यू के अनुसार सोमवार को फल और बुधवार को दूध की व्यवस्था करना – यह सब प्रधानाध्यापक की डायरी में जुड़ा गैर-शैक्षणिक कार्य बन गया है।

जबकि शिक्षक की नियुक्ति Graduation, B.Ed/BTC, TET, Super TET जैसी योग्यता के बाद शिक्षण के लिए होती है, न कि रसद-प्रबंधन के लिए। प्रिंसिपल्स पहले ही हाईकोर्ट में कह चुके हैं कि उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी academics है, MDM का अतिरिक्त बोझ नहीं होना चाहिए।

ऐसे में शिक्षक NIPUN लक्ष्य कैसे हासिल करेगा, यह बड़ा सवाल है।
4. रसोइयों की हकीकत – 2000 रुपये में 10 महीने का गुजारा
तथ्य चौंकाने वाले हैं:
• उत्तर प्रदेश में रसोइयों को अभी 2000 रुपये प्रतिमाह मानदेय मिलता है, वह भी साल में सिर्फ 10 महीने के लिए। कई जगह 6 महीने से भुगतान लंबित है। • रसोइया खुद कहती हैं कि 2000 रुपये में परिवार पालना मुश्किल है। • सरकार ने अब इसे बढ़ाकर 3000 रुपये करने, 62 साल तक रिटायरमेंट उम्र और 5 लाख तक मुफ्त इलाज की घोषणा की है, पर जमीनी स्तर पर अभी भी 2000 ही मिल रहा है।
मानवीय पक्ष यह भी है कि त्योहारों पर कई शिक्षक अपने वेतन से रसोइयों को साड़ी, आर्थिक मदद करते हैं। दूसरी तरफ कई जगह रसोइया का चयन ग्राम प्रधान की सिफारिश पर होता है, वे सिर्फ खाना बनाकर चली जाती हैं, कैंपस की जूठन वहीं पड़ी रहती है।
असली जिम्मेदार कौन?
PM POSHAN योजना 2021 में Mid-Day Meal का नया नाम है और इसका संचालन यूपी में 2006 में गठित Mid-Day Meal Authority के अधीन होता है। इसके संचालन के लिए ग्राम स्तर पर प्रधान, SMC, रोजगार सेवक और MDM प्राधिकरण की भूमिका तय है, लेकिन जवाबदेही के समय सिर्फ मास्टर जी ही नजर आते हैं।

  • जब व्यवस्था में ही –
    • आटा पिसाई के लिए कोई नामित व्यक्ति नहीं
  • • सफाई के लिए कोई कर्मचारी नहीं
  • • बर्तन धोने के लिए कोई पद नहीं
  • • रसद लाने के लिए कोई संसाधन नहीं तो फिर हर वीडियो में, हर यूट्यूब स्टिंग में शिक्षक को ही कटघरे में खड़ा करना कितना न्यायसंगत है?
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