फाइलों में उलझी सांसें: बस्ती में महिला सिपाही की मौत और महकमे की संवेदनहीनता पर सुलगते सवाल

अजीत मिश्रा (खोजी)
खाकी और इंसानियत के बीच पिसती व्यवस्था: बस्ती की दो मौतें कई सुलगते सवाल छोड़ गईं
- क्या छुट्टी मांगना गुनाह है? दो दिन तक दफ्तर के चक्कर काटती रही घायल महिला सिपाही, इलाज के अभाव में मौत
- खाकी का दम घोंटती प्रशासनिक कार्यशैली: बस्ती की दो घटनाओं ने झकझोर दी व्यवस्था की अंतरात्मा
- आदेशों की बेड़ी में फंसी इंसानियत: महिला सिपाही की जान जाने और एसएचओ के संदिग्ध अंत ने खोले महकमे के राज़
- इंसान या कागजी पुतले? कार्यभार और संवेदनहीनता के चक्रव्यूह में पिसती पुलिस व्यवस्था
बस्ती: जिस वर्दी का काम समाज की सुरक्षा करना और हर मुश्किल वक्त में ढाल बनना है, जब वही खाकी भीतर से खोखली होने लगे और अपने ही रक्षकों को न बचा पाए, तो पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होना लाजिमी है। बस्ती जिले से सामने आई दो घटनाएं महज अखबार की सुर्खियां या हादसे नहीं हैं, बल्कि उस संवेदनहीन व्यवस्था का कच्चा चिट्ठा हैं जहां इंसान कागजों और आदेशों की फाइलों में दम तोड़ देता है।
पहली घटना महिला सिपाही केसरी वर्मा की है। सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल होने के बाद, सिर पर चार टांके लगने और सीटी स्कैन की रिपोर्ट हाथ में होने के बावजूद उन्हें समय पर छुट्टी नहीं मिली। न्याय और इलाज की गुहार लेकर वह दो दिनों तक एसपी कार्यालय के चक्कर काटती रहीं, लेकिन सिस्टम के पहिए नहीं डिगे। नतीजा यह हुआ कि समय पर उपचार न मिलने के कारण उन्होंने दम तोड़ दिया। यह कौन सा प्रशासनिक क्रूर चक्र है जहां एक घायल कर्मचारी को अपनी जान बचाने के लिए भी दफ्तरों की देहरी पर दम तोड़ना पड़े? क्या छुट्टी पाना कोई भीख है या एक बुनियादी मानवीय और कानूनी अधिकार? यदि समय रहते उन्हें अवकाश मिल जाता और वह अस्पताल में इलाज करा पातीं, तो शायद आज वह जीवित होतीं। इस मौत के लिए केवल दुर्घटना जिम्मेदार नहीं है, बल्कि उस उदासीनता की संस्कृति भी कटघरे में है जिसने एक घायल महिला की पुकार को नजरअंदाज किया।
दूसरी ओर, वाल्टरगंज थाना प्रभारी सूर्य प्रकाश सिंह का सरकारी आवास में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत मिलना इस बात का खौफनाक संकेत है कि पुलिस महकमे के भीतर मानसिक और शारीरिक दबाव किस हद तक विकराल रूप ले चुका है। चौबीसों घंटे की ड्यूटी, भारी कार्यभार, पारिवारिक अलगाव और उच्च स्तर से मिलने वाला मानसिक तनाव—यह सब मिलकर किसी भी मजबूत इंसान को भीतर से तोड़ देता है। क्या थानों और चौकियों पर तैनात इन कर्मियों की मानसिक सेहत की सुध लेने वाला कोई तंत्र मौजूद नहीं है? क्या वे महज मशीनें हैं, जिन्हें न थकान महसूस होती है और न ही मानसिक सुरक्षा की दरकार होती है?
ये दोनों मामले अलग-अलग जरूर दिखते हैं, लेकिन इनकी जड़ें एक ही समस्या में धंसी हैं—संवेदनशीलता का पूरी तरह से गायब हो जाना और अमानवीय कार्यसंस्कृति। पुलिस महकमे में कार्मिकों को संसाधन की तरह इस्तेमाल किया जाता है, इंसानों की तरह नहीं। छुट्टियों के आवेदन या तो महीनों दफ्तरों में धूल फांकते हैं या फिर उन्हें कागजी खानापूर्ति मानकर खारिज कर दिया जाता है। जब कोई अनहोनी हो जाती है, तो उच्चाधिकारियों की तरफ से शोक संवेदना और जांच के कागजी आदेश जारी कर इतिश्री कर ली जाती है, लेकिन असल कारणों की थाह कोई नहीं लेना चाहता।
बस्ती की इन घटनाओं पर केवल आंखें मूंद लेना या कुछ दिनों की चर्चा के बाद भूल जाना इस व्यवस्था के और अधिक पतन का रास्ता साफ करेगा। जरूरत इस बात की है कि पुलिस प्रशासन अपनी कार्यशैली में बुनियादी सुधार करे। अवकाश की प्रक्रियाओं को पारदर्शी, त्वरित और मानवीय बनाया जाए, तथा कर्मियों पर बढ़ते मानसिक दबाव को कम करने के लिए प्रभावी काउंसलिंग और सपोर्ट सिस्टम तैयार किए जाएं। यदि इन त्रासदियों से भी सबक नहीं सीखा गया, तो यह व्यवस्था इसी तरह और न जाने कितने सुलगते सवालों के साथ अपनों को लीलती रहेगी। सच्ची श्रद्धांजलि फाइलों के आंकड़े बढ़ाना नहीं, बल्कि उस मानवीय संवेदना को जिंदा करना है जो किसी की जान बचा सके।
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