गणेशोत्सव विशेषांक

गणेशोत्सव पर्व प्रतिवर्ष हिंदी महिना भाद्रपद मास शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि से शुरू होता है और दस दिनों तक चलने वाला यह पावन पर्व भाद्रपद मास शुक्ल चतुर्दशी- अनंत चतुर्दशी पर श्री गणेश मूर्ति विसर्जन के साथ संपन्न होता है। गणेश चतुर्थी तिथि के दिन पूजा करने हेतु श्री गणेश जी की एक नई मूर्ति घर पर लाई जाती है, सार्वजनिक पूजा पंडालों में भी गणेश जी की नई मूर्ति की स्थापना कर गणेशोत्सव की शुरुआत की जाती है।
पूजा घर में रखी हुई श्री गणेश जी की मूर्ति के अलावा , इस नई मूर्ति का भी स्वतंत्र रूप से पूजन वंदन किया जाता है। गणपति पूजन पर सर्वप्रथम आचमन करना चाहिए, इसके बाद देशकाल का उच्चारण करके विधि का संकल्प लेना चाहिए, इसके बाद शंख, घंटा दीप आदि सभी पूजा संबंधित उपकरणों का विधिवत पूजन किया जाता है और इसके बाद ही श्री गणेश जी की मूर्ति की विधिवत स्थापना की जाती है।
श्री गणेश चतुर्थी का यह पावन पर्व " सिद्धि विनायक व्रत " के नाम से भी जाना जाता है। भारतीय परिवारों में कुलाचार अनुसार या पूर्व से चली आ रही परंपरा अनुसार घरों में एक ही श्री गणेश जी की मूर्ति पूजन का विधान/ परंपरा रही है।
गणेश चतुर्थी पर नई मूर्ति लाने का उद्देश्य-: घरों में पूजाघर में श्री गणेश जी की मूर्ति रहते हुए भी नई मूर्ति लाने का उद्देश्य यह है कि श्री गणेश चतुर्थी के समय पर पृथ्वी पर गणेश तरंगें अत्यधिक मात्रा में आती हैं, इस समय पर उनका आवाहन यदि पूजाघर में रखी हुई मूर्ति में किया जाता है तो उसमें अत्यधिक शक्ति भी निर्मित होगी, और इस उर्जित मूर्ति की उत्साह पूर्वक विस्तृत रूप से वर्ष भर पूजा अर्चना कर पाना अत्यंत ही कठिन हो जाता है, और उसके लिए कर्मकांडों के कड़े नियमों का पालन भी जरूरी हो जाता है, इसलिए ही गणेश चतुर्थी पर्व पर प्रतिवर्ष गणेश तरंगों के आवाहन के निमित्त नई गणेश जी की मूर्ति घर पर लाई जाती है। आम सामान्य व्यक्ति के लिए इन गणेश तरंगों का अधिक समय तक सह पाना भी संभव नहीं होता है, ।
गणेश चतुर्थी पर्व पर श्री गणेश जी की मूर्ति को घर पर लाने के लिए घर के मुख्य पूजा कर्ता पुरुष तथा अन्य लोग भी साथ में जाना चाहिए, गणेश जी की मूर्ति को हाथ मे लाना वाला व्यक्ति को जहां तक हो सके तो हिंदू रिति रिवाज अनुसार पारंपरिक हिंदू वेशभूषा ही धारण करना चाहिए, जैसे कि धोती कुर्ता, सिर पर टोपी भी लगाना चाहिए, श्री गणेश जी की मूर्ति को घर पर लाते समय पर मूर्ति को रेशमी, सूती,या खादी का वस्त्र डालकर ढक कर ही मूर्ति को घर पर लाना उचित रहता है। मूर्ति को घर पर लाते समय मूर्ति का मुख मूर्ति लाने वाले व्यक्ति की ओर और मूर्ति का पीठ सामने की तरफ होना चाहिए, मूर्ति के सामने वाला भाग सगुण तत्व प्रक्षेपित होता है, और मूर्ति के पीछे वाला भाग निर्गुण प्रक्षेपित होता है, मूर्ति को अपने हाथ मे लेनेवाला पूजक होता है, अत: वह व्यक्ति सगुण कार्य का प्रतीक होता है, मूर्ति का मुख पूजक की ओर होने से उसे सगुण तत्व की प्राप्ति होती है,।
श्री गणेश जी की जयकारा एवं ऋद्धा भावपूर्ण नाम स्मरण करते हुए मूर्ती को अपने घर पर लाना चाहिए। मूर्ती को घर पर लाने पर मूर्ति लाने वाले व्यक्ति को घर की दहलीज पर खड़े रहना चाहिए, घर की कोई भी सुहागिन माता बहन को मूर्ति लाने वाले व्यक्ति के पैरों पर दूध, जल डालने के बाद ही मूर्ति को घर में प्रवेश कराना चाहिए ।घर के अंदर प्रवेश करने से पहले मूर्ति का मुख सामने की तरफ करें, फिर मूर्ति की आरती वंदना करके ही मूर्ति को घर के अंदर लाना चाहिए।
श्री गणेश जी के भक्त को इस विधि अनुसार गणपति जी का स्वागत सत्कार करना चाहिए, ऋद्धा भक्ति भावपूर्ण स्वागत सत्कार के साथ लाई गई मूर्ति का पूजन आराधन, वंदन , श्री गणपति जी के स्तोत्र का पठन, नामजप ,आदि कर्म भावसहित करने पर श्री गणेश जी के तत्व का लाभ प्राप्त होता है, और वातावरण में प्रक्षेपित उनसे संबंधित भाव, चैतन्य, शांति, आनंद की तरंगों का भी पूर्ण लाभ प्राप्त होता है। मूर्ति को अपने घर पर लाते समय मन में यह भाव होना चाहिए कि वास्तव में साक्षात भगवान ही हमारे घर पर पधार रहें हैं, ।
मूर्ति घर पर लाते समय नामजप अवश्य करना चाहिए, इस समय भगवान श्री गणेश जी के नामों का जयघोष भी कर सकतें हैं, गीत भजन आदि भी किया जा सकता है। धार्मिक शास्त्र अनुसार किसी भी देवी देवता का आवाहन करके उनकी पूजा आराधना करने से उस देवी देवता की मूर्ति में संबंधित देवी देवता का तत्व आकर्षित होता है,और उस देवता तत्व से वह मूर्ति भी संचारित होती है, और दैवता का तत्व मूर्ती में भी घनीभूत होकर आसपास के वातावरण में प्रक्षेपित होता रहता है।.मूर्ति के संचारित होने से मूर्ति के नीचे रखी हुई अक्षत आदि भी देवता तत्व से संचारित होते हैं।
पूजा के उपरांत यह अक्षत घर पर रखे हुए अनाज के भंडार में मिलाए जातें हैं, जिससे देवता तत्व से संचारित सभी अनाज सालभर प्रसाद स्वरूप में परिवार के सभी सदस्यों को लेने से उससे लाभ भी प्राप्त होता है। ईश्वर की मूर्ति पर अक्षत आदि रखने से ईश्वर के भक्तजनों को पूरे सालभर प्रसाद के रूप में भगवद तत्व की प्राप्ति होती है ।
श्री गणेश जी के आगमन पर उनका लाभ प्राप्त करना-: श्री गणेश जी के नामों का जप करना चाहिए, श्री गणेश जी को उनके योग्य पुष्प आदि समर्पित करना चाहिए, श्री गणेश पूजन में दूर्वा अर्पित करने का विशेष विधान महत्व है, श्री गणेश जी से प्रार्थना करें,और उनकी महानिशा पूजा भी करने का प्रयास करना चाहिए, श्री गणेश जी की भावपूर्ण आरती वंदना करनी चाहिए, आरती करना मतलब अपने भगवान को आर्त भाव से पुकारना होता है, श्री गणेश जी के गुणगान वाले भजन, गीत गाना चाहिए, पूजा उपरांत श्री गणेश जी की आठ या आठ की गुना में परिक्रमा भी करनी चाहिए, ।शास्त्र अनुसार गणेशोत्सव मनाना चाहिए-; उत्सव मे सजावट सात्विक और प्राकृतिक वस्तुओं जैसे कि आम बरगद आदि पत्तों से बंदनवार बनाना चाहिए, कागज की पताका भी उपयोग में लाई जा सकती है, हमेशा प्रदूषण रहित चिकनी मिट्टी की बनी हुई मूर्ति ही उपयोग में लाना चाहिए, प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते हुए बनाई गई मूर्ति ही घर पर लाना चाहिए, श्रीगणेश जी की मूर्ति हमेशा उनके मूल स्वरूप के शास्त्र वर्णित अनुसार ही होनी चाहिए, गणेशोत्सव में राष्ट्रभक्ति,की प्रेरणा वाले, शास्त्रीय संगीत, और संत रचित गीत भजनों को ही चलाना चाहिए, श्री गणेश जी की मूर्ति का विसर्जन हमेशा शुद्ध बहते हुए जल में ही करना चाहिए, । क्या नहीं करना चाहिए-: गणेशोत्सव आदि में थर्मोकोल का उपयोग करने बचना चाहिए, क्योंकि थर्मोकोल से प्रदूषण में वृद्धि होती है, उत्सवों के दौरान विद्युत दीपों का भी अनावश्यक रूप से उपयोग करने से बचना चाहिए, प्लास्टर ऑफ पेरिस या कागद की लुगदी से बनाई गई मूर्ति का भी उपयोग करने से बचना चाहिए, रसायनिक रंगों का उपयोग करके बनाई गई मूर्ति से भी बचना चाहिए, देवी देवता की मूर्ति चित्र विचित्र आकारों में कभी भी बनाने से बचना चाहिए, उत्सवों के दौरान कभी भी बलपूर्वक चंदा आदि एकत्रित करने से बचना चाहिए, गणेशोत्सव आदि पंडालों में कभी भी विचित्र अंगचलन कर नाचना,गाना, जुआ ,मदिरापान आदि चलन से भी बचना चाहिए, भगवान की मूर्ति को कभी भी दान में नहीं देना चाहिए, इन्हें स्वच्छ जल या कृत्रिम जलाशय में ही विसर्जित किया जाना उचित रहता है।।
। आध्यात्म, शास्त्र अनुसार ही श्री गणेशोत्सव आदि में की गई शास्त्रीय पूजा विधि के कारण मूर्ति में भगवान का चैतन्य अधिक मात्रा में आकर्षित होता है, मूर्ति को बहते हुए जल में विसर्जित करने पर यह चैतन्य जल के माध्यम से दूर दूर तक फैलता है,और जल का वाष्पीकरण होने से यह चैतन्य वातावरण में भी दूर दूर तक पहुंचता है।
" सनातन धर्म प्रेमी भक्तजनों श्री गणेशोत्सव आदि में अपने भगवान की ऋद्धा भक्ति भावपूर्ण एवं धर्म शास्त्र अनुसार ही पूजा अर्चना करनी चाहिए, शास्त्र अनुसार उनके विसर्जन आदि करने के स्थान पर मात्र प्रसिद्धि के लिए पर्यावरण रक्षा करने का ढोंग करने भी बचना चाहिए, भक्तजनों श्री गणेश आदि देवी देवताओं की मूर्ति हमेशा धर्म शास्त्र अनुसार ही चिकनी मिट्टी से बनानी चाहिए, इससे पर्यावरण की भी सुरक्षा सुनिश्चित होगी और धर्माचरण करने से ईश्वर की कृपा भी सदैव बनी रहेगी। श्री गणेशोत्सव आदि के समय आनंद प्रक्षेपित करने वाली रंगोलियां या फिर ईश्वर का निर्गुण तत्व को आकर्षित करने वाली रंगोलियां बनानी चाहिए, ।.
धर्म की हानि को रोकना काल अनुसार आवश्यक धर्म पालन होता है, और वह उस देवता की समष्टि स्तर की साधना भी होता है। भक्तजनों बिना इस उपासना के देवता की उपासना भी पूरी नहीं हो सकती है।
कभी भी किसी देवी देवता को चित्र विचित्र तरीके से बनाकर ,दिखाकर देवता की अवकृपा का पात्र नहीं बनना चाहिए। किक्रेट आदि खेलने वाले गणेश जी , बुलेट आदि गाड़ी चलाते हुए गणेश जी ,इत्यादि मानवीय रुप में भी ईश्वर को दिखाना यह उस परमपिता परमेश्वर का अपमान करना ही होता है, धर्म आचरण करने वालों को इस प्रकार करने से हमेशा बचना चाहिए, और इसका विरोध भी करना चाहिए ।
उत्सवों, पूजा पाठ आदि में हमेशा धर्म शास्त्र सम्मत आचरण, व्यवहार, नियमों का पालन करना चाहिए। अनुचित धर्माचरण दिखावा आदि से बचना चाहिए ।।
।। धन्यवाद ।।
सभी स्वस्थ, निरोगी रहें, सबको परमपिता परमात्मा की कृपा शक्ति प्राप्त हो, दीर्घायु हों ,सभी अपने परिवार, कुटुंबजनों के साथ सुखी, संपन्न, समृद्धशाली शांतिपूर्ण जीवन व्यतित करें , यही प्रार्थना भी हम करतें हैं।
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